काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।१८२-१८३] कविका कौशल दोषको भी गुण बना देता है २१६ कामिनां लयवैषम्याद् गेयं रागमवर्धयत् ॥ १८२ ॥ (घ) ऐन्दवादर्चिषः कामी शिशिरं हव्यवाहनम् । अबलाविरहक्लेशविक्लवो गणयत्ययम् ॥ १८३ ॥ के मुखसे निकले हुए गीतने लयमें विषमताके कारण कामिजनोंका राग बढ़ा दिया ॥ १८२ ॥ (घ) सुन्दरीके विरहके कष्टसे व्याकुल वह कामी आगको चन्द्रमाकी किरणकी अपेक्षा शीतल समझता है ॥ १८३ ॥ दिया कि अब गिरी तब गिरी । परिणामतः उनके गीतोंकी लय बिगड़ गई । किन्तु उसी लयवैषम्यने आसपास विद्यमान उनके कामी प्रियोंके मनमें उनके प्रति प्रेम और गहरा कर दिया । गीत, वाद्य और पाद आदिके विन्यासकी द्रुत मध्य विलम्बितके रूपमें क्रिया और काल (मात्रा) की समता लय होती है ।¹ समतायुक्त विन्यास ही गीत वाद्य और नृत्यको आनन्द- दायी बनाता है । लयभङ्ग होनेपर ये उद्वेजक हो जाते हैं । किन्तु प्रियाओंकी भयत्रस्त मुद्रा और उसके कारण होने वाला गीतमें लयवैषम्य उनके प्रियोंको आनन्दित ही करता है । इस प्रकार यह कलाविरोध दोष न होकर कविके कौशलसे रतिका उद्दीपक होनेके कारण गुण हो गया है² ॥ १-२ ॥ (घ) लोकविरोधकी गुणताका उदाहरण—चन्द्रमाकी किरणोंका स्वभाव लोकमें शीतल समझा जाता है । आगका स्वभाव शीतके विपरीत उष्ण होता है । किन्तु यहाँ कविने उसे चन्द्रकिरणसे अधिक शीतल कहा है । इस प्रकार यहाँ लोकस्वभावका विरोध स्पष्ट है । किन्तु यह विरोध कामियोंकी रतिकी विशेष अवस्थाका सूचक होनेसे दोषकी बजाय गुण हो गया है । चन्द्रकिरणोंके स्पर्शसे कामियोंकी व्याकुलता बढ़ती है, उनकी कामाग्नि उद्दीप्त होती है; जबकि अग्निसे इस प्रकारकी कोई अनुभूति नहीं होती । अतः चन्द्रकिरण उनके लिये उष्ण हैं और अग्नि शीतल ॥ १८३ ॥ १. अमरकोष १।७।६ : तालः कालक्रियामानं लयः साम्यम् । रामाश्रमी : गीतिवाद्यपादादिन्यासानां क्रियाकालयोः साम्यं लयः । २. तनिक भिन्न परिवेशमें लयवैषम्य और भिन्नगीतताके वर्णनके लिये अवन्तिसुन्दरी कथा, पृष्ठ १६३, पंक्ति १६ देखें : अनवधानस्खलितपाद- विषमितलयम्, आयासश्वासभिन्नगीतरागम्, ॰॰॰आरब्धानन्दनृत्तया॰॰॰ विन्ध्यसेनया॰॰॰।