भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।१७८] ५. दोष : (१० च) आगमविरोध २१५ (ii) असावनुपनीतोऽपि वेदानधिजगे गुरोः । स्वभावशुद्धः स्फटिको न संस्कारमपेक्षते ॥ १७८ ॥ (ii) उसने उपनयन संस्कारसे रहित होते हुए भी गुरुसे वेदोंका अध्ययन किया । स्वभावसे शुद्ध (स्वच्छ) स्फटिक मणिको संस्कार (पालिश) की जरूरत नहीं होती ॥ १७८ ॥ इसे वैश्वानरी इष्टि कहते हैं । इस इष्टिमें अग्निका आधान आवश्यक है । ब्राह्मण यजमान और उसकी पत्नी दोनों क्षौम वस्त्र धारण करके वसन्त ऋतुमें आहवनीय अग्निका आधान करें । १ इस प्रकार अग्निका आधान करने वाले ब्राह्मण दम्पति आहिताग्नि कहलाते हैं । प्रकृत उदाहरणमें अग्न्याधान नहीं करने वाले विप्रोंको, और वह भी शास्त्रशुद्ध आचरण करने वाले विप्रों को, वैश्वानरी इष्टिका अनुष्ठान करता बताया है । अतः श्रुतिरूप आगमका विरोध यहाँ स्पष्ट है । इसके अतिरिक्त, इस कथनका एक आशय और हो सकता है : श्रौत परम्पराके अनुसार विप्रोंको स्नातक होनेके बाद अग्न्याधान करके योग्य पत्नीका पाणिग्रहण करनेके बाद ही सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिए । ये ब्राह्मण यद्यपि शास्त्रानुसारी शुद्ध आचार वाले हैं, तथापि इन्होंने (१) अग्न्याधान किये बिना घरमें औरत लाकर (२) उनसे स्वेच्छाचारसे पुत्र प्राप्त कर लिये । (३) अब वे लोग वह वैश्वानरी इष्टि कर रहे हैं, जो विधिवद् आहिताग्नि अजातपुत्र पुरुषके द्वारा पहले सन्तानोत्पत्तिका निमित्त और फिर पुत्र हो जाने पर की जानी चाहिये । इस प्रकार इस श्लोकमें श्रुतिविरोध नाना प्रकार से है । वितन्वते—वि + √ तन् विस्तारे, कर्तरि लट्, प्र० पु० ब० व० । श्रौत (आहित) अग्नियोंमें यज्ञकर्म करनेके लिये वि + √ तन्का प्रयोग शास्त्रमें किया जाता है । इसीलिये श्रौत यज्ञोंको ‘वितान’ कहते हैं२ ॥ १७७ ॥ (ii) स्मृतिविरोध—मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रोंके अनुसार एक उचित वयस् तक गुरुसे उपनयन संस्कार प्राप्त नहीं करने वाला द्विज न केवल वेदा- १. तैत्तिरीय ब्राह्मण १।२।६ : वसन्ता ब्राह्मणोऽग्निमादधीत । वसन्तो वै ब्राह्मणस्यर्तुः । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र ५।४।१० : क्षौमे वसानौ जाय-पती अग्निमादधीयाताम् । २. अमरकोष ३।३।११३ : क्रतुविस्तारयोरस्त्री, वितानं त्रिषु तुच्छके ॥