काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ काव्यादर्श [३।१८१-१८२ धुन्वन् कदम्बरजसा सह सप्तच्छदोद्गमान् ॥ १८१ ॥ (ग) दोलाऽति प्रेरणत्रस्तवधूजनमुखोद्गतम् । कदम्ब पुष्पोंकी परागके साथ सप्तच्छदके अङ्कुरोंको हिलाता हुआ वायु चला ॥ १८१ ॥ (ग) झूलेको अधिक वेगसे झुलानेके कारण डरी (सहमी) हुई बहुओं आते हैं । (३) खर वायु ग्रीष्ममें चला करता है । इस प्रकार भिन्नकाल- भावी ये तीनों बातें यहाँ एककालभावीके रूपमें बताई होनेके कारण काल- विरोधी हैं । किन्तु कविने इन्हें राजाओंके विनाशके सूचक दुर्निमित्त १ (उत्पात), अपशकुनके रूपमें प्रस्तुत करके इस कालविरोधको दोष (उद्वेजक) नहीं रहने दिया है, अपितु विवक्षित अर्थका पोषक होनेके कारण गुण बना दिया है । प्रखर वायु, बेमौसमके पुष्पोद्गम आदि अशुभके सूचक उत्पात शकुनशास्त्रमें और लोकमें प्रसिद्ध हैं ।२ (१) शरद्ऋतुका समय, जब कि छतौनके वृक्षोंमें पुष्पोद्गम स्वाभाविक होता है, राजाओंके विजयार्थ सैन्यप्रयाणका समय होता है । उस समय (२) ग्रीष्ममें चलने वाली प्रखर हवा और (३) प्रयाणमें बाधक वर्षामें फूलने वाले कदम्बोंमें ऋतुके बीतनेपर भी पुष्पोद्गम अशुभ प्राकृतिक शकुन है । ये सब विजयार्थी राजाके विनाशके सूचक हैं ॥ १८१ ॥ (ग) कालविरोध की गुणताका उदाहरण—सावनमें झूला झूलती बहुओं को उनकी ननदों या सहेलियोंने झूलेको बहुत जोर-जोरसे झोंटे देकर डरा १. भौम, आन्तरिक्ष और दिव्य महोत्पातोंका विशद वर्णन अवन्तिसुन्दरी, पृष्ठ ५२-५४ तथा ११७-११८ में देखें । पृष्ठ ५२ : अनन्तरं च सर्वस्या- मेवोर्व्यां सर्वक्षत्र (विनाश) पिशुनाः ⋯ चरितुमारभन्त घोररूपा महो- त्पाताः । तथा हि— ⋯ ऋतवः सर्व एव स्वचिह्न लक्ष्म्याः समन्ततः समं समाजग्मुः । ⋯ प्रसभोत्पाटितनिरस्तवृक्षवीरुधः, क्षुण्णपाषाणशर्कराः क्षणमपि नोपरेमुरुग्रस्वनाः प्रभ्रमन्तः प्रभञ्जनाः । पृष्ठ ११८ : भ्रमन्ति भीमा वायवः ⋯ । २. उत्पाता बहवस्तत्र निपेतुर्र्जायमानयोः । दिवि भुव्यन्तरिक्षे च लोकस्योरुभयावहाः ॥ श्रीमद्भागवतपु० ३।१७।३ ववौ वायुः सुदुःस्पर्शः फूत्कारानीरयन् मुहुः । अकाले फलपुष्पाणि देशोपद्रवकारणम् । विष्णुध० पु० १।३७ भी देखें ।