काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
पृष्ठ 246, कुल 270 में से
संदर्भ में पढ़ें३१८५] दोषोंका इतिहास २:३
तो निरूपण किया है और कुछका निरूपण सम्भवतः उनकी सुपरिचित दोषके रूपमें मान्यताके कारण न करके उनका उल्लेखमात्र प्रसङ्गेन किया है। अलङ्कारपरम्परामें मेधावी द्वारा उद्भावितके रूपमें प्रसिद्ध सात उपमा- दोषोंमें से तीनको उन्होंने अनित्यदोषके रूपमें लिङ्गभेद और वचनभेद दोषों के अतिरिक्त भामहप्रोक्त मेधाविसम्मत विपर्ययको उपमानकी हीनता और अधिकताके रूपमें प्रस्तुत किया है। मेधावीके असम्भव और सादृश्य दोष दण्डीकी उपमामें सम्भव ही नहीं है। मेधावीके भामहाभिमत हीनता और अधिकताके बारेमें दण्डी मौन हैं ।¹ इस प्रकार दण्डीके अनुसार कुल दोष प्रकृत दस दोषोंको मिलाकर २३ हैं। आचार्य भामहने दोषोंका निरूपण कई स्थानोंमें किया है। प्रकृत अपार्थ आदि ११ दोषोंका निरूपण उन्होंने चतुर्थ और पञ्चम परिच्छेदोंमें सुव्यव- स्थित रूपसे किया है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित २२ दोषोंमें से कुछका निरूपण और कुछका प्रसङ्गसे उल्लेखमात्र भिन्न-भिन्न स्थानोंपर किया हैं : १ आकुलताका उल्लेख (१।२५,३५; ३।५४; ५।६७में) किया है। २ अपुष्टार्थ (१।३४), ३ ग्राम्य शब्द (१।१६), ४ ग्राम्य अर्थ (१।३५) का भी उल्लेख किया है। ५ नेयार्थ, ६ क्लिष्ट, ७ अन्यार्थ, ८ अवाचक, ६ अयुक्तिमत् और १० गूढशब्दाभिधान दोषोंका पूर्णतया या अंशतः निरूपण (१।३७में) किया है। ११ श्रुतिदुष्ट, १२ अर्थदुष्ट, १३ कल्पनादुष्ट, १४ श्रुतिकष्ट दोषोंका निरूपण (१।४७में) किया है। इनके अतिरिक्त भामहने आचार्य मेधावी द्वारा प्रोक्तके नामसे उल्लेख करते हुए उपमा अलङ्कारके सात दोषोंका निरूपण (२।३६में) किया है : १५ हीनता, १६ असम्भव, १७ लिङ्गभेद १८ वचनभेद, १६ विपर्यय, २० अधिकता और २१ असादृश्य, २२ बहुपूरण, (शब्दोंकी अनावश्यक भरती, अधिकपदताका) उल्लेख (५।६७में) किया है। इनके अतिरिक्त (५।६२में) अहृद्य और असुनिभेद एवम् अपेशलताका उल्लेख किया है। किन्तु ये पूर्वोक्त श्रुतिकष्टत्व, अवाचकत्व आदिके ही परिणाममूलक नामान्तर हैं। अतः पृथक् सञ्ज्ञाके अधिकारी नहीं हैं। इसी प्रकार (५।६७में प्रोक्त) विरुद्धपद एवम् अस्व्यर्थ भी अन्य दोषोंके ही नामान्तर हैं। इस प्रकार भामहने ११ + २२ = ३३ दोषोंका उल्लेख किया है। इनमें से कुछको भामहने शब्ददोषके रूपमें निरूपित किया है और कुछको अर्थदोषके रूपमें। यद्यपि इनका भामहकृत निरूपण व्यवस्थित और बहुत गम्भीर नहीं १. प्रसादिनी २।५१, पृष्ठ ४५ देखें।