काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।४५] दुष्कर यमक ५५ जघनको ऊँचा किया, तो उसका सार (वराङ्ग) और विशाल उत्फुल्ल हो गया।१ सम्भोग क्रियाकी इस हलचलमें उसकी काञ्ची रहरहंकर बज-बज जाती है । उसकी करधनीकी आवाज़ सारसोंकी कलध्वनिके समान है। इस प्रकारके अयन्त्रित रत्यानन्दमहोदधिमें रससराबोर रागवती मृगी नन्दिनी नायिका आयुर्वेदोक्त तथा कामतन्त्रानुकूल सुभगङ्करण, वशीकरण, और वाजीकरण (वृष्य) रसायनोंको२ निस्सार अत एव व्यर्थ, अनावश्यक समझती है । अर्थात् वह इस प्रकारकी रतिके सुखको ही अपने लिये सुभगङ्करण एवं वशीकरण तथा प्रियके लिये वाजीकरण समझती है । रत्नश्री और वादिटीकामें तृतीयपादके आदिमें 'सारसाऽनु०' पाठ धृत एवं व्याख्यात है । इस पाठसे तृतीय और चतुर्थ पादोंके आदिमें 'सारसा' वर्ण समुदायकी व्यपेत आवृत्तिसे यहाँ द्विपाद व्यपेत यमक भी हो जाता है । सजातीय वर्ण समुदाय 'सार' की चारों पादोंके आदि और मध्यमें व्यपेत और दुष्कर आवृत्ति है । इस प्रकार पूर्वार्धमें शुद्ध व्यपेत पादादिमध्य यमक है और उत्तरार्धमें द्विपादादि व्यपेत यमकसे सङ्कीर्ण पादादिमध्य व्यपेत यमक है । इस प्रकार समूचे श्लोकमें द्विपादादि यमकसे सङ्कीर्ण चतुष्पादादिमध्यगत व्यपेत सजातीय यमक है । तरुणटीकामें तृतीय पादादिमें 'सारवाऽनु' पाठ व्याख्यात है ।३ इस स्थिति में व्याख्या यों होगी : आरवेण सीत्कारादिविरुतेनाष्टविधेन सहिता सारवा सा (नायिका) अनुकृताः सारसाः यया सा च काञ्ची । नायिकाके 'सारव' या 'सारसा' विशेषणसे उपसृप्त नायिकाकी, 'व्रीडानाश' तथा 'समधिक- रतियोजना' अवस्थाएँ सूचित होती हैं । 'आरव' या 'आरस'से प्रहणनोत्तरभावी १. कामसूत्र २।२।१० : प्रयोज्यं नायिका... विजने किञ्चिद् गृह्णती पयोधरेण विध्येत्...। २६ : स्तनाभ्यामुरः प्रविश्य तत्रैव भारमारोपयेदिति स्तनालिङ्गनम् । ६।१ : रागकाले विशालयन्त्येव जघनं मृगी संविशे- दुच्चरते । ८ : शिरो विनिपात्योध्वं जघनमुत्फुल्लकम् । ६ : तत्रापसारं दद्यात् । ८।३ : सा (पुरुषायिता)... स्तनाभ्यामुरः पीडयन्ती...। १५ : तदेव विपरीतम् (उच्चीकृत्य) सरभसमवमर्दनम् । २. कामसूत्र ७।१।१-४८ तथा ४६ देखें : आयुर्वेदाच्च, वेदाच्च, विद्यातन्त्रेभ्य एव च । आप्तेभ्यश्चावबोद्धव्या योगा ये प्रीतिकारकाः ।। ४६ ३. सारवा = सनादा, अत एवानुकृतसारसपक्षिशब्दा काञ्ची यस्याः, सा ।