भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

२२६ काव्यादर्श [३।१८५ रीतियोंका रससे अविनाभाव सम्बन्ध स्थापित करनेकी दिशामें प्रेरणास्रोत परोक्ष रूपसे रुद्रटका ही योगदान है। यह हमें बादमें आनन्दवर्धनके ध्वनि- सिद्धान्तमें निरूपित मिलता है। अतः रुद्रट कुछ बातोंमें आनन्दवर्धनके पथिकृत् हैं, यह कहना अनुचित नहीं होगा। आनन्दवर्धनने रुद्रटके विरसको ही अपने सिद्धान्तके अनुकूल सर्वाधिक शोभाविघातक माना है। श्रुतिकष्टत्व आदि अन्य दोषोंको वे रसविरोधक होनेपर ही हेय (दोष) मानते हैं।१ किन्तु रसविरोध और तीन प्रकारसे व्या- ख्यात वृत्त्यनौचित्यको उन्होंने काव्यमें सर्वाधिक हेय माना है।२ इस प्रकार आनन्दवर्धनकी दृष्टिमें दोषत्वका आधार रसभङ्ग है। रुद्रटसे एक दोष विरसके रूपमें सूक्ष्म रूपसे उद्भूत इस दृष्टिभेदको इस प्रकार आनन्दवर्धनने सैद्धान्तिक आधार दिया तथा दोषके स्वरूपको एक नई दिशा दी। आचार्य महिमभट्टने उसे पल्लवित किया। उन्होंने आनन्दवर्धन द्वारा सङ्केतित अनौचित्यका यों विस्तार किया—विवक्षित रस आदिकी प्रतीतिमें विघ्न डालना अनौचित्यका सामान्य स्वरूप है।३ उसके (क) अन्त- रङ्ग और (ख) बहिरङ्ग दो भेद हैं। (क) विभाव, अनुभाव और व्यभि- चारी भावोंके अयथावत् विनियोगके कारण रसादिकी प्रतीतिमें साक्षात् (अर्थ के द्वारा) विघ्न आनेसे अन्तरङ्ग अनौचित्यके कारण रसभङ्ग होता है। यही १. श्रुतिदुष्टादयो दोषा अनित्या ये च दर्शिताः । ध्वन्यात्मन्येव शृङ्गारे ते हेया इत्युदाहृताः ।। ध्वन्यालोक० २।११ २. विरोधिरससम्बन्धिविभावादिपरिग्रहः । विस्तरेणान्वितस्यापि वस्तुनोऽन्यस्य वर्णनम् ।। ध्वन्यालोक ३।१८ अकाण्ड एव विच्छित्तिरकाण्डे च प्रकाशनम् ।। परिपोषं गतस्यापि पौनःपुन्येन दीपनम् ।। रसस्यापि स्याद् विरोधाय वृत्त्यनौचित्यमेव च ।। १६ वृत्ति : तथा (i) वृत्तेर्व्यवहारस्य यदनौचित्यं, तदपि रसभङ्गहेतुरेव ।... यदि वा (ii) वृत्तीनां भरतप्रसिद्धानां कैशिक्यादीनां, (iii) काव्यालङ्का- रान्तरप्रसिद्धानामुपनागरिकाद्यानां वा यदनौचित्यमविषये निबन्धनम्, तदपि रसभङ्गहेतुः । ३. व्यक्तिविवेक, चौखम्बा, १६६४ ई०, पृष्ठ १८२ : एतस्य च विवक्षित- रसादिप्रतीतिविघ्नविधायित्वं नाम सामान्यलक्षणम् । अन्तरङ्ग- बहिरङ्गभावश्चानयोः साक्षात् पारम्पर्येण च रसभङ्गहेतुत्वादिष्टः ।