भारतकोश
संग्रह पर लौटें

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

३।१६७] ५ दोष : (१० ख) काल-विरोध २०३ (ख. अ) पद्मिनी नक्तमुन्निद्रा, (आ) स्फुटत्यह्नि कुमुद्वती । (ख. अ) पद्मिनी रातको खिली है । (आ) कुमुदिनी दिनमें चटकती है । या तो पल्लवाभ्युदयसे पूर्व था, या नवीं शती ई० में हुआ है । कावेरी-तीर- भूमिको 'चोल' कहनेसे दण्डीके समय कोई छोटी-मोटी चोल नामलेवा रियासत बची भी हो, तो उसका उपहास आचार्यने किया है । क्षेमेन्द्र द्वारा कावेरीको चोल देशमें कहना¹ तो उचित है । किन्तु दण्डीके समय नहीं । इस प्रकार उक्तिमें (अ) पर्वतविरोध, (आ) वनविरोध और (इ) राष्ट्र- विरोधके प्रदर्शनके माध्यमसे (क) देशविरोधी उक्तिका स्वरूप आचार्यने स्पष्ट किया है । देशके 'आदि'-शब्द-परिगृहीत अन्य अङ्गोंका विरोध इसी प्रकार स्वयं समझ लेना चाहिये । भामहने देशविरोधका स्वरूप यों प्रस्तुत किया है : किसी स्थानमें जो द्रव्यका होना या नहीं होना कहा जाता है, उसकी विरोधी उक्ति स्वभावके अनुसार 'देशविरोधी' है । जैसे—गुफाओंके निकट उगे हुए कालागरु वाले मलय पर्वतपर सुगन्धित फूलोंसे झुके हुए देवदारु वृक्ष शोभा पाते हैं ।² यहाँ (१) मलयपर चन्दनकी प्रसिद्धिके विपरीत कालागरुवृक्ष कविने बताये हैं । (२) देवदार वृक्ष हिमालयमें काफी ऊँचाई पर होते हैं तथा उनके फूल नहीं होता अपितु ठीठा (cone) होता है । उन्हें कविने धुर दक्षिणमें स्थित मलयपर्वतपर तथा (३) फूलोंसे झुके बताया है । अतः देशविरोधी होनेसे यह उक्ति दोषयुक्त है । दक्षिणके निवासी दण्डीने देशविरोधके तीनों उदाहरणोंमें दक्षिण भारतमें ही नहीं होनेवाले पदार्थोंका वर्णन किया है । उत्तर भारतके भी धुर उत्तरमें कश्मीरके निवासी भामहने देवदारका उदाहरण उचित ही दिया है । मलय पर्वतका वर्णन तो उन्होंने सम्भवतः दण्डीके उदाहरणकी नकलपर दिया है ॥ १६६ ॥ (ख) कालविरोध—अगले अढ़ाई (१६७-१६८।।) श्लोकोंमें आचार्य ने कालके उपलक्षणार्थ प्रस्तुत तीनों पदार्थोंके विरोधके उदाहरण प्रस्तुत किये हैं । प्रथम श्लोकके पूर्वार्धके दो पादोंमें क्रमशः (अ) रात्रि काल और (आ) दिनके विरोधके उदाहरण दिये हैं । इसके बाद डेढ़ श्लोकमें (इ) ऋतुविरोधके १. उल्लङ्घ्यमाना कावेरी तेन सम्मर्दकारिणा । चोलकेश्वरकीर्तिश्च कालुष्यं ययतुः समम् ।। कथासरित्सागर १६।६५ २. या देशे द्रव्यसम्भूतिरपि वा नोपदिश्यते । तत् तद्विरोधि विज्ञेयं स्वभावात् तद् यथोच्यते ।। काव्याल० ४।२६ मलये कन्दरोपान्तरूढकालागरुद्रुमे । सुगन्धिकुसुमानम्रा राजन्ते देवदारवः ।। ३०

२०४ काव्यादर्श [३।१६७-१६६ (इ १) मधुरोत्फुल्लनिचुलो, (२) निदाघो मेघदुर्दिनः ॥ १६७ ॥ (३) श्रव्यहंसगिरो वर्षाः, (४) शरदामत्तबर्हिणी । (५) हेमन्तो निर्मलादित्यः, (६) शिशिरः श्लाघ्यचन्दनः' ॥ १६८ ॥ इति कालविरोधस्य दर्शिता गतिरीदृशी । (इ १) वसन्त फूल आए हुए निचुल (स्थलवेतस) वाला है । (२) ग्रीष्म मेघोंसे ढंके आकाश वाला है (३) सुनने योग्य हंसोंकी वाणियों वाला बारिस का मौसम है । (४) मदमस्त मयूरों वाली शरद् है । (५) हेमन्तमें निर्मल है सूरज । (६) शिशिरमें लगता है चन्दन अच्छा ॥ १६८ ॥ इस प्रकार कालविरोधकी ऐसी स्थिति दिखाई । छह उदाहरण छह पादोंमें प्रस्तुत करके १६६वें श्लोकके पूर्वार्धमें कालविरोध का उपसंहार किया है । (अ) रात्रिविरोध : पद्मिनी (कमलिनी) रातमें नहीं खिलती, अपितु दिनमें खिलती है । कुमुदिनी रातको खिलती है । यहाँ कुमुदिनीको रातमें खिलती न बताकर पद्मिनीको बताया है । इसलिये रात्रिकालका विरोध किया है । अतः प्रत्यक्षविरुद्ध यह सहृदयके लिये उद्वेजक होनेसे दोष है । (आ) दिनविरोध-कुमुदिनीको रातमें खिलती न बताकर दिनमें खिलती बतानेसे यहाँ दिनकालविरोध प्रत्यक्षविरुद्ध होनेसे दोष है । (इ) ऋतुविरुद्ध : (१) वसन्तमें निचुल (स्थलवेतस)¹ नहीं खिलता; (२) ग्रीष्म ऋतुमें आकाश मेघच्छन्न नहीं होता; (३) वर्षाकालमें हंसोंका कलरव नहीं सुनाई देता; वे तो शरदारम्भमें जलाशयोंमें आते हैं; (४) बर्हिगण (मयूर) शरद् ऋतुमें मदमस्त नहीं होते, अपितु वर्षाकालमें मेघमालाको देखकर पांखें फैलाकर नाचकर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं; (५) हेमन्त ऋतुमें आदित्य शीतजन्य कोहरेसे धुँधला और दक्षिणायनके कारण मन्दद्युति हो जाता है; (६) शिशिर (टाढे पाले वाली सर्दी) में चन्दन शीतल होनेके कारण मनको नहीं भाता; वह तो गर्मीमें अच्छा लगता है । इस प्रकार इन छहों उक्तियोंमें तत्तद् ऋतुओंके विपरीत अनुभव (प्रत्यक्ष) का निरूपण होनेसे यहाँ ऋतुविरोध स्पष्ट है ॥ १६७-१६८ ॥ कालके उक्त तीनों अङ्गोंके विरोधका स्वरूप इस प्रकार दिखलाया है । कालके अन्य अवयवों युगादिका विरोध भी इसी प्रकार समझें । जैसे सत्ययुग १. वानीरे कविभेदे स्यान्निचुलः स्थलवेतसे । शब्दार्णवकोष

३।१६६-१७० ] ५ दोष : (१० ग) कला-विरोध २०५ (ग) मार्गः कलाविरोधस्य मनागुद्दिश्यते यथा ॥ १६६ ॥ (i) 'वीर-शृङ्गारयोर्भावौ स्थायिनौ क्रोध-विस्मयौ' । (ii) 'पूर्णसप्तस्वरः सोऽयं भिन्नमार्गः१ प्रवर्तते' ॥ १७० ॥ (ग) 'कलाविरोध' दोषके मार्ग (प्रकार, स्वरूप) का कथन कुछ (नाम- मात्र देकर) किया जा रहा है । जैसे—॥ १६६ ॥ (i) 'वीर, शृङ्गार (रसों) के स्थायी भाव क्रोध और विस्मय हैं' । (ii) 'वह यह पूरे सातों स्वरों वाला भिन्नमार्ग चल रहा है' ॥ १७० ॥ में कलिकी प्रवृत्तियोंका या कलियुगमें सत्ययुगकी प्रवृत्तियोंका वर्णन काल- विरोध होगा । ऐसे ही मन्वन्तर विरोधादि भी समझें । युगादिविरोधमें शब्द- प्रमाण (पुराणादिप्रतिपादित स्वरूप) का उल्लङ्घन होगा । इतिहासविरोध भी 'कालविरोध' है । निर्दोषता : देश-काल-विरोध यदि काव्यमें युक्तियुक्त रूपमें प्रस्तुत किया जाता है, तो दोष नहीं होगा । जैसे तपोवनमें आश्रमवासी ऋषिकी तपस्याके प्रभावको निरूपित करनेके लिए कवि यदि सिंह-मृग, अहि-नकुल, गो-व्याघ्रमें परस्पर प्रीति दिखाता है, या अन्य देश और कालमें स्थित वस्तुकी भी वहाँ उपस्थितिका वर्णन करता है, तो वह देशविरोध और कालविरोध दोष नहीं होगा । अतः यह दोष अनित्य है । आगे १८०-१८१ श्लोक देखें । (ग) कलाविरोध दोष—त्रिपुरहरभूपालद्वारा उद्धृत भामहके अनुसार मुख्य कलाएँ चौंसठ हैं और उपकलाएँ ५०४ हैं ।२ सब कलाओंका तो दूर किसी एक कलामें भी दोषोंका निरूपण क्लिष्ट कार्य है । इस लिये आचार्यने स्वकृत विरोधप्रदर्शनको 'मनाक्' कहा है ॥ १६६ ॥ (i) नाट्यकलाविरोधका उदाहरण : वीर एवं शृङ्गार क्रमशः अर्थाश्रय एवं कामाश्नय रस हैं । रसकी अनुभूति सर्वाधिक उत्कृष्ट रूपमें प्रेक्षणीयक (नाट्य) में होती है । अतः तत्सम्बन्धी उदाहरण दिया है । वीर एवं शृङ्गार रसोंके स्थायी भाव क्रमशः उत्साह और रति होते हैं । उनकी जगह क्रोध और विस्मयको उनका स्थायी भाव कहना नाट्यकलाके विरुद्ध है । क्रोध रौद्र रसका और विस्मय अद्भुतका स्थायी होता है । क्रोध और विस्मय वीर और १. सरस्वतीकण्ठाभरण १।७४में धृत 'भिन्नग्रामः' पाठ उचित है । टीका देखें । २. कामधेनु १।३।७ : कला नृत्यगीताऽऽदयश्चतुःषष्टिः । उपकलाश्चतुःशतम्; अत्र कलानामुद्देशः कृतो भामहेन ।

२०६ काव्यादर्श [३।१७० शृङ्गारके व्यभिचारी अलबत्ता हो सकते हैं । उनके परिहारके लिये 'स्थायिनो' विशेषण आचार्यने दिया है । (ii) सङ्गीत कलाके विरोधका उदाहरण : गान्धर्व शास्त्रमें गान और वाद्य (तन्त्री) में षड्ज, ऋषभ, गान्धार, पञ्चम, धैवत, निषादवान्, (निषाद) ये सात स्वर (स, रि, ग, म, प, ध, नि) होते हैं ।१ इनके समूहको 'सप्तक' कहते हैं । संवादी स्वरोंका वह समूह ग्राम है, जिसमें श्रुतियाँ व्यवस्थित रूपमें विद्यमान हों और जो मूर्च्छना, तान, वर्ण, क्रम, अलङ्कार इत्यादिका आश्रय हो ।२ प्राचीन कालमें षड्ज, मध्यम, गान्धार नामक तीन ग्राम होते थे । भरत ने षड्ज और मध्यम दो ही ग्राम माने हैं ।३ गान्धार ग्राममें तार और मन्द्र सप्तकोंकी (१) अधिकताके कारण और (२) वैस्वर्यके कारण भरतने उसे नहीं अपनाया है ।४ दूसरे शब्दोंमें, गान्धार ग्राम अपने इन दोषोंके कारण लोकप्रिय नहीं रह सका, स्वर्ग सिधार गया ।५ इससे स्पष्ट है कि ग्राम होता ही वह है, जिसमें सातों स्वर पूर्ण हों ।६ किन्तु परवर्ती कुछ आचार्य, जैसे बृहद्देशीके प्रणेता मतङ्ग (६-७वीं सदी ई०) छह स्वरों वाले 'षाडव' और 'औडुवित' नामक तानोंको७ भी 'ग्राम' कहने लगे । प्रसिद्ध ग्रामों से भेद १. षड्जश्च, ऋषभश्चैव, गान्धारो, मध्यमस्तथा । पञ्चमो धैवतश्चैव सप्तमोऽथ निषादवान् ॥ नाटच० २८।२१ अमरकोष (१।७।१) में यह क्रम सम्भवतः छन्दोनुरोधसे तोड़ा है : निषादर्भगान्धारषड्जध्यमधैवताः । पञ्चमश्चेत्यमी सप्त तन्त्री-कण्ठोत्थिताः स्वराः ॥ २. भरतका सङ्गीतसिद्धान्त, पृष्ठ ५ । तथा अभिनवभारती १८।५ । ३. नाट्यशास्त्र २८।२४से पूर्व : अथ द्वौ ग्रामौ— षड्जग्रामो मध्यमग्राम- श्चेति । अत्राश्रिता द्वाविंशतिः श्रुतयः स्वरमण्डलसाधिकाः* । अभिनव- भारती : 'अथ द्वौ ग्रामौ' इति गान्धारग्रामं निरस्यति । *बड़ौदासंस्करणमें 'साधिता' स्वीकृत है; 'सघिका' (शुद्ध रूप 'साधिकाः') पाठभेद पादटिप्पणीमें दिया है । 'स्वरमण्डलस्य = स्वर- समूहस्य = सप्तकस्य द्वाविंशत्यैव सिद्धिः' (अभिनवभारती) में 'साधिकाः' पाठ ही व्याख्यात है । ४. द्वौ ग्रामौ भरतेनोक्तौ, ग्रामो गान्धारपूर्वकः । अतितारातिमन्द्रत्वाद् वैस्वर्यान्नोपदर्शितः ॥ भरतकोश पृष्ठ १८६ ५. प्रवर्त्तते स्वर्गलोके ग्रामोऽसौ न महीतले ॥ संगीतदर्पण ८० ६. ग्रामौ पूर्णस्वरौ द्वौ तु, यथा वै षड्जमध्यमौ । नाटचशास्त्र १८।६ ७. क्रमयुक्ताः स्वराः सप्त मूर्च्छनेत्यभिसञ्जिताः । षट्-पञ्च-स्वरकास्तानाः षाडवौडुदिताश्रयाः ॥ नाट्यशास्त्र २८।३२

२०७ ५. दोष : (१० ग) कला-विरोध [३।१७० करनेको उन्होंने इन स्वाभिमत ग्रामोंको भिन्नग्राम कहा ।¹ अभिनवगुप्तने कुछ आचार्योंको अभिमत 'षड्जग्रामराग' और 'मध्यमग्रामराग' के नामसे सम्भवतः इसी 'भिन्नग्राम' सिद्धान्तका उल्लेख किया है ।² इस प्रकार पूर्ण सातों स्वरों वाले 'ग्राम' शब्दका प्रयोग 'भिन्नग्राम' में अपूर्ण स्वरोंवाले रागोंके लिये करना 'मार्ग'³ सङ्गीतकी भरत आदि आचार्यों द्वारा प्रतिपादित गीत (गान) कलाका विरोध हुआ । काव्यादर्शके तीनों प्राचीन टीकाकारोंने यहाँ 'भिन्नमार्ग' पाठकी व्याख्या की है ।⁴ पर यह उचित नहीं है । क्योंकि गान्धर्व शास्त्रमें 'गीत'के प्रसङ्गमें 'मार्ग'का सम्बन्ध 'ताल'से है, 'स्वर'से नहीं ।⁵ 'ताल' वाला मार्ग 'भिन्न' भी १. रत्नदर्पण १७४ : भिन्नमार्गेषु* सप्तस्वराणां समवायो नोपनिबद्धः । तमङ्गोऽप्याह 'षाडवौडविके जाती भिन्नग्राम् उदाहृतः' । ततश्च पञ्च वा षड् वा स्वरा भवन्ति भिन्नग्रामे, न तु सप्त । 'ग्रामेषु', 'मतङ्गो', '०डुविते' पाठ उचित है । २. अभिनवभारती १८।६ : जात्याश्रययोजितद्वारेण षाडवौडुवितांशयोगे न्यूनस्वरताऽप्यस्ति इति षड्जग्रामरागो, मध्यमग्रामरागश्चेह 'ग्राम'- शब्देन व्यपदिष्ट इति केचित् । तदसत् । इह हि 'ग्राम'-शब्देन जाति- समुदायाऽभिधीयते । तत्र यद्यप्यंशके न्यूनस्वरताऽपि भवति, तथाऽपि समुदायस्य पूर्णतायाः का हानिः ? ३. भरतादिप्रणीत शास्त्रीय सङ्गीत 'मार्ग' सङ्गीत कहलाता है । इससे भिन्न लोकसङ्गीत 'देशी' सङ्गीत कहाता है । आचार्य मतङ्ग देशी सङ्गीत विधाके प्राचीन आचार्य हैं । उनका ग्रन्थ 'बृहद्देशी' देशी सङ्गीत का अत्यन्त प्रामाणिक ग्रन्थ है । ४. रत्नश्री : भिन्नमार्गो गान्धर्वप्रकारः कश्चित् प्रवर्त्तते । वादितीका : भिन्नमार्गश्चेत् कथं 'पूर्णसप्तस्वरः' ? इति । तरुणटीका : भिन्नमार्गो नाम पञ्चस्वरनिष्पन्नः । तस्य निषादादि-सप्तस्वरपूर्णत्वं गीतलक्षण- विरुद्धम् । *'निषादादि' कथनं सम्भवतः अमरकोषकी परम्परापर आधारित है । ५. मार्गेस्त्रिभिः प्रयोक्तव्यश्चित्र-वार्तिक-दक्षिणैः । नाट्यशास्त्र २८।१०६ चित्रे द्विमात्रा कर्तव्या, वृत्तौ सा द्विगुणा स्मृता ।। नाट्यशास्त्र ३१।५ चतुर्गुणा दक्षिणे स्यादित्येवं त्रिविधा कला । कलाकालप्रमाणेण 'ताल' इत्यभिसञ्ज्ञितः ॥ ६

२०८ काव्यादर्श [३।१७१ इत्थं कलाचतुःषष्टौ विरोधः साधु नीयताम् । तस्याः कलापरिच्छेदे रूपमाविर्भविष्यति ॥ १७१ ॥ इस प्रकार चौंसठ कलाओंके विषयमें विरोधका अनुगमन भली भांती किया जाये । उनका स्वरूप 'कलापरिच्छेद'में प्रकट होगा ॥ १७१ ॥ नहीं होता । तरुणवाचस्पतिने 'भिन्नमार्ग'की जो व्याख्या की है, वह मतङ्गोक्त 'भिन्नग्राम' पर लागू होती है । इसी प्रकार रत्नेश्वरमिश्रने भी 'भिन्नमागोंमें सातों स्वरोंका समुदाय (जाति) उपनिबद्ध नहीं होता', जो कहा है, वह भी 'भिन्नग्राम' पर ही सही ठहरता है' ॥ १७० ॥ कला-परिच्छेद—'कलाओंका स्वरूप स्पष्ट करनेको लिखा ग्रन्थ या ग्रन्थांश' कलापरिच्छेदका अर्थ है । रत्नश्रीज्ञानने काव्यादर्शके चौथे परिच्छेद को कलापरिच्छेद बताकर कहा है कि वह प्रचलित (उपलब्ध) नहीं है । लगता है कि उन्हें अपने इस मन्तव्यपर विश्वास नहीं था । अन्यथा उन्होंने 'कलापरिच्छेद'की दूसरी यह व्याख्या न की होती : कलाओंका परिच्छेद (अभ्यास) होनेपर उनका स्वरूप स्पष्ट होगा । वादीजङ्घालदेवने 'कला- परिच्छेद' ग्रन्थ बताया है । तरुणवाचस्पतिका कहना है : लोग कहते हैं कि चौंसठ कलाओंका सङ्क्षेपसे निरूपण करने वाला कोई और भी परिच्छेद काव्यादर्शका है ।२ इन कथनोंसे सिद्ध होता है कि रत्नश्रीज्ञानसे लेकर तरुण- वाचस्पति तक सभी टीकाकारोंने इस कथनके स्वरूपको देखकर अन्धेरेमें लाठी मार्गाः स्युस्तत्र चत्वारो ध्रुवश्चित्रश्च वार्तिकः । दक्षिणश्चेति, तत्र स्याद् ध्रुवके मात्रिका कला ॥ शेषेषु द्वे चतस्रोऽष्टौ क्रमान्मात्राः कला भवेत् । सङ्गीतरत्नाकर, तालाध्याय, ५ १. इस विवेचनमें सहायताके लिये लेखक अपने मित्र डा० शत्रुघ्न शुक्ल, प्रोफेसर तथा पूर्व अध्यक्ष एवं डीन, सङ्गीतकला निकाय, दिल्लीविश्व- विद्यालय, का आभारी है । २. रत्नश्री : 'कलापरिच्छेदे'—(क) चतुर्थः कलापरिच्छेदोऽस्य दण्डिनोऽस्ति । स त्विह न प्रवर्तते । (ख) यद् वा कलानां परिच्छेदेऽभ्यासे सति तस्याः कलाचतुष्षष्टे रूपमाविर्भविष्यति । तस्मात् कलाऽभ्यासः करणीयो, यतस् तद्विरोधः सर्वो यथावदवगम्यते । वादिटीका : कलाः परिच्छिद्यन्ते यत्र, स 'कलापरिच्छेदो' ग्रन्थः । तरुणटीका : कलापरिच्छेदे—चतुष्षष्टिकला- सङ्ग्रहात्मकः काव्यादर्शस्य कश्चिदन्योऽपि परिच्छेदोऽस्तीत्याहुः । तत्र कलाचतुष्षष्टिर्द्रष्टव्या ।

३।१७३-१७४] ५ दोष : (१० ङ) न्याय-विरोध २११ (ङ) विरोधो हेतुविद्यासु न्यायाख्यासु निदर्श्यते ॥ १७३ ॥ (अ) सत्यमेवाह सुगतः संस्कारानविनश्वरान् । (ङ) 'न्याय' नामक हेतु विद्याओं (दर्शनशास्त्र, आन्वीक्षिकी) के विषय में विरोधका प्रदर्शन किया जा रहा है ॥ १७३ ॥ (अ) 'बुद्धने संस्कारोंको नष्ट नहीं होने वाला ठीक ही कहा है, क्योंकि भामहने लोकका विभाजन दण्डीके समान स्थावर और जङ्गमके रूपमें करके उसके व्यवहारको 'लोक' कहा है । लोकव्यवहारका विरोध लोक- विरोध दोष बताया है । इसके उन्होंने दो उदाहरण दिये हैं : (i) स्थावर नदीकी प्रवृत्तिका; (ii) जङ्गम सेनाओंके व्यवहारका । दोनों प्रत्यक्षसे असिद्ध हैं ।¹ (ङ) न्यायविरोध—प्रमाणोंसे पदार्थके स्वरूपकी परीक्षा करना 'न्याय' होता है ।² इस परीक्षामें हेतु, कारण, तर्क, युक्तिका मुख्यतया उपयोग होने से इसे हेतुविद्या भी कहते हैं ।³ अश्वघोषने दर्शनोन्मुख पुरुषको 'हेतुबला- धिक' कहा है ।⁴ इस हेतुविद्या, अपरनाम न्यायविद्या, से दर्शनशास्त्र अभिप्रेत है, वह चाहे आस्तिक (वेदानुकूल) हो, चाहे नास्तिक (वेदनिन्दक या ईश्वरका या परलोकका अस्तित्व न मानने वाला) हो । इस प्रकार 'न्याय' शब्द यहाँ दर्शनकी शाखाविशेषके लिये प्रयुक्त नहीं है, अपितु सामान्यस्वरूप- परक है ॥ १७३ ॥ (अ) आचार्यने प्रथम उदाहरण नास्तिक (वेदनिन्दक) हेतुविद्याके विरोध १. स्थास्नु-जङ्गम-भेदेन लोकं तत्त्वविदो विदुः । स च तद्व्यवहारोऽत्र, तद्विरोधकरं यथा ॥ काव्याल० ४।३६ (i) तेषां कट-तट-भ्रष्टैर्गजानां मद-बिन्दुभिः । प्रावर्तत नदी घोरा हस्त्यश्वरथवाहिना ॥ ३७ (ii) धावतां सैन्यवाहानां फेनवारि मुखच्युतम् । चकार जानुदघ्नापान् प्रति दिङ्मुखमध्वनः ॥ २. न्यायसूत्र १।१।१ पर वात्स्यायन : प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः । ३. ललितविस्तर, अध्याय १२, पृष्ठ १५६, में साङ्ख्य, योग, वैशेषिकके अतिरिक्त हेतुविद्याका उल्लेख कदाचिद् न्यायविद्या (तर्कशास्त्र) के लिये किया है । यहाँ सामान्य 'दर्शन शास्त्र' अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । ४. सङ्क्लेशपक्षो द्विविधश्च दृष्टस्तथा द्विकल्पो व्यवदानपक्षः । आत्माश्रयो हेतुबलाधिकस्य बाह्याश्रयः प्रत्ययगौरवस्य ॥ सौ० ५।१६ ५. विशेषार्थ देखें तर्कसङ्ग्रहतारोदय, भूमिका, पृष्ठ चार-पाँच ।

२१० काव्यादर्श [ ३।१७२-१७३ (घ i) 'आधूतकेसरो हस्ती, (ii) तीक्ष्णशृङ्गस्तुरङ्गमः । (iii) गुरुसारोऽयमेरण्डो, (iv) निःसारः खदिरद्रुमः ॥ १७२ ॥ इति लौकिक एषायं विरोधः सर्वगर्हितः । (घ) 'हाथी हिलाई हुई सटाओं (अयाल) वाला है। (ii) घोड़ा तीखे सींगों वाला है। (iii) यह एरण्ड वृक्ष बहुत मजबूत है । (iv) खैरका वृक्ष निर्बल है ।। १७२ ।। यह लोकमें उपलब्ध विरोध सबके द्वारा निन्दित है । ग्रामके शास्त्रोक्त स्वरूपके विपरीत स्वरूपका वर्णन उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया है।' दण्डीका कलाविरोधनिरूपण अधिक सूचनापूर्ण तथा शास्त्रके विकासकी प्रक्रियाको प्रस्तुत करता है ।। १७१ ।। (घ) लोकविरुद्ध दोष—आचार्यने इस दोषको स्वतः स्पष्ट चार उदाहरण देकर स्पष्ट किया है । (i) 'केसर' (अथवा 'केशर') पशुओंमें सिंहों की या घोड़ोंकी गरदनपर 'अयाल' के नाम से प्रसिद्ध होता है । हाथीके नहीं होता । हाथीकी विशेषता सूँड (शुण्डा) है, जिसे हाथका काम करनेके कारण 'कर' या 'हस्त' कहा जाता है। या फिर आगेको निकले दाँत होते हैं । इन दोनों विशेषताओंके कारण गजको करी, हस्ती (हाथी) और दन्ती, दन्तावल कहा जाता है । (i) हाथीके अयाल और (ii) घोड़ेके सीँग लोकमें प्रत्यक्षविरुद्ध हैं। (iii) इसी प्रकार एरण्ड (रेंडी) वृक्ष बहुत कमजोर तने और कम गहरी जड़ों वाला होता है। जबकि (iv) खैरका वृक्ष इसके विपरीत है । इस प्रकार आचार्यने वन्य और ग्राम्य पशुओं और ग्राम्य और वन्य वृक्षोंके एकेक उदाहरण देकर इस दोषका स्वरूप स्पष्ट किया है । १. कला संकलना प्रज्ञा, शिल्पान्यस्याश्च गोचरः । विपर्यस्तं तथैवाहुस्तद्विरोधकरं, यथा ॥ काव्यालङ्कार ४।३३ ऋषभात्पञ्चमस्तस्मात् षड्जं धैवतं स्मृतम् । अयं हि मध्यमग्रामो मध्यमोत्पीडितर्षभः ॥ ३४ इति साधारितं मोहादन्यथैवावगच्छति । अन्यास्वपि कलास्वेवमभिधेया विरोधिता ॥ ३५ षड्ज आदि स्वर पुल्लिंग हैं। भामहने षड्ज और धैवतको नपुंसक न जाने किस आधारपर दिया है। उदाहरणका भाष्य देवेन्द्रनाथ शर्माजीके महाभाष्यमें देखें ।

३।१७३-१७४] ५ दोष : (१० ङ) न्याय-विरोध २११ (ङ) विरोधो हेतुविद्यासु न्यायाख्यासु निदर्श्यते ॥ १७३ ॥ (अ) सत्यमेवाह सुगतः संस्कारानविनश्वरान् । (ङ) 'न्याय' नामक हेतु विद्याओं (दर्शनशास्त्र, आन्वीक्षिकी) के विषय में विरोधका प्रदर्शन किया जा रहा है ॥ १७३ ॥ (अ) 'बुद्धने संस्कारोंको नष्ट नहीं होने वाला ठीक ही कहा है, क्योंकि भामहने लोकका विभाजन दण्डीके समान स्थावर और जङ्गमके रूपमें करके उसके व्यवहारको 'लोक' कहा है । लोकव्यवहारका विरोध लोक- विरोध दोष बताया है । इसके उन्होंने दो उदाहरण दिये हैं : (i) स्थावर नदीकी प्रवृत्तिका; (ii) जङ्गम सेनाओंके व्यवहारका । दोनों प्रत्यक्षसे असिद्ध हैं ।¹ (ङ) न्यायविरोध—प्रमाणोंसे पदार्थके स्वरूपकी परीक्षा करना 'न्याय' होता है ।² इस परीक्षामें हेतु, कारण, तर्क, युक्तिका मुख्यतया उपयोग होने से इसे हेतुविद्या भी कहते हैं ।³ अश्वघोषने दशतोन्मुख पुरुषको 'हेतुबला- धिक' कहा है ।⁴ इस हेतुविद्या, अपरनाम न्यायविद्या, से दर्शनशास्त्र अभिप्रेत है, वह चाहे आस्तिक (वेदानुकूल) हो, चाहे नास्तिक (वेदनिन्दक या ईश्वरका या परलोकका अस्तित्व न मानने वाला) हो । इस प्रकार 'न्याय' शब्द यहाँ दर्शनकी शाखाविशेषके लिये प्रयुक्त नहीं है, अपितु सामान्यस्वरूप- परक है⁵ ॥ १७३ ॥ (अ) आचार्यने प्रथम उदाहरण नास्तिक (वेदनिन्दक) हेतुविद्याके विरोध १. स्थास्नु-जङ्गम-भेदेन लोकं तत्त्वविदो विदुः । स च तद्व्यवहारोऽत्र, तद्विरोधकरं यथा ।। काव्याल० ४।३६ (i) तेषां कट-तट-भ्रष्टैर्गजानां मद-बिन्दुभिः । प्रावर्तत नदी घोरा हस्त्यश्वरथवाहिना ।। ३७ (ii) धावतां सैन्यवाहानां फेनवारि मुखच्युतम् । चकार जानुदघ्नापान् प्रति दिङ्मुखमध्वनः ।। २. न्यायसूत्र १।१।१ पर वात्स्यायन : प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः । ३. ललितविस्तर, अध्याय १२, पृष्ठ १५६, में साङ्ख्य, योग, वैशेषिकके अतिरिक्त हेतुविद्याका उल्लेख कदाचिद् न्यायविद्या (तर्कशास्त्र) के लिये किया है । यहाँ सामान्य 'दर्शन शास्त्र' अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । ४. सङ्क्लेशपक्षो द्विविधश्च दृष्टस्तथा द्विकल्पो व्यवदानपक्षः । आत्माश्रयो हेतुबलाधिकस्य बाह्याश्रयः प्रत्ययगौरवस्य ।। सौ० ५।१६ ५. विशेषार्थ देखें तर्कसङ्ग्रहतरङ्गिणी, भूमिका, पृष्ठ चार-पाँच ।

२१० काव्यादर्श [३।१७२-१७३ (घ i) 'आधूतकेसरो हस्ती, (ii) तीक्ष्णशृङ्गस्तुरङ्गमः । (iii) गुरुसारोऽयमेरण्डो, (iv) निःसारः खदिरद्रुमः ॥ १७२ ॥ इति लौकिक एवायं विरोधः सर्वगर्हितः । (घ) 'हाथी हिलाई हुई सटाओं (अयाल) वाला है। (ii) घोड़ा तीखे सींगों वाला है । (iii) यह एरण्ड वृक्ष बहुत मजबूत है । (iv) खैरका वृक्ष निर्बल है ॥ १७२ ॥ यह लोकमें उपलब्ध विरोध सबके द्वारा निन्दित है । ग्रामके शास्त्रोक्त स्वरूपके विपरीत स्वरूपका वर्णन उदाहरणके रूपमें प्रस्तुत किया है।' दण्डीका कलाविरोधनिरूपण अधिक सूचनापूर्ण तथा शास्त्रके विकासकी प्रक्रियाको प्रस्तुत करता है ॥ १७१ ॥ (घ) लोकविरुद्ध दोष—आचार्यने इस दोषको स्वतः स्पष्ट चार उदाहरण देकर स्पष्ट किया है। (i) 'केसर' (अथवा 'केशर') पशुओंमें सिंहों की या घोड़ोंकी गरदनपर 'अयाल' के नाम से प्रसिद्ध होता है। हाथीके नहीं होता । हाथीकी विशेषता सूँड (शुण्डा) है, जिसे हाथका काम करनेके कारण 'कर' या 'हस्त' कहा जाता है। या फिर आगेको निकले दाँत होते हैं। इन दोनों विशेषताओंके कारण गजको करी, हस्ती (हाथी) और दन्ती, दन्तावल कहा जाता है। (i) हाथीके अयाल और (ii) घोड़ेके सींग लोकमें प्रत्यक्षविरुद्ध हैं। (iii) इसी प्रकार एरण्ड (रेंडी) वृक्ष बहुत कमजोर तने और कम गहरी जड़ों वाला होता है। जबकि (iv) खैरका वृक्ष इसके विपरीत है। इस प्रकार आचार्यने वन्य और ग्राम्य पशुओं और ग्राम्य और वन्य वृक्षोंके एकेक उदाहरण देकर इस दोषका स्वरूप स्पष्ट किया है। १. कला संकलना प्रज्ञा, शिल्पान्यस्याश्च गोचरः । विपर्यस्तं तथैवाहुस्तद्विरोधकरं, यथा ॥ काव्यालङ्कार ४।३३ ऋषभात्पञ्चमस्तस्मात् षड्जं धैवतं स्मृतम् । अयं हि मध्यमग्रामो मध्यमोत्पीडितर्षभः ॥ ३४ इति साधारितं मोहादन्यथैवावगच्छति । अन्यास्वपि कलास्वेवमभिधेया विरोधिता ॥ ३५ षड्ज आदि स्वर पुँल्लिङ्ग हैं। भामहने षड्ज और धैवतको नपुंसक न जाने किस आधारपर दिया है। उदाहरणका भाष्य देवेन्द्रनाथ शर्माजीके महाभाष्यमें देखें ।

३।१७८] ५. दोष : (१० च) आगमविरोध २१५ (ii) असावनुपनीतोऽपि वेदानधिजगे गुरोः । स्वभावशुद्धः स्फटिको न संस्कारमपेक्षते ॥ १७८ ॥ (ii) उसने उपनयन संस्कारसे रहित होते हुए भी गुरुसे वेदोंका अध्ययन किया । स्वभावसे शुद्ध (स्वच्छ) स्फटिक मणिको संस्कार (पालिश) की जरूरत नहीं होती ॥ १७८ ॥ इसे वैश्वानरी इष्टि कहते हैं । इस इष्टिमें अग्निका आधान आवश्यक है । ब्राह्मण यजमान और उसकी पत्नी दोनों क्षौम वस्त्र धारण करके वसन्त ऋतुमें आहवनीय अग्निका आधान करें ।¹ इस प्रकार अग्निका आधान करने वाले ब्राह्मण दम्पति आहिताग्नि कहलाते हैं । प्रकृत उदाहरणमें अग्न्याधान नहीं करने वाले विप्रोंको, और वह भी शास्त्रशुद्ध आचरण करने वाले विप्रों को, वैश्वानरी इष्टिका अनुष्ठान करता बताया है । अतः श्रुतिरूप आगमका विरोध यहाँ स्पष्ट है । इसके अतिरिक्त, इस कथनका एक आशय और हो सकता है : श्रौत परम्पराके अनुसार विप्रोंको स्नातक होनेके बाद अग्न्याधान करके योग्य पत्नीका पाणिग्रहण करनेके बाद ही सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिए । ये ब्राह्मण यद्यपि शास्त्रानुसारी शुद्ध आचार वाले हैं, तथापि इन्होंने (१) अग्न्याधान किये बिना घरमें औरत लाकर (२) उनसे स्वेच्छाचारसे पुत्र प्राप्त कर लिये । (३) अब वे लोग वह वैश्वानरी इष्टि कर रहे हैं, जो विधिवद् आहिताग्नि अजातपुत्र पुरुषके द्वारा पहले सन्तानोत्पत्तिका निमित्त और फिर पुत्र हो जाने पर की जानी चाहिये । इस प्रकार इस श्लोकमें श्रुतिविरोध नाना प्रकार से है । वितन्वते—वि + √ तन् विस्तारे, कर्तरि लट्, प्र० पु० ब० व० । श्रौत (आहित) अग्नियोंमें यज्ञकर्म करनेके लिये वि + √ तन्‌का प्रयोग शास्त्रमें किया जाता है । इसीलिये श्रौत यज्ञोंको ‘वितान’ कहते हैं² ॥ १७७ ॥ (ii) स्मृतिविरोध—मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रोंके अनुसार एक उचित वयस् तक गुरुसे उपनयन संस्कार प्राप्त नहीं करने वाला द्विज न केवल वेदा- १. तैत्तिरीय ब्राह्मण १।२।६ : वसन्ता ब्राह्मणोऽग्निमादधीत । वसन्तो वै ब्राह्मणस्यर्तुः । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र ५।४।१० : क्षौमे वसानौ जाय-पती अग्निमादधीयाताम् । २. अमरकोष ३।३।१९३ : क्रतुविस्तारयोरस्त्री, वितानं त्रिषु तुच्छके ॥

२१४ काव्यादर्श [३।१७६-१७७ (च) अथागमविरोधस्य प्रस्थानं दर्शयिष्यते ॥ १७६ ॥ (i) ‘अनाहिताग्नयोऽप्येते जातपुत्रा वितन्वते । विप्रा वैश्वानरीमिष्टमक्लिष्टाचारभूषणाः’ ॥ १७७ ॥ (च) अब आगमविरोधका स्वरूप (उदाहरणोंसे) प्रदर्शित किया जायेगा ॥ १७६ ॥ (i) ‘अग्न्याधान नहीं करने वाले भी उत्पन्न हुए पुत्रों वाले, सरल, शुद्ध आचरण रूपी अलङ्कारों वाले ये ब्राह्मण वैश्वानरीया इष्टि (श्रौत याग) का अनुष्ठान कर रहे हैं ॥ १७७ ॥ अन्तर्गत भी उन्होंने धर्मशास्त्रों और उनके द्वारा विहित लोकमर्यादाको लिया है । आन्वीक्षिकीकी कहीं चर्चा नहीं है ।¹ (३) वस्तुतः धर्मशास्त्रकी गणना त्रिवर्गोक्तिरूप शास्त्र अर्थात् न्यायके रूपमें की ही जा चुकी है । अतः आगम- विरोधी (धर्मशास्त्र और तत्कृत लोकमर्यादाओंका विरोध करना) दोषका पृथक्से उल्लेख स्ववचनविरोध है । इस प्रकार भामहका इन दोषोंका निरूपण शिथिल है, युक्तिसङ्गत नहीं है । दण्डनीतिका सम्बन्ध केवल धर्म या अर्थसे है । कामपुरुषार्थसे सम्बन्ध है कामशास्त्रका । तत्सम्बन्धी दोष कलाविरोधमें या आगमविरोधमें समाहित हो जायेगा । तब, यहाँ उसके पुनः कथनकी आवश्यकता ही नहीं है । (च) आगमविरोध—दण्डीने ‘आगम’के अन्तर्गत मनुष्यके लिये व्यक्तिगत और सामाजिक आचारकी विधायक (i) श्रुति और (ii) स्मृतिको लिया है, यह पीछे ‘आगम’के लक्षणमें देख चुके हैं । यहाँ इन दोनोंके एकेक उदा- हरण आचार्यने अगले दो श्लोकोंमें प्रस्तुत किये हैं : (i) श्रुतिविरोध : तैत्तिरीय संहिताके अनुसार शास्त्रानुसार प्रजोत्पादनके योग्य (शास्त्रीय पद्धतिसे अग्न्याधान करके दारकर्म कर चुके) पुरुषको सन्तान नहीं है और सन्तानकी इच्छा है, तो वह अग्न्याधान करके वैश्वानर देवताके निमित्त द्वादश कपालोंपर संस्कृत पुरोडाशका निर्वाप (आहुति दे) । और फिर पुत्र होनेपर वैश्वानरके निमित्त द्वादशकपाल पुरोडाशकी आहुति दे ।² १. आगमो धर्मशास्त्राणि लोकसीमा च तत्कृता । तद्विरोधि तदाचारव्यतिक्रमणतो, यथा ॥ काव्याल० ४।४८ २. तैत्तिरीय संहिता २।२।५।१-३ : वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् ।... एतामेव निर्वपेत् प्रजाकामः ।...योऽलं प्रजायै सन् प्रजां न विन्दते । यद् वैश्वानरो द्वादशकपालो भवति ।...विन्दते प्रजाम् । वैश्वानरं द्वादश- कपालं निर्वपेत्...पुत्रे जाते ।

३।१७८] ५. दोष : (१० च) आगमविरोध २१५ (ii) असावनुपनीतोऽपि वेदानधिजगे गुरोः । स्वभावशुद्धः स्फटिको न संस्कारमपेक्षते ॥ १७८ ॥ (ii) उसने उपनयन संस्कारसे रहित होते हुए भी गुरुसे वेदोंका अध्ययन किया । स्वभावसे शुद्ध (स्वच्छ) स्फटिक मणिको संस्कार (पालिश) की जरूरत नहीं होती ॥ १७८ ॥ इसे वैश्वानरी इष्टि कहते हैं । इस इष्टिमें अग्निका आधान आवश्यक है । ब्राह्मण यजमान और उसकी पत्नी दोनों क्षौम वस्त्र धारण करके वसन्त ऋतुमें आहवनीय अग्निका आधान करें । १ इस प्रकार अग्निका आधान करने वाले ब्राह्मण दम्पति आहिताग्नि कहलाते हैं । प्रकृत उदाहरणमें अग्न्याधान नहीं करने वाले विप्रोंको, और वह भी शास्त्रशुद्ध आचरण करने वाले विप्रों को, वैश्वानरी इष्टिका अनुष्ठान करता बताया है । अतः श्रुतिरूप आगमका विरोध यहाँ स्पष्ट है । इसके अतिरिक्त, इस कथनका एक आशय और हो सकता है : श्रौत परम्पराके अनुसार विप्रोंको स्नातक होनेके बाद अग्न्याधान करके योग्य पत्नीका पाणिग्रहण करनेके बाद ही सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिए । ये ब्राह्मण यद्यपि शास्त्रानुसारी शुद्ध आचार वाले हैं, तथापि इन्होंने (१) अग्न्याधान किये बिना घरमें औरत लाकर (२) उनसे स्वेच्छाचारसे पुत्र प्राप्त कर लिये । (३) अब वे लोग वह वैश्वानरी इष्टि कर रहे हैं, जो विधिवद् आहिताग्नि अजातपुत्र पुरुषके द्वारा पहले सन्तानोत्पत्तिका निमित्त और फिर पुत्र हो जाने पर की जानी चाहिये । इस प्रकार इस श्लोकमें श्रुतिविरोध नाना प्रकार से है । वितन्वते—वि + √ तन् विस्तारे, कर्तरि लट्, प्र० पु० ब० व० । श्रौत (आहित) अग्नियोंमें यज्ञकर्म करनेके लिये वि + √ तन्का प्रयोग शास्त्रमें किया जाता है । इसीलिये श्रौत यज्ञोंको ‘वितान’ कहते हैं२ ॥ १७७ ॥ (ii) स्मृतिविरोध—मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रोंके अनुसार एक उचित वयस् तक गुरुसे उपनयन संस्कार प्राप्त नहीं करने वाला द्विज न केवल वेदा- १. तैत्तिरीय ब्राह्मण १।२।६ : वसन्ता ब्राह्मणोऽग्निमादधीत । वसन्तो वै ब्राह्मणस्यर्तुः । आपस्तम्ब श्रौतसूत्र ५।४।१० : क्षौमे वसानौ जाय-पती अग्निमादधीयाताम् । २. अमरकोष ३।३।११३ : क्रतुविस्तारयोरस्त्री, वितानं त्रिषु तुच्छके ॥

२१४ काव्यादर्श [३।१७६-१७७

(च) अथागमविरोधस्य प्रस्थानं दर्शयिष्यते ॥ १७६ ॥ (i) 'अनाहिताग्नयोऽप्येते जातपुत्रा वितन्वते । विप्रा वैश्वानरीमिष्टमक्लिष्टाचारभूषणाः' ॥ १७७ ॥ (च) अब आगमविरोधका स्वरूप (उदाहरणोंसे) प्रदर्शित किया जायेगा ॥ १७६ ॥ (i) 'अग्न्याधान नहीं करने वाले भी उत्पन्न हुए पुत्रों वाले, सरल, शुद्ध आचरण रूपी अलङ्कारों वाले ये ब्राह्मण वैश्वानरीया इष्टि (श्रौत याग) का अनुष्ठान कर रहे हैं ॥ १७७ ॥ अन्तर्गत भी उन्होंने धर्मशास्त्रों और उनके द्वारा विहित लोकमर्यादाको लिया है । आन्वीक्षिकीकी कहीं चर्चा नहीं है ।१ (३) वस्तुतः धर्मशास्त्रकी गणना त्रिवर्गोक्तिरूप शास्त्र अर्थात् न्यायके रूपमें की ही जा चुकी है। अतः आगम- विरोधी (धर्मशास्त्र और तत्कृत लोकमर्यादाओंका विरोध करना) दोषका पृथक्से उल्लेख स्ववचनविरोध है । इस प्रकार भामहका इन दोषोंका निरूपण शिथिल है, युक्तिसङ्गत नहीं है। दण्डनीतिका सम्बन्ध केवल धर्म या अर्थसे है । कामपुरुषार्थसे सम्बन्ध है कामशास्त्रका । तत्सम्बन्धी दोष कलाविरोधमें या आगमविरोधमें समाहित हो जायेगा। तब, यहाँ उसके पुनः कथनकी आवश्यकता ही नहीं है । (च) आगमविरोध—दण्डीने 'आगम'के अन्तर्गत मनुष्यके लिये व्यक्तिगत और सामाजिक आचारकी विधायक (i) श्रुति और (ii) स्मृतिको लिया है, यह पीछे 'आगम'के लक्षणमें देख चुके हैं। यहाँ इन दोनोंके एकेक उदा- हरण आचार्यने अगले दो श्लोकोंमें प्रस्तुत किये हैं : (i) श्रुतिविरोध : तैत्तिरीय संहिताके अनुसार शास्त्रानुसार प्रजोत्पादनके योग्य (शास्त्रीय पद्धतिसे अग्न्याधान करके दारकर्म कर चुके) पुरुषको सन्तान नहीं है और सन्तानकी इच्छा है, तो वह अग्न्याधान करके वैश्वानर देवताके निमित्त द्वादश कपालोंपर संस्कृत पुरोडाशका निर् वाप (आहुति दे) । और फिर पुत्र होनेपर वैश्वानरके निमित्त द्वादशकपाल पुरोडाशकी आहुति दे ।२

१. आगमो धर्मशास्त्राणि लोकसीमा च तत्कृता । तद्विरोधि तदाचारव्यतिक्रमणतो, यथा ॥ काव्याल० ४।४८ २. तैत्तिरीय संहिता २।२।५।१-३ : वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् ।··· एतामेव निर्वपेत् प्रजाकामः ।···योऽलं प्रजायै सन् प्रजां न विन्दते । यद् वैश्वानरो द्वादशकपालो भवति ।···विन्दते प्रजाम् । वैश्वानरं द्वादश- कपालं निर्वपेत्···पुत्रे जाते ।

३।१८२-१८३] कविका कौशल दोषको भी गुण बना देता है २१६ कामिनां लयवैषम्याद् गेयं रागमवर्धयत् ॥ १८२ ॥ (घ) ऐन्दवादर्चिषः कामी शिशिरं हव्यवाहनम् । अबलाविरहक्लेशविक्लवो गणयत्ययम् ॥ १८३ ॥ के मुखसे निकले हुए गीतने लयमें विषमताके कारण कामिजनोंका राग बढ़ा दिया ॥ १८२ ॥ (घ) सुन्दरीके विरहके कष्टसे व्याकुल वह कामी आगको चन्द्रमाकी किरणकी अपेक्षा शीतल समझता है ॥ १८३ ॥ दिया कि अब गिरी तब गिरी । परिणामतः उनके गीतोंकी लय बिगड़ गई । किन्तु उसी लयवैषम्यने आसपास विद्यमान उनके कामी प्रियोंके मनमें उनके प्रति प्रेम और गहरा कर दिया । गीत, वाद्य और पाद आदिके विन्यासकी द्रुत मध्य विलम्बितके रूपमें क्रिया और काल (मात्रा) की समता लय होती है ।¹ समतायुक्त विन्यास ही गीत वाद्य और नृत्यको आनन्द- दायी बनाता है । लयभङ्ग होनेपर ये उद्वेजक हो जाते हैं । किन्तु प्रियाओंकी भयत्रस्त मुद्रा और उसके कारण होने वाला गीतमें लयवैषम्य उनके प्रियोंको आनन्दित ही करता है । इस प्रकार यह कलाविरोध दोष न होकर कविके कौशलसे रतिका उद्दीपक होनेके कारण गुण हो गया है² ॥ १-२ ॥ (घ) लोकविरोधकी गुणताका उदाहरण—चन्द्रमाकी किरणोंका स्वभाव लोकमें शीतल समझा जाता है । आगका स्वभाव शीतके विपरीत उष्ण होता है । किन्तु यहाँ कविने उसे चन्द्रकिरणसे अधिक शीतल कहा है । इस प्रकार यहाँ लोकस्वभावका विरोध स्पष्ट है । किन्तु यह विरोध कामियोंकी रतिकी विशेष अवस्थाका सूचक होनेसे दोषकी बजाय गुण हो गया है । चन्द्रकिरणोंके स्पर्शसे कामियोंकी व्याकुलता बढ़ती है, उनकी कामाग्नि उद्दीप्त होती है; जबकि अग्निसे इस प्रकारकी कोई अनुभूति नहीं होती । अतः चन्द्रकिरण उनके लिये उष्ण हैं और अग्नि शीतल ॥ १८३ ॥ १. अमरकोष १।७।६ : तालः कालक्रियामानं लयः साम्यम् । रामाश्रमी : गीतिवाद्यपादादिन्यासानां क्रियाकालयोः साम्यं लयः । २. तनिक भिन्न परिवेशमें लयवैषम्य और भिन्नगीतताके वर्णनके लिये अवन्तिसुन्दरी कथा, पृष्ठ १६३, पंक्ति १६ देखें : अनवधानस्खलितपाद- विषमितलयम्, आयासश्वासभिन्नगीतरागम्, ॰॰॰आरब्धानन्दनृत्तया॰॰॰ विन्ध्यसेनया॰॰॰।

२१८ काव्यादर्श [३।१८१-१८२ धुन्वन् कदम्बरजसा सह सप्तच्छदोद्गमान् ॥ १८१ ॥ (ग) दोलाऽति प्रेरणत्रस्तवधूजनमुखोद्गतम् । कदम्ब पुष्पोंकी परागके साथ सप्तच्छदके अङ्कुरोंको हिलाता हुआ वायु चला ॥ १८१ ॥ (ग) झूलेको अधिक वेगसे झुलानेके कारण डरी (सहमी) हुई बहुओं आते हैं । (३) खर वायु ग्रीष्ममें चला करता है । इस प्रकार भिन्नकाल- भावी ये तीनों बातें यहाँ एककालभावीके रूपमें बताई होनेके कारण काल- विरोधी हैं । किन्तु कविने इन्हें राजाओंके विनाशके सूचक दुर्निमित्त १ (उत्पात), अपशकुनके रूपमें प्रस्तुत करके इस कालविरोधको दोष (उद्वेजक) नहीं रहने दिया है, अपितु विवक्षित अर्थका पोषक होनेके कारण गुण बना दिया है । प्रखर वायु, बेमौसमके पुष्पोद्गम आदि अशुभके सूचक उत्पात शकुनशास्त्रमें और लोकमें प्रसिद्ध हैं ।२ (१) शरद्ऋतुका समय, जब कि छतौनके वृक्षोंमें पुष्पोद्गम स्वाभाविक होता है, राजाओंके विजयार्थ सैन्यप्रयाणका समय होता है । उस समय (२) ग्रीष्ममें चलने वाली प्रखर हवा और (३) प्रयाणमें बाधक वर्षामें फूलने वाले कदम्बोंमें ऋतुके बीतनेपर भी पुष्पोद्गम अशुभ प्राकृतिक शकुन है । ये सब विजयार्थी राजाके विनाशके सूचक हैं ॥ १८१ ॥ (ग) कालविरोध की गुणताका उदाहरण—सावनमें झूला झूलती बहुओं को उनकी ननदों या सहेलियोंने झूलेको बहुत जोर-जोरसे झोंटे देकर डरा १. भौम, आन्तरिक्ष और दिव्य महोत्पातोंका विशद वर्णन अवन्तिसुन्दरी, पृष्ठ ५२-५४ तथा ११७-११८ में देखें । पृष्ठ ५२ : अनन्तरं च सर्वस्या- मेवोर्व्यां सर्वक्षत्र (विनाश) पिशुनाः ⋯ चरितुमारभन्त घोररूपा महो- त्पाताः । तथा हि— ⋯ ऋतवः सर्व एव स्वचिह्न लक्ष्म्याः समन्ततः समं समाजग्मुः । ⋯ प्रसभोत्पाटितनिरस्तवृक्षवीरुधः, क्षुण्णपाषाणशर्कराः क्षणमपि नोपरेमुरुग्रस्वनाः प्रभ्रमन्तः प्रभञ्जनाः । पृष्ठ ११८ : भ्रमन्ति भीमा वायवः ⋯ । २. उत्पाता बहवस्तत्र निपेतुर्र्जायमानयोः । दिवि भुव्यन्तरिक्षे च लोकस्योरुभयावहाः ॥ श्रीमद्भागवतपु० ३।१७।३ ववौ वायुः सुदुःस्पर्शः फूत्कारानीरयन् मुहुः । अकाले फलपुष्पाणि देशोपद्रवकारणम् । विष्णुध० पु० १।३७ भी देखें ।

३।१८२-१८३] कविका कौशल दोषको भी गुण बना देता है २१६ कामिनां लयवैषम्याद् गेयं रागमवर्धयत् ॥ १८२ ॥ (घ) ऐन्दवार्चिषः कामी शिशिरं हव्यवाहनम् । अबलाविरहक्लेशविकलवो गणयत्ययम् ॥ १८३ ॥ के मुखसे निकले हुए गीतने लयमें विषमताके कारण कामिजनोंका राग बढ़ा दिया ॥ १८२ ॥ (घ) सुन्दरीके विरहके कष्टसे व्याकुल वह कामी आगको चन्द्रमाकी किरणकी अपेक्षा शीतल समझता है ॥ १८३ ॥ दिया कि अब गिरी तब गिरी । परिणामतः उनके गीतोंकी लय बिगड़ गई । किन्तु उसी लयवैषम्यने आसपास विद्यमान उनके कामी प्रियोंके मनमें उनके प्रति प्रेम और गहरा कर दिया । गीत, वाद्य और पाद आदिके विन्यासकी द्रुत मध्य विलम्बितके रूपमें क्रिया और काल (मात्रा) की समता लय होती है ।¹ समतायुक्त विन्यास ही गीत वाद्य और नृत्यको आनन्द- दायी बनाता है । लयभङ्ग होनेपर ये उद्वेजक हो जाते हैं । किन्तु प्रियाओंकी भयत्रस्त मुद्रा और उसके कारण होने वाला गीतमें लयवैषम्य उनके प्रियोंको आनन्दित ही करता है । इस प्रकार यह कलाविरोध दोष न होकर कविके कौशलसे रतिका उद्दीपक होनेके कारण गुण हो गया है² ॥ १८२ ॥ (घ) लोकविरोधकी गुणताका उदाहरण—चन्द्रमाकी किरणोंका स्वभाव लोकमें शीतल समझा जाता है । आगका स्वभाव शीतके विपरीत उष्ण होता है । किन्तु यहाँ कविने उसे चन्द्रकिरणसे अधिक शीतल कहा है । इस प्रकार यहाँ लोकस्वभावका विरोध स्पष्ट है । किन्तु यह विरोध कामियोंकी रतिकी विशेष अवस्थाका सूचक होनेसे दोषकी बजाय गुण हो गया है । चन्द्रकिरणोंके स्पर्शसे कामियोंकी व्याकुलता बढ़ती है, उनकी कामाग्नि उद्दीप्त होती है; जबकि अग्निसे इस प्रकारकी कोई अनुभूति नहीं होती । अतः चन्द्रकिरण उनके लिये उष्ण हैं और अग्नि शीतल ॥ १८३ ॥ १. अमरकोष १।७।६ : तालः कालक्रियामानं लयः साम्यम् । रामाश्रमी : गीतिवाद्यपादादिन्यासानां क्रियाकालयोः साम्यं लयः । २. तनिक भिन्न परिवेशमें लयवैषम्य और भिन्नगीतताके वर्णनके लिये अवन्तिसुन्दरी कथा, पृष्ठ १६३, पंक्ति १६ देखें : अनवधानस्खलितपाद- विषमितलयम्, आयासश्वासभिन्नगीतरागम्,···आरब्धानन्दनृत्यया··· विन्ध्यसेनया···।

२१८ काव्यादर्श, [३।१८१-१८२ धून्वन् कदम्बरजसा सह सप्तच्छदोद्गमान् ॥ १८१ ॥ (ग) दोलाऽति प्रेरणत्रस्तवधूजनमुखोद्गतम् । कदम्ब पुष्पोंकी परागके साथ सप्तच्छदके अङ्कुरोंको हिलाता हुआ वायु चला ॥ १८१ ॥ (ग) झूलेको अधिक वेगसे झुलानेके कारण डरी (सहमी) हुई बहुओं आते हैं । (३) खर वायु ग्रीष्ममें चला करता है । इस प्रकार भिन्नकाल- भावी ये तीनों बातें यहाँ एककालभावीके रूपमें बताई होनेके कारण काल- विरोधी हैं । किन्तु कविने इन्हें राजाओंके विनाशके सूचक दुर्निमित्त (उत्पात), अपशकुनके रूपमें प्रस्तुत करके इस कालविरोधको दोष (उद्वेजक) नहीं रहने दिया है, अपितु विवक्षित अर्थका पोषक होनेके कारण गुण बना दिया है । प्रखर वायु, बेमौसमके पुष्पोद्गम आदि अशुभके सूचक उत्पात शकुनशास्त्रमें और लोकमें प्रसिद्ध हैं ।¹ (१) शरद्ऋतुका समय, जब कि छतौनके वृक्षोंमें पुष्पोद्गम स्वाभाविक होता है, राजाओंके विजयार्थ सैन्यप्रयाणका समय होता है । उस समय (२) ग्रीष्ममें चलने वाली प्रखर हवा और (३) प्रयाणमें बाधक वर्षांमें फूलने वाले कदम्बोंमें ऋतुके बीतनेपर भी पुष्पोद्गम अशुभ प्राकृतिक शकुन हैं । ये सब विजयार्थी राजाके विनाशके सूचक हैं ॥ १८१ ॥ (ग) कलाविरोध की गुणताका उदाहरण — सावनमें झूला झूलती बहुओं को उनकी ननदों या सहेलियोंने झूलेको बहुत जोर-जोरसे झोंटे देकर डरा १. भौम, आन्तरिक्ष और दिव्य महोत्पातोंका विशद वर्णन अवन्तिसुन्दरी, पृष्ठ ५२-५४ तथा ११०-११८ में देखें । पृष्ठ ५२ : अनन्तरं च सर्वस्या- मेवोर्व्यां सर्वंक्षत्र (विनाश) पिशुनाः <sup>...</sup> चरितुमारभन्त घोररूपा महो- त्पाताः । तथा हि — <sup>...</sup>ऋतवः सर्वे एव स्वचिह्न लक्ष्म्याः समन्ततः सम समाजग्मुः । <sup>...</sup>प्रसभोत्पाटितनिरस्तवृक्षवीरुधः, क्षुण्णपाषाणशर्कराः क्षणमपि नोपरेमुरुग्रस्वनाः प्रभ्रमन्तः प्रभञ्जनाः । पृष्ठ ११८ : भ्रमन्ति भीमा वायवः<sup>...</sup> । २. उत्पाता बहवस्तत्र निपेतुर्जायमानयोः । दिवि भुव्यन्तरिक्षे च लोकस्योरुभयावहाः ॥ श्रीमद्भागवतपु० ३।१७।३ ववौ वायुः सुदुःस्पर्शः फूत्कारानीरयन् मुहुः । अकाले फलपुष्पाणि देशोपद्रवकारणम् । विष्णुध० पु० १।३७ भी देखें ।

[३।१८५] दोषोंका इतिहास २८३

तो निरूपण किया है और कुछका निरूपण सम्भवतः उनकी सुपरिचित दोषके रूपमें मान्यताके कारण न करके उनका उल्लेखमात्र प्रसङ्गेन किया है। अलङ्कारपरम्परामें मेधावी द्वारा उद्भावितके रूपमें प्रसिद्ध सात उपमा- दोषोंमें से तीनको उन्होंने अनित्यदोषके रूपमें लिङ्गभेद और वचनभेद दोषों के अतिरिक्त भामहप्रोक्त मेधाविसम्मत विपर्ययको उपमानकी हीनता और अधिकताके रूपमें प्रस्तुत किया है। मेधावीके असम्भव और सादृश्य दोष दण्डीकी उपमामें सम्भव ही नहीं है। मेधावीके भामहाभिमत हीनता और अधिकताके बारेमें दण्डी मौन हैं। १ इस प्रकार दण्डीके अनुसार कुल दोष प्रकृत दस दोषोंको मिलाकर २३ हैं। आचार्य भामहने दोषोंका निरूपण कई स्थानोंमें किया है। प्रकृत अपार्थ आदि ११ दोषोंका निरूपण उन्होंने चतुर्थ और पञ्चम परिच्छेदोंमें सुव्यव- स्थित रूपसे किया है। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित २२ दोषोंमें से कुछका निरूपण और कुछका प्रसङ्गसे उल्लेखमात्र भिन्न-भिन्न स्थानोंपर किया है : १ आकुलताका उल्लेख (१।२५,३५; ३।५४; ५।६७में) किया है। २ अपुष्टार्थ (१।३४), ३ ग्राम्य शब्द (१।१६), ४ ग्राम्य अर्थ (१।३५) का भी उल्लेख किया है। ५ नेयार्थ, ६ क्लिष्ट, ७ अन्यार्थ, ८ अवाचक, ६ अयुक्तिकमत् और १० गूढशब्दाभिधान दोषोंका पूर्णतया या अंशतः निरूपण (१।३७में) किया है। ११ श्रुतिदुष्ट, १२ अर्थदुष्ट, १३ कल्पनादुष्ट, १४ श्रुतिकष्ट दोषोंका निरूपण (१।४७में) किया है। इनके अतिरिक्त भामहने आचार्य मेधावी द्वारा प्रोक्तके नामसे उल्लेख करते हुए उपमा अलङ्कारके सात दोषोंका निरूपण (२।३६में) किया है : १५ हीनता, १६ असम्भव, १७ लिङ्गभेद १८ वचनभेद, १६ विपर्यय, २० अधिकता और २१ असादृश्य, २२ बहूपूरण, (शब्दोंकी अनावश्यक भरती, अधिकपदताका) उल्लेख (५।६७में) किया है। इनके अतिरिक्त (५।६२में) अदृष्ट और असुनिभेद एवम् अपेशलताका उल्लेख किया है। किन्तु ये पूर्वोक्त श्रुतिकष्टत्व, अवाचकत्व आदिके ही परिणाममूलक नामान्तर हैं। अतः पृथक् सञ्ज्ञाके अधिकारी नहीं हैं। इसी प्रकार (५।६७में प्रोक्त) विरुद्धपद एवम् अस्वर्थ भी अन्य दोषोंके ही नामान्तर हैं। इस प्रकार भामहने ११ + २२ = ३३ दोषोंका उल्लेख किया है। इनमें से कुछको भामहने शब्ददोषके रूपमें निरूपित किया है और कुछको अर्थदोषके रूपमें। यद्यपि इनका भामहकृत निरूपण व्यवस्थित और बहुत गम्भीर नहीं १. प्रसादिनी २।५१, पृष्ठ ४५ देखें।

२२२ काव्यादर्श [३।१८५

तथा उसके अनुसार स्थापित लोकमर्यादाके विपरीत था । किन्तु द्रौपदीके भाग्यमें विधाताने लेख ही ऐसा लिखा था, जिसके अनुसार उसे इस प्रकारकी धर्मविरुद्ध स्थितिका निश्छल भावसे पालन करना था । अपने इसी कर्तव्यबोध तथा उसके पालनके कारण वह 'परम सती' कहलाई । इस प्रकार कविने चतुर्थ पादसे आगमविरोध दोषका परिहार कर दिया । महाभारतके लेखकने भी इसी लिये द्रौपदीके चरित्रके निरूपणमें शङ्करसे पाँच बार पति देनेकी प्रार्थना करने वाली ऋषिकन्याको शङ्कर द्वारा पाँच पति पानेके वरकी कल्पना की है । इस प्रकार आचार्यने (१०) देशादिविरोध दोषके छहों भेदोंमें कवि- कौशलसे दोषत्वका परिहार करके गुणत्वका उदाहरणोंसे निदर्शन किया । अन्य दोषोंके दोषत्वके परिहारकी दिशाका निर्देश आचार्य तत्तद् दोषके प्रसङ्गमें कर चुके हैं । दोषधून्युत्तरीं प्राप्ता नगोच्चं भरतं शुभा । काव्यदोषनिराकृत्या सोपयोगा पयस्विनी ॥ १ ॥ दण्डिदेवप्रयागेऽथ रम्या हृद्या सुधीहिता । मामहोपत्यकाग्राप्तमवगाहधौतधीमला ॥ २ ॥ दोषस्रोतस्विनी सेयं व्याख्याता मूलशोधनात् । भाद्रार्जैकादशीसौम्ये प्रातश्चन्द्रे रहो गते ॥ ३ ॥ — ० — शुभे विंशे दिनेऽगस्त्यमासस्याद्य गुरौ पुनः । दोषशैवलिनी रम्या वामनग्रामतो गता ॥ १ ॥ विशेषान् यानथ प्राप्ता रुद्रतीर्थसङ्गता । व्याख्यास्ये तानहं सम्यक् सर्वस्यानन्दवर्धनान् ॥ २ ॥ प्रीयतामथ पुण्येयं भवभूतिप्रदा शिवा । इदम्परमवद्वेषा धीप्रदा शारदा मयि ॥ ३ ॥ दोषोंका इतिहास—आचार्य दण्डीने इन सर्वमार्गसाधारण दस दोषोंके अतिरिक्त मार्गविशेषके कुछ अन्य दोषोंकी चर्चा भी काव्यादर्शमें यत्र तत्र की है । उनमें से बन्धके १ शैथिल्य, २ वैषम्य और ३ पारुष्य नामक तीन दोष, ४ दुष्प्रतीति, ५ शब्दगत और ६ अर्थगत ग्राम्यता दोष, ७ नेयार्थता, ८ आकुलता और ६ लोकसीमातिक्रमण दोषोंका उल्लेख प्रथम परिच्छेदके गुणप्रकरणमें (पृष्ठ ६८में) किया जा चुका है। दण्डीने इनमें से कुछका