भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

५४ काव्यादर्श [३।४५ ७. सारयन्तमुरसा रमयन्ती सारभूतमुरुसारधरा तम् । सारसानुकृतसारसकाञ्ची सा रसायनमसारमवैति' ॥ ४५ ॥ ७. स्थिर (दृढ) बने हुए (साधन, शिश्न) को प्रवेश कराते हुए उसे (नायकको) वक्षस्थलसे (दबाकर) रमणके लिए प्रेरित करती हुई, प्रबल कामवेगको या स्थूल एवं व्यायत (खूब लम्बे) दृढ (साधन) को (वराङ्गमें) धारण करने वाली, सीत्कार आदि आनन्दध्वनियों वाली, 'सारस' नामक पक्षियोंके समान आवाजसे युक्त करधनी वाली वह (रमणी) रसायनको निस्सार (तुच्छ) समझती है ॥ ४५ ॥ 'आनमत' पाठमें 'मानमानमत' वर्णसमुदायकी तृतीय और चतुर्थ पाद- वर्ती द्विपादादि आवृत्तिसे भी यमक हो जाता है । तब यहाँ चतुष्पादाद्यन्त यमकका द्विपादादियमकसे सङ्कर होनेसे सङ्कीर्ण यमक है ॥ ४४ ॥ ७. (२. घ. ) व्यपेत चतुष्पाद अर्धसम सजातीय आदि-मध्य यमक— रसिकदेशिक आचार्य कवि दण्डीने प्रकृत ४५वें श्लोकमें सम्भोगरत नन्दिनी२ मृगी नायिकाका प्राञ्जल वर्णन तदनुकूल कोमल तथा उछलकूद करते वर्ण- विन्याससे इन्द्रवज्रा छन्दमें किया है । √सृ+णिच्=√सारिका प्रयोग कामशास्त्रमें सम्भोगक्रियामें शिश्नके वराङ्गमें प्रवेश-निर्गमके प्रसङ्गमें होता है । 'सार' शब्द बल, बलवान्, स्थिर, मजबूत अर्थमें है ।३ यहाँ यह हमेशा सार (स्थिर, दृढ़) न रहने वाले, किन्तु सम्भोगावसरपर स्थिर हो जाने वाले शिश्नके लिये 'भूत' के साथ दिया है : कड़े हुए हुएको प्रवेश कराते हुए नायकको । जैसे ही नायकने सम्भोगकी यह प्रथम क्रिया सम्पादित की, मृगी नायिकाने उसे वक्षसे कसकर सटा लिया । इससे नायककी रमणेच्छा और उद्दीप्त हुई । सम्भोग (उपसृप्तक) की अङ्गभूत अवमर्दन क्रियाके निमित्त नायिकाने रत्यानन्दातिरेकवश अपने १. अन्वयः—सारभूतं सारयन्तं तम् उरसा रमयन्ती, उरुसारधरा, सारसा- नुकृतसारसकाञ्ची सा रसायनम् असारम् अवैति ॥ २. विद्वद्भिः पूजितामेनां, खलैरपि सुपूजिताम् । पूजितां गणिकासङ्घैर्नन्दिनीं को न पूजयेत् ॥ कामसूत्र २।१०।५२ नन्दिनी, सुभगा, सिद्धा, सुभगङ्करणीति च । नारी प्रियेति चाचार्यैः शास्त्रेष्वेषा निरुच्यते ॥ ५३ ३. सारो बले स्थिरांशे च, न्याय्ये क्लीबं, वरे त्रिषु । अमर० ३।३।१७१