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काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 255

२३२ काव्यादर्श [३।१८७ ॥ इति श्रीदण्ड्याचार्यकृतौ काव्यादर्शे शब्दालङ्कार-दोष-लक्षणः तृतीयः परिच्छेदः सम्पूर्णः ॥ ॥ श्रीयुत आचार्य दण्डी द्वारा प्रणीत काव्यादर्शमें 'शब्दालङ्कारों और दोषोंका स्वरूपकथन' नामक तृतीय परिच्छेद सम्पूर्ण हुआ ॥ डॉ० जयशङ्कर त्रिपाठीने प्रथम और तृतीय परिच्छेदोंके उपसंहारोंमें वाक्‌की बहुत भिन्न प्रकारकी कल्पनाके कारण यह माना है कि ये दोनों उप- संहार एक लेखकके नहीं हो सकते। कविता और वनिताकी समानता पहली बार भामहके काव्यालङ्कार (१।१३, ३।५४) में कही गई है और उसीका अनु- करण इस तृतीय परिच्छेदमें हुआ है।२ त्रिपाठीजीका यह कथन तब तो उचित कहा जा सकता था अगर 'वाक्' का दोनों जगह एक ही अर्थ होता। दण्डीने प्रथम परिच्छेदमें ही वाक्‌का प्रयोग चार अर्थोंमें किया है : (१) वाणी, (२) वाङ्मय काव्य, (३) गाय और (४) सरस्वती। यहाँ वाङ्मय काव्यकी कल्पना यदि वनिताके रूपमें की है, तो पूर्वापरविरोध कहाँ हुआ ? प्रथम परिच्छेदके उपसंहारमें काव्य- निर्माणकी क्षमता पानेके लिये वाक्‌की कल्पना सरस्वतीके रूपमें की है। तृतीय परिच्छेदमें भिन्न प्रसङ्गमें वाक्‌की कल्पना 'कोमल कान्त काव्य' अर्थमें कान्ताके रूपमें की है। प्रसङ्गभेदसे कल्पनाभेद तो कवियोंमें बहुलतासे उप- लब्ध होता है। उसके कारण भिन्नकर्तृत्व यदि कहेंगे, तो कोई भी रचना एककर्तृक नहीं रह पायेगी। 'वश्यवाणिकविचक्रवर्ती' जैसा प्रयोग करनेवाले कविको 'वाग्देवी' शब्दके प्रयोगका अधिकार ही नहीं रहेगा। विद्वान् या कविको 'वागीश' कहने वाला कोई भी तब तो वागीश्वरीका अर्थ 'सरस्वती' नहीं कर पायेगा। अतः त्रिपाठीजीकी यह कल्पना उचित नहीं है ॥ १८७ ॥ ( टीकाकी समाप्तिका काल ) भाद्रकृष्णत्रयोदश्यां शनैर्वारे निशीथके। युगयुग्मनभोनेत्रे २०४४ हायने वैक्रमे शुभे ॥ १ ॥ द्वाविंशदिवसेऽगस्त्ये मुनिवसुग्रहैर्भुवि १६८७। ईसाऽब्दे ख्यापिता टीका काव्यादर्शप्रसादिनी ॥ २ ॥ प्रियायाः कुसुमाख्यायाः सहयोगोऽत्र कारणम् । सा भूयादावयोः कीर्त्यै यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ ३ ॥ २. आचार्य दण्डी एवं संस्कृत काव्यशास्त्रका इतिहासदर्शन, पृष्ठ ४०३ ।