भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 80

३।४७] दुष्कर यमक ५७ ६. रवेण भौमो ध्वजवर्तिवीरवे रवेजि संयत्यतुलास्त्रगौरवे । रवेरिवोग्रस्य पुरो हरेरवेरवेत तुल्यं रिपुमस्य भैरवे ॥ ४७ ॥ ६. अनुपम (दिव्य) अस्त्रोंके गौरव वाले भीषण सङ्ग्राममें कृष्णके ध्वजमें विद्यमान वीर पक्षी (गरुड) के रवके द्वारा भूमिपुत्र (नरकासुर) भयाक्रान्त कर दिया गया। सूर्यके समान उग्र (प्रचण्ड, तेजस्वी) इस (कृष्ण) के सामने शत्रुको सिंहके सामने मेषके समान समझो ॥ ४७ ॥ आवृत्तियोंसे विलक्षण प्रकारकी आवृत्तिसे प्रथम-तृतीयपादान्तवर्ती व्यपेत यमक भी निष्पन्न होता है। पूर्वपादके अन्तमें और अगले पादके आदिमें प्रथम और द्वितीय तथा तृतीय और चतुर्थ पादोंमें द्विपादान्तादि अव्यपेत यमक भी है। इसकी दुष्करता तो स्वतः स्पष्ट है। यह तथा अगले तीन श्लोक वंशस्थमें निबद्ध हैं ॥ ४६ ॥ ६. (३. घ. ५) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादाद्यन्त सजातीय यमक—इस श्लोकमें कविने कृष्णके ध्वजमें विद्यमान गरुडकी ध्वनि सुनकर भौमासुरके भयका वर्णन किया है।² विष्णु 'गरुडध्वज' के रूपमें प्रसिद्ध हैं। अतः कृष्णको भी 'गरुडध्वज' कहा जाता है। विष्णुके पर्याय कृष्णका भी अभिधान करते हैं। 'हरि' यहाँ 'कृष्ण' और 'सिंह' अर्थोंमें है, अतः श्लेष है। कृष्णको रविके समान उग्र (प्रचण्ड) बतानेसे उपमा है। रिपुकी समानता 'अवि' (मेष) से बताई है। इसलिये भी उपमा है। जिसके ध्वजमें विद्यमान पक्षीके रवसे भौम जैसेकी हालत पतली हो गई है, उस कृष्णकी शत्रुभयङ्करताका तो कहना ही क्या है ! यहाँ सजातीय वर्णसमुदाय 'रवे' की आवृत्ति चारों पादोंके आदिमें और अन्तमें व्यपेत रूपसे तथा पूर्व पादके अन्त और अगले पादके आदिमें अव्यपेत रूपसे हुई है। इस द्विपाद अन्तादि यमकके वैचित्र्यके कारण यह यमक और हृदयग्राही बन गया है। अवेजि—√विज् + णिच् से करण रवके कर्तृत्वकी विवक्षामें वेजन क्रियाके कर्म भौमके निमित्तसे लुङ्, प्र० ए० व०। यह धातु भय और चलन १. अन्वयः—अतुलास्त्रगौरवे भैरवे संयति भौमो हरेः ध्वज-वर्ति-वीर-वेः रवेण अवेजि। रवेरिवोग्रस्य अस्य पुरो रिपुं हरेः पुरः अवेः तुल्यम् अवेत। २. भूमिपुत्र नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका स्वामी था। गरुडवाहन श्रीकृष्ण द्वारा इसके वधके वर्णनके लिये हरिवंशपुराण २।६३ तथा श्रीमद्भागवत पुराण १०।५६ देखें।