भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 239

२१४ काव्यादर्श [३।१७६-१७७

(च) अथागमविरोधस्य प्रस्थानं दर्शयिष्यते ॥ १७६ ॥ (i) 'अनाहिताग्नयोऽप्येते जातपुत्रा वितन्वते । विप्रा वैश्वानरीमिष्टमक्लिष्टाचारभूषणाः' ॥ १७७ ॥ (च) अब आगमविरोधका स्वरूप (उदाहरणोंसे) प्रदर्शित किया जायेगा ॥ १७६ ॥ (i) 'अग्न्याधान नहीं करने वाले भी उत्पन्न हुए पुत्रों वाले, सरल, शुद्ध आचरण रूपी अलङ्कारों वाले ये ब्राह्मण वैश्वानरीया इष्टि (श्रौत याग) का अनुष्ठान कर रहे हैं ॥ १७७ ॥ अन्तर्गत भी उन्होंने धर्मशास्त्रों और उनके द्वारा विहित लोकमर्यादाको लिया है । आन्वीक्षिकीकी कहीं चर्चा नहीं है ।१ (३) वस्तुतः धर्मशास्त्रकी गणना त्रिवर्गोक्तिरूप शास्त्र अर्थात् न्यायके रूपमें की ही जा चुकी है। अतः आगम- विरोधी (धर्मशास्त्र और तत्कृत लोकमर्यादाओंका विरोध करना) दोषका पृथक्से उल्लेख स्ववचनविरोध है । इस प्रकार भामहका इन दोषोंका निरूपण शिथिल है, युक्तिसङ्गत नहीं है। दण्डनीतिका सम्बन्ध केवल धर्म या अर्थसे है । कामपुरुषार्थसे सम्बन्ध है कामशास्त्रका । तत्सम्बन्धी दोष कलाविरोधमें या आगमविरोधमें समाहित हो जायेगा। तब, यहाँ उसके पुनः कथनकी आवश्यकता ही नहीं है । (च) आगमविरोध—दण्डीने 'आगम'के अन्तर्गत मनुष्यके लिये व्यक्तिगत और सामाजिक आचारकी विधायक (i) श्रुति और (ii) स्मृतिको लिया है, यह पीछे 'आगम'के लक्षणमें देख चुके हैं। यहाँ इन दोनोंके एकेक उदा- हरण आचार्यने अगले दो श्लोकोंमें प्रस्तुत किये हैं : (i) श्रुतिविरोध : तैत्तिरीय संहिताके अनुसार शास्त्रानुसार प्रजोत्पादनके योग्य (शास्त्रीय पद्धतिसे अग्न्याधान करके दारकर्म कर चुके) पुरुषको सन्तान नहीं है और सन्तानकी इच्छा है, तो वह अग्न्याधान करके वैश्वानर देवताके निमित्त द्वादश कपालोंपर संस्कृत पुरोडाशका निर् वाप (आहुति दे) । और फिर पुत्र होनेपर वैश्वानरके निमित्त द्वादशकपाल पुरोडाशकी आहुति दे ।२

१. आगमो धर्मशास्त्राणि लोकसीमा च तत्कृता । तद्विरोधि तदाचारव्यतिक्रमणतो, यथा ॥ काव्याल० ४।४८ २. तैत्तिरीय संहिता २।२।५।१-३ : वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् ।··· एतामेव निर्वपेत् प्रजाकामः ।···योऽलं प्रजायै सन् प्रजां न विन्दते । यद् वैश्वानरो द्वादशकपालो भवति ।···विन्दते प्रजाम् । वैश्वानरं द्वादश- कपालं निर्वपेत्···पुत्रे जाते ।