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काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

३१८५] दोषोंका इतिहास २:३

तो निरूपण किया है और कुछका निरूपण सम्भवतः उनकी सुपरिचित दोषके रूपमें मान्यताके कारण न करके उनका उल्लेखमात्र प्रसङ्गेन किया है। अलङ्कारपरम्परामें मेधावी द्वारा उद्भावितके रूपमें प्रसिद्ध सात उपमा- दोषोंमें से तीनको उन्होंने अनित्यदोषके रूपमें लिङ्गभेद और वचनभेद दोषों के अतिरिक्त भामहप्रोक्त मेधाविसम्मत विपर्ययको उपमानकी हीनता और अधिकताके रूपमें प्रस्तुत किया है। मेधावीके असम्भव और सादृश्य दोष दण्डीकी उपमामें सम्भव ही नहीं है। मेधावीके भामहाभिमत हीनता और अधिकताके बारेमें दण्डी मौन हैं ।¹ इस प्रकार दण्डीके अनुसार कुल दोष प्रकृत दस दोषोंको मिलाकर २३ हैं। आचार्य भामहने दोषोंका निरूपण कई स्थानोंमें किया है। प्रकृत अपार्थ आदि ११ दोषोंका निरूपण उन्होंने चतुर्थ और पञ्चम परिच्छेदोंमें सुव्यव- स्थित रूपसे किया है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित २२ दोषोंमें से कुछका निरूपण और कुछका प्रसङ्गसे उल्लेखमात्र भिन्न-भिन्न स्थानोंपर किया हैं : १ आकुलताका उल्लेख (१।२५,३५; ३।५४; ५।६७में) किया है। २ अपुष्टार्थ (१।३४), ३ ग्राम्य शब्द (१।१६), ४ ग्राम्य अर्थ (१।३५) का भी उल्लेख किया है। ५ नेयार्थ, ६ क्लिष्ट, ७ अन्यार्थ, ८ अवाचक, ६ अयुक्तिमत् और १० गूढशब्दाभिधान दोषोंका पूर्णतया या अंशतः निरूपण (१।३७में) किया है। ११ श्रुतिदुष्ट, १२ अर्थदुष्ट, १३ कल्पनादुष्ट, १४ श्रुतिकष्ट दोषोंका निरूपण (१।४७में) किया है। इनके अतिरिक्त भामहने आचार्य मेधावी द्वारा प्रोक्तके नामसे उल्लेख करते हुए उपमा अलङ्कारके सात दोषोंका निरूपण (२।३६में) किया है : १५ हीनता, १६ असम्भव, १७ लिङ्गभेद १८ वचनभेद, १६ विपर्यय, २० अधिकता और २१ असादृश्य, २२ बहुपूरण, (शब्दोंकी अनावश्यक भरती, अधिकपदताका) उल्लेख (५।६७में) किया है। इनके अतिरिक्त (५।६२में) अहृद्य और असुनिभेद एवम् अपेशलताका उल्लेख किया है। किन्तु ये पूर्वोक्त श्रुतिकष्टत्व, अवाचकत्व आदिके ही परिणाममूलक नामान्तर हैं। अतः पृथक् सञ्ज्ञाके अधिकारी नहीं हैं। इसी प्रकार (५।६७में प्रोक्त) विरुद्धपद एवम् अस्व्यर्थ भी अन्य दोषोंके ही नामान्तर हैं। इस प्रकार भामहने ११ + २२ = ३३ दोषोंका उल्लेख किया है। इनमें से कुछको भामहने शब्ददोषके रूपमें निरूपित किया है और कुछको अर्थदोषके रूपमें। यद्यपि इनका भामहकृत निरूपण व्यवस्थित और बहुत गम्भीर नहीं १. प्रसादिनी २।५१, पृष्ठ ४५ देखें।

२२२ काव्यादर्श [३।१८५ तथा उसके अनुसार स्थापित लोकमर्यादाके विपरीत था । किन्तु द्रौपदीके भाग्यमें विधाताने लेख ही ऐसा लिखा था, जिसके अनुसार उसे इस प्रकारकी धर्मविरुद्ध स्थितिका निश्छल भावसे पालन करना था । अपने इसी कर्तव्यबोध तथा उसके पालनके कारण वह 'परम सती' कहलाई । इस प्रकार कविने चतुर्थ पादसे आगमविरोध दोषका परिहार कर दिया । महाभारतके लेखकने भी इसी लिये द्रौपदीके चरित्रके निरूपणमें शङ्करसे पाँच बार पति देनेकी प्रार्थना करने वाली ऋषिकन्याको शङ्कर द्वारा पाँच पति पानेके वरकी कल्पना की है । इस प्रकार आचार्यने (१०) देशादिविरोध दोषके छहों भेदोंमें कवि- कौशलसे दोषत्वका परिहार करके गुणत्वका उदाहरणोंसे निदर्शन किया । अन्य दोषोंके दोषत्वके परिहारकी दिशाका निर्देश आचार्य तत्तद् दोषके प्रसङ्गमें कर चुके हैं । दोषधुन्धुत्तरी प्राप्ता नगोच्चं भरतं शुभा । काव्यदोषनिराकृत्या सोपयोगा पयस्विनी ॥ १ ॥ दण्डिदेवप्रयागेऽथ रम्या हृद्या सुधीहिता । भामहोपत्यकाग्रामवगाहधौतधीमला ॥ २ ॥ दोषस्रोतस्विनी सेयं व्याख्याता मूलशोधनात् । भाद्राजैकादशीसौम्ये प्रातश्चन्द्रे रहो गते ॥ ३ ॥ — ० — शुभे विंशे दिनेऽगस्त्यमासस्याद्य गुरौ पुनः । दोषशैवलिनी रम्या वामनग्रामतो गता ॥ १ ॥ विशेषान् यानथ प्राप्ता रुद्रटतीर्थसङ्गता । व्याख्यास्ये तानहं सम्यक् सर्वस्यानन्दवर्धनान् ॥ २ ॥ प्रीयतामथ पुण्येयं सर्वभूतिप्रदा शिवा । इदम्परमवद्धेजा धीप्रदा शारदा मयि ॥ ३ ॥ दोषोंका इतिहास—आचार्य दण्डीने इन सर्वमार्गसाधारण दस दोषोंके अतिरिक्त मार्गविशेषके कुछ अन्य दोषोंकी चर्चा भी काव्यादर्शमें यत्र तत्र की है । उनमें से बन्धके १ शैथिल्य, २ वैषम्य और ३ पारुष्य नामक तीन दोष, ४ दुष्प्रतीति, ५ शब्दगत और ६ अर्थगत ग्राम्यता दोष, ७ नेयार्थता, ८ आकुलता और ६ लोकसीमातिक्रमण दोषोंका उल्लेख प्रथम परिच्छेदके गुणप्रकरणमें (पृष्ठ ६८में) किया जा चुका है । दण्डीने इनमें से कुछका

३१=५] दोषोंका इतिहास २२५ आचार्य रुद्रटने वामनकी व्यवस्थामें थोड़ा परिष्कार किया : उन्होंने दोषों को (१) शब्दगत और (२) अर्थगत दो प्रकारका बताकर पदमें अथवा वाक्यमें स्थित (i) पदगत, (ii) वाक्यगत एवम् (iii) अर्थगतके रूपमें व्यवस्थित किया । १ आचार्य भोजने तो रुद्रटके वर्गीकरणको आधार बनाया ही है, मम्मटने भी रुद्रटके वर्गोंमें आनन्दवर्धनोक्त रसविरोधको एक वर्गके रूपमें जोड़कर व्यवस्थाको पूर्णतया विकासकी स्थितिमें प्रस्तुत किया है । रुद्रटने कुछ नवीन दोषोंकी उद्भावना भी की है । उनमें सर्वाधिक महत्त्व- पूर्ण दोष है विरस नामक अर्थदोष : अन्य रसके प्रसङ्गमें क्रमके विपरीत जो कोई दूसरा रस आ जाए, तब विरस नामक दोष होता है । २ इस दोषका महत्त्व इस बातसे और बढ़ जाता है कि काव्यमें रसके महत्त्वको अपने-अपने ढंगसे स्वीकार करते हुए भी दण्डी, भामह और वामन रसके महत्त्वके बारेमें उतने स्पष्ट और मुखर नहीं हैं, जितने कि रुद्रट हैं । काव्यको रसयुक्त बनाने को अत्यधिक (महीयस्) यत्नका उनका उपदेश ३ और शान्तसमेत नौ रसोंका उनका निरूपण उन्हें रसको ‘रसवत्’ नामक अलङ्कार मानने वाले आचार्योंकी अपेक्षा रसको अत्यन्त महत्त्व देनेवाले आचार्य आनन्दवर्धनके कहीं अधिक निकट सिद्ध करता है । आगेका इतिहास भी यही कहता है । रीतियोंका रसोंसे सम्बन्ध भी रुद्रटने ही सर्वप्रथम जोड़ा है । ४ इस प्रकार गुणों और १. असमर्थमप्रतीतं विसन्धि विपरीतकल्पनं ग्राम्यम् । अव्युत्पत्ति च देश्यं पदमिति सम्यग् भवेद् दुष्टम् ।। काव्यालं० ६।२ तत्र पदं वाक्यं वा पुनरुक्तं नैव दोषाय ।। ३४ यस्मिन्तनेकमर्थं स्वयमेवालोचयेत् तदर्थानि । जल्पन् पदानि तेषामसङ्गतिर्नैव दोषाय ।। ३८ वाक्यं भवति तु दुष्टं सङ्कीर्णं गर्भितं गतार्थं च । ४० अपहेतुरप्रतीतो निरागमो बाध्यन्नसम्बद्धः । ग्राम्यो विरसस्तद्वानतिमात्रश्चेति दुष्टोऽर्थः ।। ११।२ २. अन्यस्य यः प्रसङ्गे रसस्य निपतेद् रसः क्रमापेतः । विरसोऽसौ; स च शक्यः सम्यग् ज्ञातुं प्रबन्धेष्यः ।। काव्या० ११।१२ ३. ननु काव्येन क्रियते सरसानामवगमश्चतुर्वर्गे । लघु मृदु च; नीरसेभ्यस्ते हि त्रस्यन्ति शास्त्रेभ्यः ।। काव्या० १२।१ तस्मात् तत् कर्तव्यं यत्नेन महीयसा रसैर्युक्तम् । ४. इह वैदर्भी रीतिः पाञ्चाली वा विचार्य रचनीया । मधुरललिते कविना कार्ये वृत्तौ तु शृङ्गारे ।। काव्यालं० १४।३७

२२६ काव्यादर्श [३।१८५ रीतियोंका रससे अविनाभाव सम्बन्ध स्थापित करनेकी दिशामें प्रेरणास्रोत परोक्ष रूपसे रुद्रटका ही योगदान है। यह हमें बादमें आनन्दवर्धनके ध्वनि- सिद्धान्तमें निरूपित मिलता है। अतः रुद्रट कुछ बातोंमें आनन्दवर्धनके पथिकृत् हैं, यह कहना अनुचित नहीं होगा। आनन्दवर्धनने रुद्रटके विरसको ही अपने सिद्धान्तके अनुकूल सर्वाधिक शोभाविघातक माना है। श्रुतिकष्टत्व आदि अन्य दोषोंको वे रसविरोधक होनेपर ही हेय (दोष) मानते हैं।१ किन्तु रसविरोध और तीन प्रकारसे व्या- ख्यात वृत्त्यनौचित्यको उन्होंने काव्यमें सर्वाधिक हेय माना है।२ इस प्रकार आनन्दवर्धनकी दृष्टिमें दोषत्वका आधार रसभङ्ग है। रुद्रटसे एक दोष विरसके रूपमें सूक्ष्म रूपसे उद्भूत इस दृष्टिभेदको इस प्रकार आनन्दवर्धनने सैद्धान्तिक आधार दिया तथा दोषके स्वरूपको एक नई दिशा दी। आचार्य महिमभट्टने उसे पल्लवित किया। उन्होंने आनन्दवर्धन द्वारा सङ्केतित अनौचित्यका यों विस्तार किया—विवक्षित रस आदिकी प्रतीतिमें विघ्न डालना अनौचित्यका सामान्य स्वरूप है।३ उसके (क) अन्त- रङ्ग और (ख) बहिरङ्ग दो भेद हैं। (क) विभाव, अनुभाव और व्यभि- चारी भावोंके अयथावत् विनियोगके कारण रसादिकी प्रतीतिमें साक्षात् (अर्थ के द्वारा) विघ्न आनेसे अन्तरङ्ग अनौचित्यके कारण रसभङ्ग होता है। यही १. श्रुतिदुष्टादयो दोषा अनित्या ये च दर्शिताः । ध्वन्यात्मन्येव शृङ्गारे ते हेया इत्युदाहृताः ।। ध्वन्यालोक० २।११ २. विरोधिरससम्बन्धिविभावादिपरिग्रहः । विस्तरेणान्वितस्यापि वस्तुनोऽन्यस्य वर्णनम् ।। ध्वन्यालोक ३।१८ अकाण्ड एव विच्छित्तिरकाण्डे च प्रकाशनम् ।। परिपोषं गतस्यापि पौनःपुन्येन दीपनम् ।। रसस्यापि स्याद् विरोधाय वृत्त्यनौचित्यमेव च ।। १६ वृत्ति : तथा (i) वृत्तेर्व्यवहारस्य यदनौचित्यं, तदपि रसभङ्गहेतुरेव ।... यदि वा (ii) वृत्तीनां भरतप्रसिद्धानां कैशिक्यादीनां, (iii) काव्यालङ्का- रान्तरप्रसिद्धानामुपनागरिकाद्यानां वा यदनौचित्यमविषये निबन्धनम्, तदपि रसभङ्गहेतुः । ३. व्यक्तिविवेक, चौखम्बा, १६६४ ई०, पृष्ठ १८२ : एतस्य च विवक्षित- रसादिप्रतीतिविघ्नविधायित्वं नाम सामान्यलक्षणम् । अन्तरङ्ग- बहिरङ्गभावश्चानयोः साक्षात् पारम्पर्येण च रसभङ्गहेतुत्वादिष्टः ।

[३।२८५] दोषोंका इतिहास २२७ आनन्दवर्धनका रसविरोध दोष है। (ख) शब्दके अनुचित प्रयोगके द्वारा अर्थप्रतीतिमें विघ्न आनेसे रसभङ्ग करना बहिरङ्ग अनौचित्य है। महिम- भट्टने इस शब्ददोषके छह भेद बताये हैं : (१) विधेयाविमर्श, (२) प्रक्रमभेद, (३) क्रमभेद, (४) पौनरुक्त्य, (५) वाच्यावचन एवम् (६) अवाच्यवचन।¹ अग्निपुराणमें दण्डिसम्मत (क) उद्वेजकता तथा (ख) असुखोच्चार्यमाणता को दोषका व्यावर्तक धर्म बताकर दण्डी, भामह और वामनके दोषोंको ही अपने ढंगसे व्यवस्थित किया गया है।² उनका पूर्वाचार्योंसे तत्त्वतः दृष्टिभेद नहीं है। पद, वाक्य और वाक्यार्थके रूपमें तीन आधारोंमें प्रत्येकमें १६, कुल ४८ दोष बतानेपर³ भी दोषोंके सैद्धान्तिक विकासमें भोजका कोई विशिष्ट योगदान नहीं है। अवान्तरभेदनिरूपणमें उनके चिन्तनका यत्किञ्चित् महत्त्व हो सकता है। परंतु तत्त्वतः वे रुद्रटसे आगे नहीं बढ़े हैं। मम्मटाचार्यने आनन्दवर्धन और महिमभट्टके निरूपणके आधारपर मुख्य अर्थके अपकर्षको दोषका लक्षण बताया। 'मुख्य अर्थ' उनके मतमें ध्वनि- सम्प्रदायके परमाचार्य आनन्दवर्धन द्वारा प्रोक्त तथा अग्निपुराण द्वारा अनूदित 'रस' है। महिमभट्टने ही 'रसप्रतीतिविघ्नविधायित्व' को दोषका सामान्य लक्षण कहा था। मम्मटने उसीका सङ्क्षेप 'मुख्यार्थहति'के रूपमें किया है। १. व्यक्तिविवेक, पृष्ठ १७६ : इह खलु द्विविधमनौचित्यमुक्तम् (क) अर्थ- विषयं शब्दविषयं चेति। तत्र (क) विभावातुभावव्यभिचारिणामयथायथं रसेषु यो विनियोगः, तन्मात्रलक्षणमेकमन्तरङ्गमाचार्यैरेवोक्तमिति नेह प्रतन्यते । (ख) अपरं पुनर्बहिरङ्गं बहुप्रकारं सम्भवति । तद्यथा— १ विधेयाविमर्शः, २ प्रक्रमभेदः, ३ क्रमभेदः, ४ पौनरुक्त्यं, ५ वाच्या- वचनमपि सङ्गृहीतं वेदितव्यम्, तस्यापीष्टार्थविपर्ययात्मकत्वात् । महिम- भट्ट दोषोंके इष्टविपर्ययात्मकत्वके बारेमें वामनके 'गुणविपर्ययात्मानो दोषाः' सिद्धान्तसे प्रभावित हैं। वामनके यहाँ चाहे गुण रसके धर्म न हों, रसवादी आचार्य आनन्दवर्धन और उनसे प्रभावित अन्य आचार्योंके मतमें गुण और रस अविनाभूत हैं। २. उद्वेगजनको दोषः सभ्यानाम् । अग्निपुराण ३४७।१ दोषत्वमनुबध्नाति सज्जनोद्वेजनादृते । असुखोच्चार्यत्वं कष्टत्वम्...।। १० ३. दोषाः पदानां, वाक्यानां, वाक्यार्थानां च षोडश । हेयाः काव्ये कवीन्द्रैर्यै तानेवादौ प्रचक्ष्महे ।। सरस्वती० १।३

२२८ काव्यादर्श [३।१८५ पूर्वचार्योंके दोषलक्षणका अनुवाद करनेके बाद व्यवस्थापण्डित मम्मटने भरतसे प्रारब्ध भोजावधिक दोषभेदपरम्पराकी सुन्दर व्यवस्था (१) पददोष (२) वाक्यदोष, (३) अर्थ दोष और (४) रसदोषके रूपमें निम्नलिखित प्रकारसे की :१ (१) पद-दोष १६ बताये हैं।२ इनमें से ७ दोष पदांशगत भी हैं, तथा १३ दोष वाक्यगत भी हैं।३ (२) इन १३ के अतिरिक्त २१ दोष वाक्यके ही बताये हैं।४ (३) अर्थदोष २३ बताये हैं।५ (४) रस दोष १३ दिये हैं।६ इसके अतिरिक्त विशेष परिस्थितियोंमें दोषोंकी दण्डी आदि द्वारा १. काव्यप्रकाश ७।१ (७१) : मुख्यार्थहतिर्दोषः । रसश्च मुख्यः । तदाश्रयाद् वाच्यः । उभयोपयोगिनः स्युः शब्दाद्याः । तेन तेष्वपि सः । वृत्ति : हतिरपकर्षः । 'शब्दाद्या' इत्याद्यग्रहणाद् वर्णरचने । २. दुष्टं पदं १श्रुतिकटु२ च्युतसंस्कृत्यप्रयुक्त३मसमर्थम्४ । ५निहतार्थमनुचितार्थं६, ७निरर्थकमवाचकं८, ९त्रिधाऽश्लीलम्१० ।। १०सन्दिग्धमप्रतीतं११, ग्राम्यं१२, १३नेयार्थमथ भवेत् क्लिष्टम्१४ । अविमृष्टविधेयांशं१५, विरुद्धमतिकृत्१६ समासगतमेव ।। काव्यप्रकाश ७२ ३. अपास्य च्युतसंस्कारमसमर्थं निरर्थकम् । वाक्येऽपि दोषाः सन्त्येते; पदस्यांशेऽपि केचन ।। काव्यप्रकाश ७४ केचन -- श्रुतिकटु, निहतार्थ, निरर्थकता, अपाचकत्व, त्रिविध अश्लील, सन्दिग्ध, नेयार्थ दोषोंके उदाहरण सम्भवके आधार पर दिये हैं । ४. १प्रतिकूलवर्णं२मुपहत-लुप्त-विसर्गं३, विसन्धि४, हतवृत्तम्५ । ६न्यूनाधिक७-कथित-पदं८, पतत्प्रकर्षं९, समाप्तपुनरात्तम्१० ।। ११अर्धान्तरैकवाचकमभवन्मतयोग१२मनभिहितवाच्यम्१३ । अपदस्थ-पद१४-समासं१५, संकीर्णं१६, गर्भितं१७, प्रसिद्धिहतम्१८ ।। १९भग्नाप्रक्रममक्रम२०ममतपरार्थं२१ च वाक्यमेव तथा । काव्यप्रकाश ७५ ५. अर्थोऽपुष्टः१, कष्टो२, व्याहत३-पुनरुक्त४-दुष्क्रम५-ग्राम्याः६ ।। सन्दिग्धो७, निर्हेतुः८, प्रसिद्धि९-विद्या-विरुद्धश्च१० । अनवीकृतः११, सनियमा१२नियम१३विशेषा१४विशेषपरिवृत्ताः१५ ।। साकाङ्क्षो१६ऽपदयुक्तः,१७, सहचरभिन्नः,१८, प्रकाशितविरुद्धः१९ । २०विध्यनुवादा२१युक्तस्त्यक्तापुनःस्वीकृतो२२ऽश्लीलः२३ ।। ७६ ६. व्यभिचारि१-रस२-स्थायि३भावानां शब्दवाच्यता । कष्टकल्पनया व्यक्तिरनुभाव४विभावयोः५ ।।

३।१८५ ] दोषोंका इतिहास २२६ प्रोक्त अदोषताका निरूपण भी सङ्क्षेपसे मम्मटने किया है। अदोषताका आधार प्रायः दण्डीका अनुगामी है। मम्मटके बाद दोषोंकी व्यवस्थाके विषयमें कोई विशेष योगदान काव्य- शास्त्रमें उपलब्ध नहीं होता। निष्कर्ष—दोषके स्वरूपके विकासमें भरतसे प्रारब्ध परम्पराने दण्डीके काव्यादर्शमें जिस स्वरूपको प्राप्त किया, वह भामह, वामनमें यथावत् उपलब्ध होता है। दोषोंकी सङ्ख्या तथा उनकी व्यवस्था में विकास क्रमशः इन्हीं आचार्योंमें उपलब्ध होता है। दोषके स्वरूपमें क्रान्तिकारी विकास ‘विरस’ की उद्भावनासे आचार्य रुद्रटने किया है। उन्होंने व्यवस्थाके वामनके आधारमें भी कुछ सुधार करके दोषोंको पद, वाक्य, तथा अर्थमें, आश्रित किया। आनन्दवर्धनने रुद्रटके ‘विरस’ का विस्तार किया और असभङ्गको दोषका आधार निरूपित किया। महिमभट्टने आनन्दवर्धनको ही आधार बनाकर दोषोंकी व्यवस्थाको रसाश्रय किया। अग्निपुराणकार और भोजने स्वरूपमें कोई विकास नहीं किया। वे वस्तुतः रुद्रटसे बहुत आगे नहीं बढ़ सके। मम्मटने (क) स्वरूप आनन्दवर्धन और महिमभट्टके अनुसार निरूपित किया एवं (ख) भेदविकल्पनको उन तक उपलब्ध पद, वाक्य, उभय और अर्थके अतिरिक्त रसको दोषका आश्रय बना करके सुन्दर प्रकारसे व्यवस्थित किया है॥ १८५॥ भाद्रकृष्णत्रयोदश्यां मन्दवासरेऽपराह्नके। पुष्यभे कर्कगे चन्द्रे दोषेतिहासदर्शनम् ॥ १ ॥ मम्मटान्तं व्यधाय्येतदर्प्यते भवपादयोः। धौतयोर्गाङ्गपाथोभिः पूतैर्भक्ताश्रुबिन्दुभिः ॥ २ ॥ प्रीयतामनया स्तुत्या शास्त्रचर्चाऽभिरूपया। पश्वीशो भगवान् मादृक्पशुपाराविपाशनः ॥ ३ ॥ —०— प्रतिकूलविभावादिग्रहो⁶, दीप्तिः⁷ पुनः पुनः । अकाण्डे ‘प्रथनच्छेदा’वङ्गस्याप्यतिविस्तृतिः¹⁰ ॥ अङ्गिनोऽननुसन्धानं,” प्रकृतीनां विपर्ययः¹² । अनङ्गस्याभिधानं¹³ च रसे दोषाः स्युरीदृशाः ॥ काव्यप्रकाश ८२

२३० काव्यादर्शः [३।१८६-१८७ (उपसंहार) शब्दार्थांलङ्क्रियाश्चित्रमार्गाः सुकर-दुष्कराः । गुणा दोषाश्च काव्यानामिति संक्षिप्य दर्शिताः ॥ १८६॥ (फलश्रुति) व्युत्पन्नबुद्धिरमुना विधिविदर्शितेन मार्गेण दोषगुणयोर्वशवर्तिनीभिः । काव्योंके (१) शब्दके और (२) अर्थके अलङ्कार, (३) सुकर और (४) दुष्कर चित्र अलङ्कारके विविध प्रकार, (५) गुण एवं (६) दोष इस प्रकार सङ्क्षेप करके दिखला दिये हैं ॥ १८६ ॥ अपूर्वका विधान करनेके द्वारा दर्शित इस पद्धतिसे दोष और गुण (काव्यके शोभाघातक और शोभाविधायक धर्मों) के विषयमें ज्ञानसम्पन्न बुद्धि उपसंहार—काव्यादर्शके प्रारम्भमें आचार्यने काव्यका स्वरूप बताना (काव्यलक्षण) काव्यादर्शका उद्देश्य बताया था । उसके अन्तर्गत उन्होंने (१) इष्टार्थकी गमक पदावली अर्थात् शब्द और अर्थरूपी शरीरका वर्णन विविध प्रकारसे—छन्दोविधान, भाषाविधान, विनियोगकी दृष्टिसे—प्रथम परिच्छेद में किया है । फिर (२) उस शरीरके (क) मार्गविशेषसे सम्बद्ध विशेष अलङ्कारों गुणोंका निरूपण मार्गविभागके रूपमें प्रथम परिच्छेदके शेष भागमें करके (ख) साधारण अलङ्कारोंका विवेचन द्वितीय और तृतीय परिच्छेदोंमें किया है । इस परिच्छेदमें उन्होंने सुकर और दुष्कर चित्रालङ्कारोंका प्रस्थान (१) यमक, (२) विविध आकारबन्ध, (३) वर्णनियमवान् बन्ध और (४) प्रहेलिकाओंके रूपमें किया है । उसके अनन्तर (ग) काव्यके सर्वमार्गसाधारण दोषोंका निरूपण तृतीय परिच्छेदके शेष भागमें किया है । ॥ १८६ ॥ काव्यादर्शके तृतीय परिच्छेदके विषयोंका सङ्ग्रह प्रकृत उपसंहारश्लोकमें आचार्य दण्डीने प्रस्तुत किया है : फलश्रुति--तृतीय परिच्छेदके अन्तिम श्लोकमें आचार्य दण्डीने काव्या- दर्शमें प्रतिपादित मार्गका अनुसरण करनेकी फलस्तुति एक रमणीय उपमाके साथ बताई है । अपूर्वका कथन विधि होता है एवं पूर्वतः प्राप्तका कथन अनुवाद । अपने निरूपणको आचार्यने 'विधि' कहा है । इसका आशय यह है कि आचार्यने जिस भी विषयका प्रतिपादन किया है, उसे अपूर्वविधानके रूपमें प्रस्तुत किया है । अर्थात् अपनी मौलिक उद्भावनाएँ की हैं ।

३।१८७] फलश्रुति २३१ वाग्भिः कृताभिसरणां मदिरेक्षणाभिर् धन्यो युवेव रमते, लभते च कीर्तिम् ॥ १८७ ॥ वाला, बसमें आई हुई वाणीके साथ अभिसार करने वाला (कवि और सहृदय) उसी प्रकार आनन्दलाभ और यश प्राप्त करता है, जिस प्रकार कोई बुद्धिमान्, धन्य (पुण्यवान् अथवा धनसम्पन्न), कामशास्त्रोक्त मार्गसे स्त्रियोंके दोष और गुणोंको समझने वाला युवा अपनी वशवर्तिनी मादक नयनों वाली रमणियोंके साथ रमण करता है और यश प्राप्त करता है ॥ १८७ ॥ वाक्से शब्दार्थरूप काव्यशरीर अभिप्रेत है । उपमान और उपमेयमें लिङ्ग- साम्यके लिये स्त्रीलिङ्ग 'वाक्' शब्दका प्रयोग किया है । काव्यके विविध प्रकारोंका बोध करानेको 'वाक्'को बहुवचनमें प्रयुक्त किया है । किसी भी विधानका प्रयोजन हेय और उपादेयका ज्ञान प्राप्त करना होता है । काव्यमें हेय अर्थात् शोभाघातक धर्मोंको आचार्यने 'दोष' कहा है और शोभाधायक उपादेय धर्मो गुण और अलङ्कारोंको 'गुण' शब्दसे ग्रहण किया है । इस प्रकार इन दो शब्दोंसे आचार्यने अपने ग्रन्थके सभी विषयोंको सङ्क्षेपसे प्रस्तुत किया है । किसी शास्त्रका प्रयोजन बुद्धिमें व्युत्पत्तिका, विवेकका, होना है । शास्त्रके प्रमेयोंके विषयमें व्युत्पत्ति (ज्ञान) होनेपर ही उसका उपयोग हो सकता है । इससे प्रमेय वशवर्ती हो जाता है । काव्यकी कल्पना आचार्यने रमणीके सादृश्यसे व्यक्त की है । उसके साथ सङ्केतपूर्वक विहार प्रेमिकाके साथ विहारके समान आनन्ददायी है । अर्धा- ङ्गिनीके साथ विहार उसकी तुलना नहीं कर सकता । रमणी जिस प्रकार मदिर (मादक) होती है, वैसे ही कविता भी मदिर होती है । ऐसी कविता का प्रणेता कवि एवं सहृदय पाठक दोनों धन्य हैं । ये कवितासे आत्मतोषके रूपमें आनन्दलाभ तो करते ही हैं, लोकमें यश भी प्राप्त करते हैं । रति और कीर्ति उपलक्षक हैं काव्यके चतुर्वर्गप्राप्ति आदि समस्त फलोंका । १ इन्हें आचार्य ने (१।३ में) लोकयात्राकी प्रवृत्तिके रूपमें कहा है । १. रत्नश्री : उपलक्षणं चैतत् — चतुर्वर्गसिद्धिमपि चाधिगच्छति । यथोक्तं प्रथमे परिच्छेदे ।

२३२ काव्यादर्श [३।१८७ ॥ इति श्रीदण्ड्याचार्यकृतौ काव्यादर्शे शब्दालङ्कार-दोष-लक्षणः तृतीयः परिच्छेदः सम्पूर्णः ॥ ॥ श्रीयुत आचार्य दण्डी द्वारा प्रणीत काव्यादर्शमें 'शब्दालङ्कारों और दोषोंका स्वरूपकथन' नामक तृतीय परिच्छेद सम्पूर्ण हुआ ॥ डॉ० जयशङ्कर त्रिपाठीने प्रथम और तृतीय परिच्छेदोंके उपसंहारोंमें वाक्‌की बहुत भिन्न प्रकारकी कल्पनाके कारण यह माना है कि ये दोनों उप- संहार एक लेखकके नहीं हो सकते। कविता और वनिताकी समानता पहली बार भामहके काव्यालङ्कार (१।१३, ३।५४) में कही गई है और उसीका अनु- करण इस तृतीय परिच्छेदमें हुआ है।२ त्रिपाठीजीका यह कथन तब तो उचित कहा जा सकता था अगर 'वाक्' का दोनों जगह एक ही अर्थ होता। दण्डीने प्रथम परिच्छेदमें ही वाक्‌का प्रयोग चार अर्थोंमें किया है : (१) वाणी, (२) वाङ्मय काव्य, (३) गाय और (४) सरस्वती। यहाँ वाङ्मय काव्यकी कल्पना यदि वनिताके रूपमें की है, तो पूर्वापरविरोध कहाँ हुआ ? प्रथम परिच्छेदके उपसंहारमें काव्य- निर्माणकी क्षमता पानेके लिये वाक्‌की कल्पना सरस्वतीके रूपमें की है। तृतीय परिच्छेदमें भिन्न प्रसङ्गमें वाक्‌की कल्पना 'कोमल कान्त काव्य' अर्थमें कान्ताके रूपमें की है। प्रसङ्गभेदसे कल्पनाभेद तो कवियोंमें बहुलतासे उप- लब्ध होता है। उसके कारण भिन्नकर्तृत्व यदि कहेंगे, तो कोई भी रचना एककर्तृक नहीं रह पायेगी। 'वश्यवाणिकविचक्रवर्ती' जैसा प्रयोग करनेवाले कविको 'वाग्देवी' शब्दके प्रयोगका अधिकार ही नहीं रहेगा। विद्वान् या कविको 'वागीश' कहने वाला कोई भी तब तो वागीश्वरीका अर्थ 'सरस्वती' नहीं कर पायेगा। अतः त्रिपाठीजीकी यह कल्पना उचित नहीं है ॥ १८७ ॥ ( टीकाकी समाप्तिका काल ) भाद्रकृष्णत्रयोदश्यां शनैर्वारे निशीथके। युगयुग्मनभोनेत्रे २०४४ हायने वैक्रमे शुभे ॥ १ ॥ द्वाविंशदिवसेऽगस्त्ये मुनिवसुग्रहैर्भुवि १६८७। ईसाऽब्दे ख्यापिता टीका काव्यादर्शप्रसादिनी ॥ २ ॥ प्रियायाः कुसुमाख्यायाः सहयोगोऽत्र कारणम् । सा भूयादावयोः कीर्त्यै यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ ३ ॥ २. आचार्य दण्डी एवं संस्कृत काव्यशास्त्रका इतिहासदर्शन, पृष्ठ ४०३ ।

प्रसादिनीकारका निवेदन २३३ ( काव्यादर्श-प्रशंसा ) अहो एतस्य वैमल्यं सुधी-हृदय-रञ्जनम् । दण्ड्याचार्यमतेर्गर्भात् प्रसूतस्य विराजते ॥ ४ ॥ (दण्ड्याचार्यस्तुतिः) भामहो न विधुस्तुल्यः क्षीणः पक्षान्तरे स्थितः । सञ्छन्नो मेघमालाभिः शुक्ले पक्षेऽप्यशोभनः ॥ ५ ॥ विसञ्ज उद्धटः सोऽयं काव्ये व्याकरणं श्रयन् । दण्डिनि प्रतिपक्षे व भामहं मध्यमं नृपम् ॥ ६ ॥ रीतित्रयप्रभेदेन त्रिविक्रमायते तु यः । किं पुनर्बलिनो ह्यस्य सम्मुखे वामनो हि सः ॥ ७ ॥ (टीकाकारका परिचय) खरकग्रामभूः पुण्या ब्रह्मदत्तबुधप्रसूः । विद्याशौर्याढ्यहर्याणे श्रीरोहितकमण्डले ॥ ८ ॥ शिवकरणशर्मख्यविप्रस्यासन् सुताः स्तुताः । ब्रह्मण इव वेदार्या विष्णु-माडू यमौ तयोः ॥ ६ ॥ तुलसीराम-रामज्यौ तृतीयस्य सुतास्त्रयः । हरिरामारुणो ग्रस्तो मध्येऽह्नो मृत्युराहुणा ॥ १० ॥ अस्ति तस्यात्मजः शास्त्री व्रजनारायणः सुधीः । हरिरामानुजः श्रीमान् श्रीनिवासो विदां वरः ॥ ११ ॥ ज्योतिर्विद्भूषणं शैवः पूतात्मा तपसा परम् । रामविलासनामास्यास्त्यनुजो दैववित् परः ॥ १२ ॥ मयि स्निग्धाऽस्य भार्या च पूज्या कलावती शुभा । कनीयानस्ति पुत्रः श्रीमुरारीलालसञ्ज्ञकः ॥ १३ ॥ विष्णुदत्तस्य शास्त्रेषु नैकेषु व्याकृतौ श्रुतौ । कर्मकाण्डे च नाक्षत्रे वेदान्ते प्रथितो बुधः ॥ १४ ॥ बाणाङ्कग्रहभूवर्षे १६६५ वैक्रमेऽशुक्लपक्षतौ । ज्येष्ठे प्रार्तजनिर्मेऽभूत् सीतायां श्रीनिवासतः ॥ १५ ॥ भगवती च विद्या च भगिन्यौ पुण्यलक्षणे । तारादेवी शुभा भार्या कैशोरात् सङ्गिनी ययौ ॥ १७ ॥ लोकान् दिव्यान् सुखान् भोक्तुमतुष्यन्तीव मानुषे । कुसुमाख्या ततश्चोढाऽम्बाऽऽदेशेन शुभोदया ॥ १७ ॥

२३४ काव्यादर्श किरोड़ीमलमहाविद्यालये दिल्लोस्थिते गिराम् । दिव्यानां पाठकः पुण्यैर्लेखनीं ग्राहितः करे ॥ १८ ॥ (१) आद्यानिरुक्तमीमांसा, (२) निरुक्ताध्यायपञ्चके । (३) अध्यायत्रितये चैव विद्वच्छात्रोपयोगिके ॥ १६ ॥ व्याख्ये, (४) वैदिकवाङ्मये भाषाचिन्ता तुरीयिका । (५) तारोदयाख्या व्याख्या च सत्तर्कसङ्ग्रहे, ततः ॥ २० ॥ (६) बालप्रबोधिनी टीकोपन्यासश्च पुरातने । तर्कसङ्ग्रहटीके द्वे पाठशोधात् प्रकाशिते ॥ २१ ॥ (७) आद्याध्याययोर्व्याख्या गीताभाष्यनवाम्बरा । (८) टीकेशोपनिषद्भाष्ये कुसुमाञ्जलिनामिका ॥ २२ ॥ (६) निगमबोधतीर्थस्य श्रीशङ्करजगद्गुरोः । चरिताख्यानकाव्यस्यान्वयानुवादभूषणम् ॥ २४ ॥ (१०) सिद्धान्तकौमुदीम्वादि व्याख्याऽऽद्या भवतोषिणी । छात्रावस्थाकृतारम्भा पूरिताऽध्यापकेन या ॥ २३ ॥ त्रयोविंशतिरस्यांश्च लिखितायाः समा गताः । प्रकाश्येति' दशग्रन्थीसन्तत्याऽतुष्टमानसः ॥ २५ ॥ विद्वत्पादरजोमृष्टाशेषधातुमलः शिवः । (११) टीकामातनवं चेमां दययाच्छात्रमण्डले ॥ २६ ॥ भक्त्या दण्डिनि, गीर्देव्याः कृपया, पुण्यसम्पदा । ब्राह्मम्यं सफलं मन्वे गीर्वागध्ययनं तथा ॥ २७ ॥ (आशीः) शास्त्रचर्चामिषेणेयमाराधना शुभप्रदा । प्रीतये युषदो देव्यै बोभूताद् दण्डिनो मयि ॥ २८ ॥ प्रीयतां चैव नित्या सा नित्य वागीश्वरी शुभा । विधौतान्तर्मला दिव्या चतुर्वर्गप्रदायिनी ॥ २६ ॥ श्रद्धयेतोऽपि भूयस्या सेवेय भारतीं सदा । आविर्भयान्मतौ मे सा मन्दायामपि भास्वती ॥ ३० ॥ त्रिभिरृणैर्ऋणावा यज्जायते पुरुषस्त्विह । तेषामेकतमस्यापि लभेयानृण्यमंशतः ॥ ३१ ॥ ॥इति श्रीदण्ड्याचार्यकृतौ काव्यादर्शे तृतीये शब्दालङ्कार-दोष-लक्षण-परिच्छेदे शिवनारायणशास्त्रिकृता प्रसादिनी नाम टीका पूर्णा ॥ १. विश्वविद्यालयेनेयं दिल्याख्येन प्रकाशिता । भूयसा विदुषां तोषमाधेयादवलोकिता ॥

तृतीय परिच्छेदकी श्लोकानुक्रमणी श्लोकाङ्क श्लोकप्रतीक पृष्ठ श्लोकाङ्क श्लोकप्रतीक पृष्ठ ६१ अगागाङ्गाङ्गकाकाक ११४ १७३ इति लौकिक एवायम् २१० ३ अत्यन्तबहवस्तेषां ६ ३३ इति व्यपेतयमक ४३ ११२ अत्रोद्याने मया दृष्टा १४१ १७१ इत्थं कलाचतुःषष्टौ २०८ ६० अनङ्गलङ्गनालग्न ११२ ३७ इत्यादिपादयमक ४७ १७७ अनाहिताग्नयोऽप्येते २१४ १५१ इत्यादि शास्त्रमाहात्म्य १७६ १३७ अनुकम्पाऽऽयतिशयः १६४ १३० इदमस्वस्थचित्तानाम् १५६ १२५ अपार्थं व्यर्थमेकार्थं १५२ १४७ इन्दुपादाः शिशिराः १६० ७ अरण्यं कैश्चिदाक्रान्तम् २१ १४६ ईदृशं संशयायैव १७० ५३ अर्धभ्यासः समुद्गः स्यात् ६६ १३६ उत्कामुन्मनयन्त्येते १६४ ८६ अलिनीलालकलतम् १११ ३२ उदितैरन्यपुष्टानाम् ४१ १४६ अवते भवते बाहुः १७७ १४४ उद्देशानुगुणोऽर्थानाम् १७२ १३५ अविशेषेण पूर्वोक्तं १६३ २५ उद्धता राजकादुर्वी ३४ ५२ उपोढरागाऽप्यबला ६५ १ अव्यपेतव्यपेतात्मा १ २ एकद्वित्रिचतुष्पाद ५ १७८ असावनुपनीतोऽपि २१५ १३१ एकवाक्ये प्रबन्धे वा १५६ १३३ अस्ति काचिदवस्था सा १६१ ७० एकाकारं चतुष्पादम् ८० ११६ आदौ राजेत्यधीराक्षि १४४ १०६ एताः षोडश निर्दिष्टाः १३२ १७२ आधूतकेसरो हस्ती २१० १८३ ऐन्दवार्दचिषः कामी २१६ १२ कथं त्वदुपलम्भाशा २५ ८४ आम्नायानामाहान्त्या १०५ ३ कमलेः समकेशं ते ३६ २४ आरुह्याक्रीडशैलस्य ३४ २६ करेण ते रणेण्वन ३६ ७३ आवृत्तिः प्रातिलोम्येन ८५ २१ करोऽतिताम्रो रामाणाम् ३२ ९८ आहुः समागतां नाम १२५ ११ करोति सहकारस्य २४ १६६ इति कालविरोधस्य २०४ १६५ कर्पूरपादपामर्श २०१ ६६ इति दुष्करमार्गेऽपि ११६ ५६ कलङ्कमुक्तं तनुमध्य ७२ १६ इति पादादियमकम् ३० ५६ कलापिनां चारुतया ६६

२३६ काव्यादर्श श्लोकाङ्क श्लोकप्रतीक पृष्ठ श्लोकाङ्क श्लोकप्रतीक पृष्ठ १७५ कापिलैरसदुद्भूतिः २१२ १०८ न मया गोरसाभिज्ञं १३८ १४३ कामार्ता घर्मतप्ता वे १७१ ८८ नयनानन्दजनने ११० १५८ कामेन बाणा निशिताः १६१ ४६ नयानयालोचनया ५६ ५० कालकालगलकाल ६१ ५५ नरा जिता माननया ६८ ३५ कालं कालमनालक्ष्य ४५ ६५ न श्रद्दधे वाचमलज्ज ७७ १०० कुब्जामासेवमानस्य १३६ १५६ न संहितां विवक्षामी १६३ १२२ केन कः सह सम्भूय १४६ १२१ न स्पृशत्यायुधं जातु १४६ ६७ क्रीडागोष्ठीविनोदेषु १२२ ७५ नादिनो नदना धीः स्वा ६१ ८५ क्षितिविजितिस्थित स्थिति १०७ ११४ नासिक्यमध्या परितश् १८४ १११ खातयः कनि काले ते १४० ५४ ना स्थेयः सत्त्वायावर्ज्यः ६७ १७६ गतिर्न्यायविरोधस्य २१३ १३ निगृह्य नेत्रे कर्षन्ति २६ ११४ गिरा स्खलन्त्या नम्रेण १४४ १३६ निर्णयार्थं प्रयुक्तानि १६८ १६३ चराचराणां भूतानां १६६ ६५ नूनन्तुन्नानि नानेन ११८ १६६ चोलाः कालागुरुश्यामा २०२ १८४ पञ्चानां पाण्डुपुत्राणां २२० १७ जयता त्वन्मुखेनास्मान् २६ १६७ पद्मिनी नक्तमुन्निद्रा २०३ १३२ जहि शत्रुकुलं कृत्स्नम् १६१ १३४ परदाराभिलाषो मे १६१ ११८ जितप्रकृष्टकेशाख्यो १४६ ६४ परम्परायावलवा ७६ १५५ तथापि कटु कर्णानिर्णाम् १५६ २७ परागतरुराजीव ३७ ४१ तव प्रिया सच्चरिता ४६ १४२ पश्याम्यनङ्गजातङ्क १७१ १८० तस्य राजः प्रभावेण २१७ २८ पातु वो भगवान् विष्णुः ३८ १६४ तेषु तेष्वयथारूढम् २०० १२७ प्रतिज्ञाहेतुदृष्टान्त १५५ १५० दक्षिणाद्रेरुपसरन् १७८ ६३ प्रभावतो नामन ७५ ११० दण्डे चुम्बति पद्मिन्या १३६ १८४ प्रमेयोऽप्यप्रमेयोऽसि २२० ६३ देवानान्नन्दनो देवो ११६ ८० प्राहुर्धर्भ्रमं नाम ६६ १२६ देशकालकलालोक १५३ १४७ बन्धुत्यागस्तनुत्यागः १७३ १६२ देशोऽद्रिवनराष्ट्रादिः १६७ ६१ बिभर्ति भूमेर्वलयम् ७४ १८२ दोलातिप्रेरणत्रस्त २१८ ४२ भवादृशा नाथ न ५० १०७ दोषानपरिसंख्येयान् १३३ ४६ मतान्बुनानानमताम् ५६ ७२ धराधराकारधरा ८३ ७६ मदनो मदिराक्षीणाम् ६८ ३८ न प्रपञ्चभयाद् भेदाः ४८ ८ मधुरं मधुरम्भोज २२ ५७ न मन्दया वर्जित ७१ २० मधुरेणदृशां मानम् ३१

तृतीय परिच्छेदकी श्लोकानुक्रमणी २३७ श्लोकाङ्क श्लोकप्रतीक पृष्ठ श्लोकाङ्क श्लोकप्रतीक पृष्ठ ८१ मनोभव तवानीकम् १०० १४ विशदा विशदामत्त २६ १४० मनोरथप्रियालोक १६६ १५ विषमं विषमन्वेति २७ १६० मन्दानिलेन चरता १६३ १७० वीरशृङ्गारयोर्भावौ २०५ ४२ मयामयालम्व्यकला ५८ ६६ व्युत्क्रान्तातिव्यवहिता १२६ १६ मानिता मा निनीषुस्ते २८ १५७ व्युत्पन्नबुद्धिरमुना २३० ४ मानेन मानेन सखि १६ १४८ शब्दहीनमनालक्ष्य १७५ १६१ मानेर्ष्वे इह शीर्येते १६४ १५६ शब्दार्थालंक्रियाश्चित्र २३० ३० मुदा रमणमन्वीत ४० ११६ शयनीये परावृत्य १४६ ५ मेघनादेन हंसानाम् २० १६८ श्रव्यहंसगिरो वर्षाः २०४ १४६ यत्नः सम्बन्धविज्ञान १७३ ८६ श्रीदीप्तो ह्रीकीर्तौ १०६ ६० यशश्च ते दिक्षु रजश्च ७३ ४४ श्रीमानमानमरवर्त्म ५१ ८३ यः स्वरस्थानवर्णानाम् १०२ १५२ श्लोकेषु नियतस्थानम् १८० ७६ यानमानयमरावि ६४ २२ सकलापोल्लसनया ३२ ७४ यामताश कृतायासा ६० ६७ सकृद् द्विस्त्रिश्च यो ७८ ३६ याम यामत्रयाधीना ४६ १०१ सङ्ख्याता नाम १२७ १०४ योगमालात्मकं नाम १३१ १७४ सत्यमेवाह सुगतः २११ १८ रमणी रमणीया मे ३० ५१ सन्दष्टयमकस्थानम् ६३ ४७ रवेण भोमो ध्वजवर्ति ५७ ६६ सन्नाहितोमानम ७८ ६ राजन्वत्यः प्रजा जाता २१ ४० सभासु राजन्नसुराहितैर् ४६ १० राजितैराजितैक्ष्ण्येन २३ ५८ सभा सुराणामबला ७१ १८१ राज्ञां विनाशपिशुनैर् २१७ ७१ समानया समानया ८२ ८२ रे रे रोरूरुरोरोग् ११५ १०० समानरूपा गौणार्था १२६ ४३ लीलास्मितेन शुचिना ५१ १०३ समानशब्दोपन्यस्त १२६ १५४ लुप्ते पदान्ते शिष्टस्य १८४ १२८ समुदायार्थशून्यं यत् १५७ १५६ वर्णानां न्यूनताऽऽधिक्ये १८८ १२६ समुद्रः पीयते देवैर् १५६ ७८ वर्णानामेकरूपत्वं ६७ १२३ सहया सगजा सेना १५० ६ वारणो वा रणोद्दामो २३ ७७ सा दिनामयमायामा ६४ १२० विजितान्भवद्वेषि १४७ १२४ सा नामान्तरितामिश्र १५० ६६ विनायकेन भवता ७६,८० १०२ सा नामान्तरिता यस्या १२७ १७६ विरोधः सकलोऽप्येष २१६ १०५ सा भवेदुभयच्छन्ना १३२

२४८ काव्यादर्श श्लोकाङ्क श्लोकप्रतीक पृष्ठ श्लोकाङ्क श्लोकप्रतीक पृष्ठ ८२, ८७ सामायामामाया १०१, ११० १४५ स्थितिर्निर्माणसंहार १७२ ४५ सारयन्तमुरसा रमयन्ती ५४ ३६ स्थिरायते यतेन्द्रियः ४८ ३३ सालं सालम्बकलिका ४३ ६२ स्मरानलो मानविवर्धितो ७४ ३२ सुराजितह्रियो यूनां ४२ २३ स्वयमेव गलन्मान ३३ ११३ सुराः सुरालये स्वैरं १४० १३७ हन्यते सा वरारोहा १६५ ६४ सूरिः सुरासुरासारि ११८ ११७ हृतद्रव्यं नरं त्यक्त्वा १४५ १५३ स्त्रीणां संगीतविधि १८३ ─o─ प्रसादिनी-मङ्गल-श्लोक-सूची श्लोकप्रतीक पृष्ठ श्लोकप्रतीक पृष्ठ अनलम्भाविभिस्त्वोध्यां ६५ कृत्वा नखमणीन्स्वान्तः १ अनुजे पक्षपातस्य १५२ कृष्णेऽप्यकृष्णे मेघेन ६४ अब्भ्रं रचाय्यसंस्पृष्टं १५२ खरकग्रामभूः पुण्या २३३ अर्थाभापोऽमला यस्य १६ गणनायक विघ्नविघातक (५) अर्धनारीस्तनं पातुं १५२ गतेऽब्दे वयसः प्रीत्या (१२) अलं प्रार्थनया वाऽस्तु (१२) गेहिनी सर्वसौख्यानां (३) अस्ति तस्यात्मजः शास्त्री २३३ चन्द्रिकागौरवर्ण्यं १६ अहो एतस्य वैमल्यं २३३ चित्रं विचित्रसम्भारं १ आद्याध्याययोर्व्याख्या २३३ ज्येष्ठे कृष्णे चतुर्थ्यां च (१२) आद्या निरुक्तमीमांसा २३४ ज्योतिर्विद्भूषणं शैवः २३३ आषाढशुक्लषष्ठ्यां हि १६ त एव काव्याश्च गुणा (४) इतोऽधिका देवगिरोऽभि (४) तत्त्वं त्वस्य कविर्वेत्ति ६२ ईर्ष्यादिदोषपोषण ६५ तत्त्वं वेत्ति स्वयं दण्डी १०५ कपूयाचरणे राज्ञि १२० तमःप्रधानचैतन्या १ कर्के भानावत्रौ चन्द्रे ६५ तुलसीराम-रामज्यौ २३३ किरोड़ीमलमहाविद्या २३३ त्रयोदश्यां गुरौ प्रातश् १२०

प्रसादिनी-मङ्गल-श्लोक-सूची २३६ श्लोकप्रतीक पृष्ठ श्लोकप्रतीक पृष्ठ त्रयोविंशतिरस्याश्च २३४ रीतित्रयप्रभेदेन २३३ त्रिभिर्गुणैर्गुणावा यज् २३४ लोकान्दिव्यान्सुखान्भोक्तुं २३३ दूराद् गन्धमुपाघ्राय (१२) वाग्देव्याः प्रीतये सेयं ६५ दोषाकरस्तु चन्द्रोऽयं १५२ विदुषी हस्तरेखाणां (३) द्वाविंशदिवसेऽगस्त्ये २३२ विद्वत्पादरजोमृष्टा २३४ ध्यात्वा पाद-युगे गौर्या (१२) विभाति चित्ते च नखच्छटा (४) नभःकृष्णे भृगो रात्रौ १२० विश्वविद्यालयेनेयं २३४ नभोऽङ्काङ्कभूवर्षे (१२) विष्णुदत्तस्य शास्त्रेषु २३३ निगमबोधतीर्थस्य २३३ विसञ्ज्ञ उद्भटः सोऽयं २३३ निर्दोषाश्रावसंयुक्ता १२० वृषं जिगमिषावर्के (१२) नेयत्ता कविभावानां ६२ व्याख्ये वैदिकवाङ्मये २३४ नैवेष्टा भामहैर्मुग्धैर् १२० शरीरमात्रं खलु धर्म (४) पकारस्य व्ययादेस्तु १५२ शान्त्वेषा ग्रथिता स्रग् वै (१२) पाटलौष्ठदलच्छन्न १२१ शास्त्रचर्चामिषेणेयं २३४ पाठकके करकमलोंमें (५) शिवकरणशर्माख्य २३३ पुण्यानि मे सन्ति च (४) शिवनारायणः शास्त्री (१२) प्रियायाः कुसुमाख्यायाः २३२ शुचौ शुचौ रवौ पुष्ये १ प्रीयतां चैव नित्या सा २३४ शुभं भवतु पुस्तस्या (२४३) प्रीयतामनया स्तुत्या २२६ श्रद्धयेतोऽपि भूयस्या २३४ बालप्रबोधिनी टीको २३४ षष्ठेऽहन्यस्मिन्नगस्त्यस्य १५२ भक्त्या दण्डिनि गीर्देव्याः २३४ सञ्चितानि स्वपुण्यानि (३) भगवती च विद्या च २३३ सत्त्वहिते तु चैतन्ये १ भाद्रकृष्णत्रयोदश्यां २२६, २३२ सद्योऽधिगन्तुं च समाश्रये (४) भामहो न विधुस्तुल्यः २३३ सम्प्रत्याख्यामि ताः सम्यक् १२० भूयस्यै भूतये भूयाद् ६४ सरस्वती श्रीश्च शरीर (४) मम्मटान्तं व्यधायैतत् २२६ सिद्धान्तकौमुदीभ्वादि २३४ मयि स्निग्धाऽस्य भार्या च २३३ सुकरं दुष्करं वृत्तं १६ माधुर्यं जीवने यस्या (३) हन्तेदमुज्ज्वलं दीप्तं १२१ यमकोदाहृतिग्रामो ६४ हरो हरतु सन्ताप १२० यमक्रोदाहृतिम्पाख्यां १६ —o—

सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची ग्रन्थनाम पृष्ठाङ्क | ग्रन्थनाम पृष्ठाङ्क अग्निपुराण १३, १४ | का इतिहासदर्शन ३५ अच्युतोत्तर ६, १२१, १३२ | आदिपर्व १४८, २२१ अथर्ववेद १२२, १२४ | आपस्तम्ब श्रौतसूत्र २१५ अभिज्ञानशकुन्तल (शाकुन्तल) १६२, | आश्चर्यचूड़ामणि १८३ १७१ | ईशोपनिषद्भाष्यकुसुमाञ्जली ६२ अभिनवभारती (अभिनवगुप्त) | उणादिसूत्र १२१ ३, ७२, १५४, १६०, १६२, १८०, | उपनिषद्ब्रह्मयोगी ६१, ६२ १८६, १९६, २०६, २०७ | उवट १६२ अमरकोष १७, १८, २०, ३५, ३६, ३८- | ऋक्प्रातिशाख्य १०३, ११२, ११४, ४०, ४५, ४६, ५४, ७३, ७६, ८४, १०६, | ११६, १४३, १८६, १९३ १०७, १२१, १४१, १४६, १५२, १६४, | ऋक्सर्वानुक्रमणी १८६ १६७, १६९, १७०, २०६, २०७, २१५, | ऋग्भाष्य १८१, १८६ २१६ | ऋग्वेद ७५, ९२, १२४, १४०, १४८, अर्थशास्त्र २०१ | १६० अलंकारशास्त्रका इतिहास ३६ | ए हिस्ट्री आफ साउथ इण्डिया ६२, अलंकारसर्वस्व १५, १८ | १४३, २०२ अवन्तिसुन्दरीकथा ३४, ९२, १७७, | ऐतरेय ब्राह्मण १२१, १२४ २१८, २१९ | कथासरित्सागर २०२ अष्टाध्यायी २०, २१, २७, ३१, ३५, | कमलाकर १६३ ३६, ३८, ४२, ४३, ४५, ४७, ५३, ५८, | कविकल्पलता १८८ ८०, ८४, १०४, ११३, १२१, १३८, | काउंसिल आफ साइंटिफिक एंड १४०, १४२, १४५, १४७, १६४, १६५, | इण्डस्ट्रियल रिसर्च २०२ १७२, १७७, १७८, १८४, १९३, १९५, | काठकसंहिता १४८ २१०, २११ | कामधेनु ६१, ७२, १६३, १९६, २०५ आख्यातचन्द्रिका ६०, १४० | कामसूत्र ५४-५६, १२३, १३७ आचार्य दण्डी एवं संस्कृत काव्यशास्त्र |

सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची २४१ ग्रन्थनाम पृष्ठाङ्क ग्रन्थनाम पृष्ठाङ्क काव्यप्रकाश ८, १५, १८, १६२, १६६, छान्दोग्योपनिषद् ५२ २०१, २२८, २२६ जयमङ्गला (कामसूत्रटीका) १२३, काव्यादर्श ३, १६, १४४ १३७, २०६ काव्यानुशासन १५, १७, १३७ जयमङ्गला (भट्टिटीका) ८२, ८७ काव्यालंकार (भामह) ३, ७-६, १२, जातकमाला २१७ १६, ८५, १२१, १२४, १४७, १५६- जीवानन्द विद्यासागर १४३, १४६ १६०, १६६, १६६, १७२, १७४, १८०, जैमिनीय ब्राह्मण १४८ १८८, १६२, १६६, २००, २०३, २१०, झळकीकरटीका (प्रभा) १६२, १६३, २११, २१३, २१४, २१६, २२३, २२४ २०१ २२५ तत्त्वप्रकाशिका ६३ काव्यालंकार (रुद्रट) १२, १६, ६७, तर्कसङ्ग्रहतारोदय २००, २११ ६६, ७८, ८१, ८५, ८८, ८६, ६६, १२४, तरुणवाचस्पतिटीका ६, २४, २५, ४४, १३४-१३७ ४६, ४७, ५०, ५३, ५५, ५६, ५८, ६१, काव्यालंकारभाष्य १६७, २१० ६८, ७१, ७३, ७५, ७७, ७६, ८०, ८३, काव्यालंकारसार ३६, ८८, १०८, १४०, १४२, १४५, १५१, काव्यालंकारसूत्र, वृत्ति (वामन) १७७, १८३, १८६, १६१, १६४, २०७, १०-१२, १६, ६१, ७२, १८३, १८४, २०८ १६४, १६६, २००, २०६, २२४ तिरुपतिसंस्करण १४१, १५१, १६४ काशिका १७६ तैत्तिरीयब्राह्मण २१५ किरातार्जुनीयम् ८१, ८५-८६, ६४, तैत्तिरीयसंहिता २१४, २२० १०५, ११६, १६४ तैत्तिरीयोपनिषद् ५२ कुमारसम्भव (कालिदास) ६३, ११३ त्रिकाण्डशेष २५ कृष्णमाचार्य २५ दशकुमारचरित १०५ कौषीतकिब्राह्मण १८७,१८६ डॉ० धर्मेन्द्रकुमारगुप्त, काव्यादर्श गीताभाष्यनवाम्बरा १६८ ६२, १४६ गोपथब्राह्मण १२१, २२० धातुपाठ ५८, ६८, ११८, १४०, १४७, घण्टापथ ११६ १७६, १७७ चिन्तामणि २५ ध्यानबिन्दूपनिषद् ६१, ६२ छन्दःशास्त्र १८१, १८४, १८७,१८६, ध्वन्यालोक १८, २२६ १६१ नमिटीका १२, १७, ६६

२४२ काव्यादर्श ग्रन्थनाम पृष्ठाङ्क ग्रन्थनाम पृष्ठाङ्क नाट्यशास्त्र २-५,२०,२६,५०,६२, भोटपाठ १६५ ६४,६७,७८,८१, १५३,१५८,१६०, मनुस्मृति २१६,२२१ १६६,१६८,१७२,१७४,१७६,१८१, मन्दारमरन्दचम्पू १८३ १८६,१८२,१६५,१६७,१६८,२०६, महानारायणोपनिषद् ६३ २०७ महाभारत, गीताप्रेस संस्करण २०६ नादबिन्दूपनिषद् ६२ महाभाष्य ४०,१५८,१७५,१८० नारायणभट्ट १०६,१८६ मामन्दूर शिलालेख १४३ निरुक्त १६४ मेघदूत १८३ निरुक्तके पाँच अध्याय ७६,१२१,१२४ मेदिनीकोष ३,३६,४०,४४,४६,८४, निरुक्त-मीमांसा १७६ ६६,१७०,१७७ नीतिशतक १८२ मेधावी २२३ नृसिंहपुराण ११४ रघुवंश ५३ पाणिनीय शिक्षा १४३ रङ्गराज (रङ्गाचार्य रेड्डी, प्रभा) २५ पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् ६१,६२ ५३,७७,१२८,१३४,१४३,१४६ प्रसादिनी ३५,६२,७१,६३,११७, रत्न-दर्पण १४,६०,७३,७५,८१,६७, ११६,१८६,२२३ १०६,१०८,१४०,१७४,२०७ प्राकृतपैङ्गल १०६ रत्नश्री २४,२५,४४,४६-४७,५३, प्रेमचन्द्र तर्कवागीश १४३,१४६ ५५,५६, ५८,६१,७०,७५,७७,७६, प्रेमचन्द्रशर्मा १२८ ८०, ८२, १०६,१०८, ११०,११५, बालप्रिया १६३ १२२,१२६,१३०,१३३,१३४,१४०, बृहदारण्यकोपनिषद् ५२ १४२,१४३,१४५,१५१,१५८,१६८, बृहद्देवता १२४ १७०,१७२,१७३,१७७,१७६,१८६, बृहद्देशी २०६ १६१,१६५,२०१ २०७,२०८ ब्रह्मसूत्र २२० रामाश्रमी १२१,१४५,१४६,२१६ भट्टिकाव्य ८१,८७-८८,११३ रेड्डीसंस्करण १५१ भरतका संगीतसिद्धान्त २०६ ललितविस्तर २११,२१२ भरतकोश २०६ लोचन १६२ भवतोषिणी २५,४१,६०.१०४,१७६ लोल्लट १६ भागुरि ४७,८४ वक्रोक्तिजीवित १५,१८ भावप्रकाश २०२ वनपर्व ११५ भीमसेन १६३ वाक्यपदीय ४०