काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१=५] दोषोंका इतिहास २२५ आचार्य रुद्रटने वामनकी व्यवस्थामें थोड़ा परिष्कार किया : उन्होंने दोषों को (१) शब्दगत और (२) अर्थगत दो प्रकारका बताकर पदमें अथवा वाक्यमें स्थित (i) पदगत, (ii) वाक्यगत एवम् (iii) अर्थगतके रूपमें व्यवस्थित किया । १ आचार्य भोजने तो रुद्रटके वर्गीकरणको आधार बनाया ही है, मम्मटने भी रुद्रटके वर्गोंमें आनन्दवर्धनोक्त रसविरोधको एक वर्गके रूपमें जोड़कर व्यवस्थाको पूर्णतया विकासकी स्थितिमें प्रस्तुत किया है । रुद्रटने कुछ नवीन दोषोंकी उद्भावना भी की है । उनमें सर्वाधिक महत्त्व- पूर्ण दोष है विरस नामक अर्थदोष : अन्य रसके प्रसङ्गमें क्रमके विपरीत जो कोई दूसरा रस आ जाए, तब विरस नामक दोष होता है । २ इस दोषका महत्त्व इस बातसे और बढ़ जाता है कि काव्यमें रसके महत्त्वको अपने-अपने ढंगसे स्वीकार करते हुए भी दण्डी, भामह और वामन रसके महत्त्वके बारेमें उतने स्पष्ट और मुखर नहीं हैं, जितने कि रुद्रट हैं । काव्यको रसयुक्त बनाने को अत्यधिक (महीयस्) यत्नका उनका उपदेश ३ और शान्तसमेत नौ रसोंका उनका निरूपण उन्हें रसको ‘रसवत्’ नामक अलङ्कार मानने वाले आचार्योंकी अपेक्षा रसको अत्यन्त महत्त्व देनेवाले आचार्य आनन्दवर्धनके कहीं अधिक निकट सिद्ध करता है । आगेका इतिहास भी यही कहता है । रीतियोंका रसोंसे सम्बन्ध भी रुद्रटने ही सर्वप्रथम जोड़ा है । ४ इस प्रकार गुणों और १. असमर्थमप्रतीतं विसन्धि विपरीतकल्पनं ग्राम्यम् । अव्युत्पत्ति च देश्यं पदमिति सम्यग् भवेद् दुष्टम् ।। काव्यालं० ६।२ तत्र पदं वाक्यं वा पुनरुक्तं नैव दोषाय ।। ३४ यस्मिन्तनेकमर्थं स्वयमेवालोचयेत् तदर्थानि । जल्पन् पदानि तेषामसङ्गतिर्नैव दोषाय ।। ३८ वाक्यं भवति तु दुष्टं सङ्कीर्णं गर्भितं गतार्थं च । ४० अपहेतुरप्रतीतो निरागमो बाध्यन्नसम्बद्धः । ग्राम्यो विरसस्तद्वानतिमात्रश्चेति दुष्टोऽर्थः ।। ११।२ २. अन्यस्य यः प्रसङ्गे रसस्य निपतेद् रसः क्रमापेतः । विरसोऽसौ; स च शक्यः सम्यग् ज्ञातुं प्रबन्धेष्यः ।। काव्या० ११।१२ ३. ननु काव्येन क्रियते सरसानामवगमश्चतुर्वर्गे । लघु मृदु च; नीरसेभ्यस्ते हि त्रस्यन्ति शास्त्रेभ्यः ।। काव्या० १२।१ तस्मात् तत् कर्तव्यं यत्नेन महीयसा रसैर्युक्तम् । ४. इह वैदर्भी रीतिः पाञ्चाली वा विचार्य रचनीया । मधुरललिते कविना कार्ये वृत्तौ तु शृङ्गारे ।। काव्यालं० १४।३७