भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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३।१८५ ] दोषोंका इतिहास २२६ प्रोक्त अदोषताका निरूपण भी सङ्क्षेपसे मम्मटने किया है। अदोषताका आधार प्रायः दण्डीका अनुगामी है। मम्मटके बाद दोषोंकी व्यवस्थाके विषयमें कोई विशेष योगदान काव्य- शास्त्रमें उपलब्ध नहीं होता। निष्कर्ष—दोषके स्वरूपके विकासमें भरतसे प्रारब्ध परम्पराने दण्डीके काव्यादर्शमें जिस स्वरूपको प्राप्त किया, वह भामह, वामनमें यथावत् उपलब्ध होता है। दोषोंकी सङ्ख्या तथा उनकी व्यवस्था में विकास क्रमशः इन्हीं आचार्योंमें उपलब्ध होता है। दोषके स्वरूपमें क्रान्तिकारी विकास ‘विरस’ की उद्भावनासे आचार्य रुद्रटने किया है। उन्होंने व्यवस्थाके वामनके आधारमें भी कुछ सुधार करके दोषोंको पद, वाक्य, तथा अर्थमें, आश्रित किया। आनन्दवर्धनने रुद्रटके ‘विरस’ का विस्तार किया और असभङ्गको दोषका आधार निरूपित किया। महिमभट्टने आनन्दवर्धनको ही आधार बनाकर दोषोंकी व्यवस्थाको रसाश्रय किया। अग्निपुराणकार और भोजने स्वरूपमें कोई विकास नहीं किया। वे वस्तुतः रुद्रटसे बहुत आगे नहीं बढ़ सके। मम्मटने (क) स्वरूप आनन्दवर्धन और महिमभट्टके अनुसार निरूपित किया एवं (ख) भेदविकल्पनको उन तक उपलब्ध पद, वाक्य, उभय और अर्थके अतिरिक्त रसको दोषका आश्रय बना करके सुन्दर प्रकारसे व्यवस्थित किया है॥ १८५॥ भाद्रकृष्णत्रयोदश्यां मन्दवासरेऽपराह्नके। पुष्यभे कर्कगे चन्द्रे दोषेतिहासदर्शनम् ॥ १ ॥ मम्मटान्तं व्यधाय्येतदर्प्यते भवपादयोः। धौतयोर्गाङ्गपाथोभिः पूतैर्भक्ताश्रुबिन्दुभिः ॥ २ ॥ प्रीयतामनया स्तुत्या शास्त्रचर्चाऽभिरूपया। पश्वीशो भगवान् मादृक्पशुपाराविपाशनः ॥ ३ ॥ —०— प्रतिकूलविभावादिग्रहो⁶, दीप्तिः⁷ पुनः पुनः । अकाण्डे ‘प्रथनच्छेदा’वङ्गस्याप्यतिविस्तृतिः¹⁰ ॥ अङ्गिनोऽननुसन्धानं,” प्रकृतीनां विपर्ययः¹² । अनङ्गस्याभिधानं¹³ च रसे दोषाः स्युरीदृशाः ॥ काव्यप्रकाश ८२