भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।१८७] फलश्रुति २३१ वाग्भिः कृताभिसरणां मदिरेक्षणाभिर् धन्यो युवेव रमते, लभते च कीर्तिम् ॥ १८७ ॥ वाला, बसमें आई हुई वाणीके साथ अभिसार करने वाला (कवि और सहृदय) उसी प्रकार आनन्दलाभ और यश प्राप्त करता है, जिस प्रकार कोई बुद्धिमान्, धन्य (पुण्यवान् अथवा धनसम्पन्न), कामशास्त्रोक्त मार्गसे स्त्रियोंके दोष और गुणोंको समझने वाला युवा अपनी वशवर्तिनी मादक नयनों वाली रमणियोंके साथ रमण करता है और यश प्राप्त करता है ॥ १८७ ॥ वाक्से शब्दार्थरूप काव्यशरीर अभिप्रेत है । उपमान और उपमेयमें लिङ्ग- साम्यके लिये स्त्रीलिङ्ग 'वाक्' शब्दका प्रयोग किया है । काव्यके विविध प्रकारोंका बोध करानेको 'वाक्'को बहुवचनमें प्रयुक्त किया है । किसी भी विधानका प्रयोजन हेय और उपादेयका ज्ञान प्राप्त करना होता है । काव्यमें हेय अर्थात् शोभाघातक धर्मोंको आचार्यने 'दोष' कहा है और शोभाधायक उपादेय धर्मो गुण और अलङ्कारोंको 'गुण' शब्दसे ग्रहण किया है । इस प्रकार इन दो शब्दोंसे आचार्यने अपने ग्रन्थके सभी विषयोंको सङ्क्षेपसे प्रस्तुत किया है । किसी शास्त्रका प्रयोजन बुद्धिमें व्युत्पत्तिका, विवेकका, होना है । शास्त्रके प्रमेयोंके विषयमें व्युत्पत्ति (ज्ञान) होनेपर ही उसका उपयोग हो सकता है । इससे प्रमेय वशवर्ती हो जाता है । काव्यकी कल्पना आचार्यने रमणीके सादृश्यसे व्यक्त की है । उसके साथ सङ्केतपूर्वक विहार प्रेमिकाके साथ विहारके समान आनन्ददायी है । अर्धा- ङ्गिनीके साथ विहार उसकी तुलना नहीं कर सकता । रमणी जिस प्रकार मदिर (मादक) होती है, वैसे ही कविता भी मदिर होती है । ऐसी कविता का प्रणेता कवि एवं सहृदय पाठक दोनों धन्य हैं । ये कवितासे आत्मतोषके रूपमें आनन्दलाभ तो करते ही हैं, लोकमें यश भी प्राप्त करते हैं । रति और कीर्ति उपलक्षक हैं काव्यके चतुर्वर्गप्राप्ति आदि समस्त फलोंका । १ इन्हें आचार्य ने (१।३ में) लोकयात्राकी प्रवृत्तिके रूपमें कहा है । १. रत्नश्री : उपलक्षणं चैतत् — चतुर्वर्गसिद्धिमपि चाधिगच्छति । यथोक्तं प्रथमे परिच्छेदे ।