काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[३।२८५] दोषोंका इतिहास २२७ आनन्दवर्धनका रसविरोध दोष है। (ख) शब्दके अनुचित प्रयोगके द्वारा अर्थप्रतीतिमें विघ्न आनेसे रसभङ्ग करना बहिरङ्ग अनौचित्य है। महिम- भट्टने इस शब्ददोषके छह भेद बताये हैं : (१) विधेयाविमर्श, (२) प्रक्रमभेद, (३) क्रमभेद, (४) पौनरुक्त्य, (५) वाच्यावचन एवम् (६) अवाच्यवचन।¹ अग्निपुराणमें दण्डिसम्मत (क) उद्वेजकता तथा (ख) असुखोच्चार्यमाणता को दोषका व्यावर्तक धर्म बताकर दण्डी, भामह और वामनके दोषोंको ही अपने ढंगसे व्यवस्थित किया गया है।² उनका पूर्वाचार्योंसे तत्त्वतः दृष्टिभेद नहीं है। पद, वाक्य और वाक्यार्थके रूपमें तीन आधारोंमें प्रत्येकमें १६, कुल ४८ दोष बतानेपर³ भी दोषोंके सैद्धान्तिक विकासमें भोजका कोई विशिष्ट योगदान नहीं है। अवान्तरभेदनिरूपणमें उनके चिन्तनका यत्किञ्चित् महत्त्व हो सकता है। परंतु तत्त्वतः वे रुद्रटसे आगे नहीं बढ़े हैं। मम्मटाचार्यने आनन्दवर्धन और महिमभट्टके निरूपणके आधारपर मुख्य अर्थके अपकर्षको दोषका लक्षण बताया। 'मुख्य अर्थ' उनके मतमें ध्वनि- सम्प्रदायके परमाचार्य आनन्दवर्धन द्वारा प्रोक्त तथा अग्निपुराण द्वारा अनूदित 'रस' है। महिमभट्टने ही 'रसप्रतीतिविघ्नविधायित्व' को दोषका सामान्य लक्षण कहा था। मम्मटने उसीका सङ्क्षेप 'मुख्यार्थहति'के रूपमें किया है। १. व्यक्तिविवेक, पृष्ठ १७६ : इह खलु द्विविधमनौचित्यमुक्तम् (क) अर्थ- विषयं शब्दविषयं चेति। तत्र (क) विभावातुभावव्यभिचारिणामयथायथं रसेषु यो विनियोगः, तन्मात्रलक्षणमेकमन्तरङ्गमाचार्यैरेवोक्तमिति नेह प्रतन्यते । (ख) अपरं पुनर्बहिरङ्गं बहुप्रकारं सम्भवति । तद्यथा— १ विधेयाविमर्शः, २ प्रक्रमभेदः, ३ क्रमभेदः, ४ पौनरुक्त्यं, ५ वाच्या- वचनमपि सङ्गृहीतं वेदितव्यम्, तस्यापीष्टार्थविपर्ययात्मकत्वात् । महिम- भट्ट दोषोंके इष्टविपर्ययात्मकत्वके बारेमें वामनके 'गुणविपर्ययात्मानो दोषाः' सिद्धान्तसे प्रभावित हैं। वामनके यहाँ चाहे गुण रसके धर्म न हों, रसवादी आचार्य आनन्दवर्धन और उनसे प्रभावित अन्य आचार्योंके मतमें गुण और रस अविनाभूत हैं। २. उद्वेगजनको दोषः सभ्यानाम् । अग्निपुराण ३४७।१ दोषत्वमनुबध्नाति सज्जनोद्वेजनादृते । असुखोच्चार्यत्वं कष्टत्वम्...।। १० ३. दोषाः पदानां, वाक्यानां, वाक्यार्थानां च षोडश । हेयाः काव्ये कवीन्द्रैर्यै तानेवादौ प्रचक्ष्महे ।। सरस्वती० १।३