काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
३।४७] दुष्कर यमक ५७ ६. रवेण भौमो ध्वजवर्तिवीरवे रवेजि संयत्यतुलास्त्रगौरवे । रवेरिवोग्रस्य पुरो हरेरवेरवेत तुल्यं रिपुमस्य भैरवे ॥ ४७ ॥ ६. अनुपम (दिव्य) अस्त्रोंके गौरव वाले भीषण सङ्ग्राममें कृष्णके ध्वजमें विद्यमान वीर पक्षी (गरुड) के रवके द्वारा भूमिपुत्र (नरकासुर) भयाक्रान्त कर दिया गया। सूर्यके समान उग्र (प्रचण्ड, तेजस्वी) इस (कृष्ण) के सामने शत्रुको सिंहके सामने मेषके समान समझो ॥ ४७ ॥ आवृत्तियोंसे विलक्षण प्रकारकी आवृत्तिसे प्रथम-तृतीयपादान्तवर्ती व्यपेत यमक भी निष्पन्न होता है। पूर्वपादके अन्तमें और अगले पादके आदिमें प्रथम और द्वितीय तथा तृतीय और चतुर्थ पादोंमें द्विपादान्तादि अव्यपेत यमक भी है। इसकी दुष्करता तो स्वतः स्पष्ट है। यह तथा अगले तीन श्लोक वंशस्थमें निबद्ध हैं ॥ ४६ ॥ ६. (३. घ. ५) अव्यपेत-व्यपेत चतुष्पादाद्यन्त सजातीय यमक—इस श्लोकमें कविने कृष्णके ध्वजमें विद्यमान गरुडकी ध्वनि सुनकर भौमासुरके भयका वर्णन किया है।² विष्णु 'गरुडध्वज' के रूपमें प्रसिद्ध हैं। अतः कृष्णको भी 'गरुडध्वज' कहा जाता है। विष्णुके पर्याय कृष्णका भी अभिधान करते हैं। 'हरि' यहाँ 'कृष्ण' और 'सिंह' अर्थोंमें है, अतः श्लेष है। कृष्णको रविके समान उग्र (प्रचण्ड) बतानेसे उपमा है। रिपुकी समानता 'अवि' (मेष) से बताई है। इसलिये भी उपमा है। जिसके ध्वजमें विद्यमान पक्षीके रवसे भौम जैसेकी हालत पतली हो गई है, उस कृष्णकी शत्रुभयङ्करताका तो कहना ही क्या है ! यहाँ सजातीय वर्णसमुदाय 'रवे' की आवृत्ति चारों पादोंके आदिमें और अन्तमें व्यपेत रूपसे तथा पूर्व पादके अन्त और अगले पादके आदिमें अव्यपेत रूपसे हुई है। इस द्विपाद अन्तादि यमकके वैचित्र्यके कारण यह यमक और हृदयग्राही बन गया है। अवेजि—√विज् + णिच् से करण रवके कर्तृत्वकी विवक्षामें वेजन क्रियाके कर्म भौमके निमित्तसे लुङ्, प्र० ए० व०। यह धातु भय और चलन १. अन्वयः—अतुलास्त्रगौरवे भैरवे संयति भौमो हरेः ध्वज-वर्ति-वीर-वेः रवेण अवेजि। रवेरिवोग्रस्य अस्य पुरो रिपुं हरेः पुरः अवेः तुल्यम् अवेत। २. भूमिपुत्र नरकासुर प्राग्ज्योतिषपुरका स्वामी था। गरुडवाहन श्रीकृष्ण द्वारा इसके वधके वर्णनके लिये हरिवंशपुराण २।६३ तथा श्रीमद्भागवत पुराण १०।५६ देखें।
५८ काव्यादर्श [३।४८ १०. मयामयालम्ब्ध'-कलामयाम-यामयामयातव्यविरामयामया । मयामयार्तिं निशयाम, यामयामयामसूं करुणामयामया२ ॥ ४८ ॥ १०. मानरहित (अत्यन्त दीर्घ) यामों (प्रहरों) वाली, नियन्त्रित करने वाली निशासे मरणान्तक आमय (प्रेमरोग) की पीडाको प्राप्त हुआ हूँ । हे जाने योग्य स्थानोंमें विराम (निषेध) से रहित, करुणामय (मेरे मित्र), आमय (रोग) को प्राप्त मुझसे क्षय और उसके विपरीत (वृद्धि) के द्वारा आलम्बन किये जाने वाले कलानिधि (चन्द्र) से आमय (कष्ट) पाने वाली उस (प्रिया) को मिला दे ॥ ४८ ॥ अर्थोंमें तुदादि और रुधादि गणोंमें है ।४ अवेत — अव + √ इ (गतौ) कर्तरि लोट्, परस्मैपद, मध्यम, बहु० वचन । हरेः पुरः — पुरस्, पुरतस् आदि 'अतस्' प्रत्ययार्थक प्रत्ययोंसे निष्पन्न शब्दोंके योगमें (युक्त शब्दमें) षष्ठी होती है । अवेः तुल्यम् — तुल्यार्थक पदोंके योगमें उपमानमें तृतीया या षष्ठीका विकल्प है ।५ अतः 'हरेः' में षष्ठी है ॥ ४७ ॥ १०. (३. घ.) पादाद्यन्त तथा अन्तादि चतुष्पाद अव्यपेत-व्यपेत सजातीय यमक — अत्यन्त दुष्कर इस रचनामें कविने क्या कहना चाहा है, यह निश्चित रूपसे तो वही जानते हैं । व्याख्याताओंने अपने-अपने अभिप्रायसे व्याकरणकी लाठीसे इसे हाँककर जो चाहा है, वह कहलाया है । ऊपर किया अनुवाद भी इसी दिशामें एक कदम है : न मा-मानं येषां ते अमाः इयत्ता-रहिताः, तादृशाः यामाः प्रहरा यस्याः, तया अम-यामया; यमनं यामः, सोऽस्त्यस्या इति यामा, तया यामया, निशया रात्र्या; मिनोति हिनस्ति इति मयः मरणकारीति यावत्, स चासौ आमयो रोगः प्रेमाधिरूपो मयामग्रः, तस्य अर्तिः पीडा, तां मयामयार्तिम् प्राणान्तकारिप्रेमरोगपीडामित्यर्थः; अयाम् प्रयातोऽहम् । अस्यां १. तरुण० : लङ्घ्य । वादीजीने 'लङ्घ्य', 'लम्ब्य' में विकल्प बताया है । रत्नश्रीमें 'लम्ब्य' ही धृत और व्याख्यात है । २. वादीटीकामें 'मयाम्' व्याख्यात है । ३. अन्वयः — अम-यामया यामया निशया मयामयार्तिम् अयाम् । अ-यातव्य- विराम, करुणामय, आम-या मया मयामयालम्ब्य-कला-मया-मयाम् अमूम् आमय । ४. ओविजी भयचलनयोः (तुदादि ६, रुधादि २०) । ५. अष्टाध्यायी २।३।३० : षष्ठ्यतसर्थप्रत्ययेन । ७२ : तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतरस्याम् ।
३।४६] दुष्कर यमक ५६ ११. मतान्धुनानाऽरमतामकामतामताप-लब्धाग्रिमतानुलोमता । मतावयत्युत्तमता-विलोमतामताम्यतस्ते समता, न वामता१ ॥ ४६ ॥ ११. पूर्णतः आनन्दमग्न, अथवा रमते राम विरक्त पुरुषोंको प्रिय, निष्का- मताको पीछे छोड़ती हुई, उत्तमता (श्रेष्ठता) की विपरीतता अर्थात् श्रेष्ठत्व- विघातक वामताको नहीं प्राप्त करने वाली, अथवा नष्ट करने वाली, बिना क्लेशके प्राप्त श्रेष्ठताके अनुकूल स्वभाव वाली समता (सर्वत्र समभाव वाली दृष्टि) श्रेष्ठताके प्रतिकूल भावकी कामना नहीं करते हुए, अथवा ग्लानि-हर्ष आदि भावोंसे रहित, अथवा सांसारिक दुःखोंसे दुःखी न होते हुए तुम्हारी बुद्धिमें गतिशील है, वर्तमान है । वामता नहीं ।। ४६ ।। रजन्यां प्रियाविरहज्वालावलीढस्य मे प्राणा अवश्यं संशयमापन्ना इत्यर्थः । यातव्ये = प्रियां प्रति मच्छासन्देशार्थं गन्तव्ये कर्मणि विरामोऽवसानं 'न' इति निषेधो यस्य न, सोऽयातव्यविरामः तस्य सम्बुद्धौ अयातव्यविराम अवश्य- ङ्गामिन् हे मयि करुणामय मे सखे, 'अम रोगे' (चुरादिः), अमनम् आमो रुजा, तं यातीति आम-याः, तेन आम-या; मया तव सख्याऽनेन जनेन; मयः क्षयः, अमयो वृद्धिः, ताभ्याम् आलम्ब्यः आश्रयितव्यश्चासौ कलामयश्चन्द्रः आमयो रुजाकरो यस्याः सा मयामयालम्व्य-कलामयामया ताम् अमूम् मम प्रेयसीम् मद्विरहे समुद्दीपितकन्दर्पकष्टाम्, आमय गमय, सम्भजय । अम गत्या- दिषु (भ्वादिः), हेतुमण्णिच्, कर्तरि लोट्, मध्यम, ए० व० । यहाँ कविने सजातीय 'मया' वर्णसमुदायकी आवृत्ति समूचे श्लोकमें नियत स्थानपर कुल मिलाकर १६ बार की है । पादके आदि और अन्तमें अव्यवहित और व्यवहित रूपसे होनेके कारण यहाँ अव्यपेत-व्यपेतात्मक आद्यन्त चतुष्पाद यमक है । 'मयामया' सजातीय वर्णसमुदायकी आवृत्ति पादान्त और पादादिमें निरन्तर होनेसे चतुष्पाद अव्यपेत अन्तादि यमक भी है । तृतीय पादके अन्तमें 'याम'की अनुलोम और प्रतिलोम आवृत्ति भी है । इस प्रकार यह श्लोक विविध दृष्टियोंसे दुष्कर यमकोंसे सङ्कीर्ण है ।। ४८ ।। ११. (३. घ.) व्यपेत चतुष्पादादि-मध्यान्त तथा अव्यपेत चतुष्पादान्तादि सजातीय सङ्कीर्ण यमक—इस श्लोकमें कविने किसी पुरुषमें योगियोंसे भी १. अन्वयः— आ-रमतां मताम् अकामतां धुनाना, उत्तमता-विलोमतां धुनाना, अताप-लब्धाग्रिमताऽनुलोमता समता अताम्यतः—(क) अग्ला- यतः, (ख उत्तमताविलोमताम्) अकाङ्क्षतो वा—ते मतौ अयति । (आ- रमतां मताम् अकामतां धुनाना) वामता न (अयति) ।
६० काव्यादर्श [३।४६ अधिक सर्वत्रसमभाव दृष्टि बताई है । यहाँ ‘अताम्यतः’ पद ‘काङ्क्षा’ और ‘ग्लानि’ अर्थ वाली √तम्'से' शतृ, नञ् तत्पुरुषसे पुं०, षष्ठी ए०व०में निष्पन्न है । अतः इसका सम्बन्ध 'उत्तमता-विलोमताम्' से केवल 'काङ्क्षा' अर्थमें होगा । 'ग्लानि' अकर्मक क्रिया है । अतः इस अर्थमें यह स्वतन्त्र ही रहेगा । ग्लान्यर्थक यह पद समतासे अपेक्षित प्रतिद्वन्द्वी 'हर्ष' का भी उपलक्षक है । 'अताम्यतः' की ग्लान्यर्थतामें द्वितीयान्त पदका सम्बन्ध या तो निकटस्थ 'अ- यती' (अगच्छन्ती) से होगा, या 'धुनाना' से । यह अन्तर्हितण्यर्थक 'कम्पन' अर्थमें क्र्यादि गणमें पठित है : धूञ् कम्पने । इससे कर्तरि शानच्, स्त्री० प्रथमा ए० व० में 'धुनाना' निष्पन्न है । अयति—√इ (भ्वा०२) कर्तरि लट्, प्रथम ए० व० । यहाँ सजातीय वर्णसमुदाय 'मता' चारों पादोंके आदि, मध्य और अन्त में नियताक्षर सङ्ख्याके बाद आवृत्त है । अतः सजातीय चतुष्पादाद्यन्त व्यपेत त्रिस्थान यमक है । पादान्तमें पठित सजातीय 'मता' वर्णसमुदायकी आवृत्ति अगले पादके आदिमें बिना व्यवधानके होनेसे यहाँ सजातीय चतुष्पादान्तादि द्विस्थान यमक है । ये दोनों परस्पर सङ्कीर्ण हैं । सभी प्राचीन टीकाकारोंने यहाँ व्यपेत यमक माना है । पर अव्यपेत आवृत्तिका अपलाप करना अशक्य है । भोजराजने इस विशेषताको अन्य भेद व्यपेतका उच्छेद न करते हुए सूक्ष्म अव्यपेत भेद बताया है ।३ आचार्य दण्डीने भी ५१ वें श्लोकमें इन वैचित्र्य-प्रकारोंको 'उक्तान्तर्गत सन्दष्टयमक' कहा है । अतः ये विशेष उपेक्षणीय नहीं हैं । रत्नेश्वर मिश्रने इस श्लोकमें वृत्तका औचित्य बहुत महत्त्वपूर्ण बताया है४ ॥ ४६ ॥ १. आख्यातचन्द्रिका ३।३।१७४ : अथ ग्लानौ च ताम्यति ।। ११७ ।। काङ्क्षायामपि । २. सिद्धान्तकौमुदी, भ्वादि ६।२६-३१ : इट किट कटी गतौ ।...केचित्तु... अन्ते च '√इ + √ई' इति प्रश्लिष्य 'अयति, इयाय, इयतुः....' इत्या- युदाहरन्ति । भवतोषिणी, पृष्ठ ३३३ देखें । ३. सरस्वतीकण्ठाभरण २।१२६ (उदाहरण) : अन्यभेदानुच्छेदेन सूक्ष्मं यथा—'मतां धुनाना...न वामता ।।' अत्र 'व्यपेतानुच्छेदेनैव पादसन्धि- ष्वव्यपेतमुत्पद्यते' इत्यस्थान-यमकमिदं सूक्ष्मावृत्तेः 'सन्धिसूक्ष्माव्यपेतम्' उच्यते । ४. रत्नदर्पण २।१२६ : अत्रापि वृत्तौचिती सर्वस्वायते ।
३।५०] दुष्कर यमक ६१ १२. कालकालगलकालकालमुखकालकाल- कालकालपन कालकालघनकालकाल । कालकालसितकालका ललनिकालकाल- कालका लगतु कालकालकलिकालकाल² ।। ५० ।। १२. काले (नाग) के काल (परम शत्रु), गलेमें काल चिह्नसे युक्त (नीलकण्ठ), काल (वर्ष) के मुख (वर्षा) कालमें बोलने वाले, काली (शिखा) सिरपर धारण करने वाले (शिखी) मयूरोंके बोलनेके काल (वर्षा ऋतु) में काले मेघों वाला काल (वर्षा ऋतु) जिसके लिए मौत जैसा है, इस प्रकारके (तथा) कालोंमें काल (सब समयोंमें श्रेष्ठ ऋतुराज), कलियाँ और उनपर मँडराते भ्रमरोंका समूह जिसके लिये काल (अत्यन्त कष्टदायी) है, इस प्रकारके हे मित्र, कालक (लहसुनिया या तिलचिह्न) से सुशोभित मुखसे भूषित लाडली विलासिनी आ लगे (तुमसे संयुक्त हो) ।। ५० ।। १२. (३. घ.) आदि-मध्यान्तवर्ती चतुष्पाद अव्यपेत-व्यपेत सजातीय त्रिस्थानयमक—इस श्लोकमें कविने ख, घ, प, म, स का एकेक बार त, ग का दो बार और न का तीन बार प्रयोग करके शेष वर्णविन्यासमें क और ल वर्णोंका प्रयोग किया है। ये वर्ण भी प्रथम और तृतीय पादोंमें एकेक बार 'ल' को और चतुर्थ पादमें 'कलि' को छोड़कर समूचे श्लोकमें २४ बार 'काल' वर्णसमुदायके रूपमें अव्यवहित और नियत (दो-दो) वर्णोंके व्यवधान में आवृत्त हुए हैं। स्वर भी 'अ', 'आ', 'इ' और 'उ' ही आये हैं। इस प्रकार यह यमक अत्यन्त दुष्कर है। वामनोक्त अत्यधिक आवृत्तिके कारण दूषित यमकके उदाहरणके रूपमें त्रिपुरहर भूपालने यह श्लोक उचित ही उद्धृत किया है।³ १. रत्नश्री आदि तीनों टीकाओंमें यही पाठ धृत एवं व्याख्यात है। काम- धेनु ४।१।७ में उद्धृत इस श्लोकमें 'पन'की जगह 'घ' एवम् आगे 'घन'की जगह 'पन' पाठ है। २. अन्वयः—कालकाल-गलकाल-कालमुखकालकाल-कालकालपन-काल-काल घनकाल-काल, कालकाल-कलिकाऽऽल-काल, कालकालसित-कालका, आल-कालकालका ललनिकाऽऽलगतु । ३. आरूढं भूयसा यत्तु पदं यमकभूमिकाम् । दुष्येच्चेन्न, न पुनस्तस्य युक्ताऽनुप्रासकल्पना ।। काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति ४।१।७ में छठे श्लोकपर कामधेनु : यथा दण्डिनोक्तम्—'कालकाल...कलिकालकाल ।।' इति
६२ काव्यादर्श [३।५०] इतिहासविदोंके मतमें इस श्लोकमें आवृत्त कालकाल शब्द काव्यादर्श (२।२७७) में राजवर्मणः से सूचित राजसिंह, राजसुन्दरवर्मा और अत्यन्तक विरुदोंसे प्रसिद्ध काञ्चीपति पल्लवनरेश नरसिंहवर्मा द्वितीय (राज्यकाल ७००-७२८ ई०) का ही एक विरुद है।¹ दण्डीने अवन्तिसुन्दरी कथा में भी कालकालका यमक दिया है।² इस दृष्टिसे चतुर्थ पादके अन्तमें पठित कालकाल नरसिंहवर्माका विरुदसे सम्बोधन हो सकता है। कलिकालकाल पद 'कलि (युद्ध) में काल (स्वयं मृत्युका अथवा कालसदृश पराक्रमी शत्रु) का भी काल' अर्थमें विशेषण सम्बोधन हो सकता है। ललनिकासे ललनासे भी अधिक लाडली विजयश्री अभिप्रेत हो सकती है। वह वर्षाकालमें युद्ध न हो पानेके कारण राजाको न पानेसे दुःखी है। उसके बाद शीतकालमें प्रयाण अभियानके चलते भी विर- हिणी ही है। वसन्तके आते-आते कालकाल द्वारा शत्रुविनाश किये जानेपर विजयश्रीरूपी ललनिका (अत्यन्त चहेती ललना) आ लगे, तुम्हारे पास चली आए। इस प्रकार कवि द्वारा आशीः प्रकट की गई है। प्रायः सभी टीकाकारोंने इसकी व्याख्या विविध प्रकारसे की हैं। हमने भी उनमें एक और जोड़ दी है। तत्त्वं त्वस्य कविर्वेत्ति, कल्पनोल्लासिनो वयम्। युक्ताऽर्थाऽक्लिष्टकल्पा च व्याख्या सद्भिः प्रगृह्यताम् ॥ १ ॥ नेयत्ता कविभावानां, दारिद्र्यं तद्बुधेषु न। विविधैर्विविधं तस्मात् काव्यभिप्राय उच्यते ॥ २ ॥ ६५५३६ भेदों³ वाली षोडशाक्षर अष्टि वृत्तजातिके र, न, र, न, र गण और लघु अक्षरविन्यास वाले किसी छन्दका प्रयोग कविने इस श्लोकमें किया है। यति ६, ६, ४ पर अभीष्ट लगती है ॥ ५० ॥ १. डॉ० धर्मेन्द्रकुमार गुप्त काव्यादर्शः, भूमिका, पृष्ठ ३६; श्री नीलकण्ठ शास्त्री, ए हिस्ट्री आफ साउथ इण्डिया, पृष्ठ ४६० ! प्रसादिनी २।२७७; पृष्ठ २३७ भी देखें। २. पृष्ठ १११, पंक्ति २१ : प्रवृत्तकालकालरात्रिभुजलतायमानया...। ३. पञ्चषष्टिसहस्राणि, सहस्रार्धं च सङ्ख्यया ।। नाट्य० १४।६७, षट्त्रिंशच्चैव वृत्तानामष्टौ निगदितानि च । ६८
३५१] यमकके अन्य विशिष्ट भेद ६३ १. सन्दष्ट-यमक-स्थानमन्तादी पादयोर्द्वयोः । उक्तान्तर्गतमप्येतत् स्वातन्त्र्येणात्र कीर्त्यते ।। ५१ ।। (१) दो पादोंमें अन्त और आदि स्थान 'सन्दष्टयमक' का स्थान होता है। यह यद्यपि उक्त उदाहरणोंमें आ चुका है, तथापि यह स्वतन्त्रतासे बताया जा रहा है ।। ५१ ।। यमकके अन्य विशिष्ट भेद—(१) सन्दष्ट यमक : आदिमध्यादि सात स्थानोंके आधारपर अव्यपेत आदि त्रिविध यमकका प्रदर्शन ४२ उदाहरणोंमें करनेके बाद आचार्यने यमककी स्थानगत अन्य विच्छित्तियोंका निरूपण अगले प्रकरणमें किया है। भरतने इस प्रकारकी विच्छित्तियोंको उनके द्वारा लोकमें उपलब्ध आकारविशेष धारण कर लिये जानेके कारण उन आकारों वाले नाम दिये हैं : काञ्ची, समुद्ग, विक्रान्त, चक्रवाल, सन्दष्ट एवम् माला यमक ।¹ भरतका जो चक्रवाल यमक है, उसे ही दण्डीने सन्दष्ट यमक नामसे दिया है। यह संज्ञा 'सम् + √दंश् + क्त' से 'सन्धान' अर्थमें निष्पन्न अभीष्ट है : जहाँ एक पादका अन्त दूसरे पादके आदिसे आवृत्तिके द्वारा जुड़ा हो, वह 'संदंश' यमक होता है। इस प्रकार आवृत्ति अव्यवधानमें ही सम्भव है। यमकका यह स्वरूप भरतके 'चक्रवाल' यमकमें मिलता है।² भरतका 'सन्दष्ट'का स्वरूप स्पष्ट नहीं है : आदिमें दो पाद जहाँ अक्षरोंसे समान हों, वह सन्दष्ट बताया है ।³ परन्तु उदाहरणमें चारोंपादोंके आदिमें दो-दो पद समान हैं एवं द्वितीय पादके आदिके दो पदोंको छोड़कर शेष भागकी आवृत्ति चतुर्थ पादमें १. पादान्तयमकं चैव, काञ्चीयमकमेव च । समुद्गयमकं चैव विक्रान्तयमकं तथा ।। नाट्यशास्त्र १६।६३ यमकं चक्रवालं च, सन्दष्टयमकं तथा । पादादि-यमकं चैव, आम्रेडितमथापि च ।। ६४ चतुर्व्यवसितं चैव, मालायमकमेव च । एतद्दशविधं ज्ञेयं यमकं नाटकाश्रयम् ।। ६५ ।। २. पूर्वस्यान्तेन पादस्य परस्यादिर्यदा समः । चक्रवच् 'चक्रवालं' तद् विज्ञेयं नामतो, यथा ।। नाट्य० १६।७४ शैला यथा शत्रुभिराहता हता, हताश्च भूयोऽप्यनुपुङ्खगैः खगैः । खगैश्च सर्वेर्युधि संचिताश्चिताश्चिताधिरूढा निहताः फलैः फलैः ।। ७५ ३. आदौ द्वौ यत्र पादौ तु भवेतामक्षरैः समौ । 'सन्दष्टयमकं' नाम विज्ञेयं तद् बुधैर्यथा ।। नाट्यशास्त्र १६।७६
६४ काव्यादर्श [३।५१ हुई है ।' यदि यही सन्दष्ट यमक है, तो पादादियमक' क्या होगा ? तब इसमें अन्तर केवल चारों पादोंमें विजातीय (सन्दष्ट) और सजातीय (पादादि) शब्दाभ्यासका होगा, जो अवान्तर भेद है : यह मुख्य भेदका निमित्त नहीं हो सकता । अतः अन्तादि नियत स्थानमें अव्यपेत आवृत्तिके इस भेदको दण्डीने सँडसीके समान दोनों पादोंको पकड़नेके कारण 'सन्दंश' नाम दिया है । रुद्रट ने 'संदंश' और 'सन्दष्टक'को परस्पर भिन्न माना है : प्रथम पाद और तृतीय पादके आदिमें समान वर्ण होनेपर 'संदंश' है एवं द्वितीय पादकी आवृत्ति चौथे पादमें होनेपर 'सन्दष्टक' यमक होता है । रुद्रटकी सन्दष्टक की अवधारणा भरतपर आधारित है। उन्होंने भरतके निरूपणके अन्य भेदोंसे साङ्कर्यका परिहार करके उनके उदाहरणके द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें शब्दाभ्यासके आधारपर अपना सन्दष्टक यमक बनाया । रुद्रटके (क) सन्दंश और (ख) सन्दष्टकमें आवृत्तिकी (क) प्रथम-तृतीयपादवर्तिता और (ख) द्वितीय-चतुर्थपादवर्तिता, अर्थात् (क) विषमपादवर्तिता और (ख) समपाद- वर्तिताके अतिरिक्त कोई अन्तर नहीं है । सँडसीके (क) पुच्छभागमें आवृत्ति होनेसे 'संदंश' और (ख) मुखभागमें आवृत्ति होनेसे सन्दष्टक' भेद रुद्रटने माना है । (ग) मध्यभाग - द्वितीय तृतीय पादों में आवृत्तिसे रुद्रटने 'गर्भ- यमक' माना है ।३ दण्डिप्रोक्त सन्दष्ट यमक पीछे ४६-५० श्लोकोंमें अव्यपेत-व्यपेत यमकके विभिन्न भेदोंमें नाना रूपोंमें आ चुका है। तद् यथा - ४६वें श्लोकके रत्नश्री- १. पश्य-पश्य रमणस्य मे गुणान् येन-येन वशगां करोति माम् । येन-येन दिनमेति दर्शनं, तेन-तेन वशगां करोति माम् ।। नाट्य० १६।७७ २. आदौ पादस्य यत्र स्यात् समावेशः समाक्षरः । 'पादादि-यमकं' नाम तद् विज्ञेयं बुधैर्यथा ।। नाट्य० १६।७८ विष्णुः सृजति भूतानि, विष्णुः संहरते प्रजाः । विष्णुप्रसूतं त्रैलोक्यं, विष्णुर्लोकादिदैवतम् ॥ ७६ ३. (क) सन्नारीभरणोमायमाराध्य विधुशेखरम् । सन्नारीभरणोमायस्ततस्त्वं पृथिवीं जय ।। काव्याल० ३।५६ : (ख) इदं च येन स्वयमात्मभोग्यतां समस्तकाञ्चीकमनीयताकुलम् । नितम्बबिम्बं कथमस्तु नो नृणां स समस्तकाञ्चीकमनीयताकुलम् ।। (ग) यो राज्यमासाद्य भवत्यचिन्तः समुद्रतारम्भरतः सदैव । समुद्रतारं भरतः स दैव प्रमाणमारभ्य पयस्युदास्ते ॥ ८
३।५२] १. यमकके विशिष्ट भेद : (१) सन्दष्ट ६५ उपोढरागाऽप्यबला मदेन सा मदेनसा मन्युरसेन योजिता । न योजिताऽऽत्मानमनङ्गतापिताऽङ्गतापि तापाय ममास नेयते ॥५२॥ (यौवनके अथवा मदिराके) मदके कारण बढ़े हुए प्रेमभाव वाली भी वह अबला मेरे अपराधके द्वारा क्रोधके रससे युक्त कर दी गई है । कामदेव के द्वारा तपाये हुए अङ्गोंसे युक्तता वाली होते हुए भी वह अपने आपको (मुझसे) युक्त नहीं कर रही (मानके कारण मुझसे दूर-दूर रह रही) है । मुझे परे करने वाली (रूठी हुई वह प्रिया) मुझे इतना कष्ट देने वाली हो गई है ॥ ५२ ॥ सम्मत पाठमें प्रथम-द्वितीय, तृतीय-चतुर्थ पादोंके बहुवर्णवृत्तिसे सन्धानके रूपमें है । ४७वेंमें चारों पादोंके द्विवर्णवृत्तिसे सन्धानके रूपमें है । ४८वें श्लोकमें चारों पादोंके बहुवर्णवृत्तिसे सन्धानके कारण सन्दष्ट यमक है । ४६वें में आदि-मध्यान्त व्यपेत यमकके साथ चतुष्पादान्तादिके द्विवर्णवृत्तिसे सन्धानके कारण है, तो ५०वेंमें इसी प्रकारके यमकके बहुवर्णवृत्तिसे सन्धानके कारण अव्यपेत सन्दष्ट यमक है । महाराज भोजने दण्डीके इस प्रकारके यमकोंके आधारपर अन्य भेदोंके अनुच्छेद और उच्छेदसे सूक्ष्म, स्थूल भेदोंकी कल्पना की है¹ ॥ ५१ ॥ उदाहरण — ५२वें श्लोकमें प्रदत्त सन्दष्ट यमकके इस उदाहरणमें आचार्यने अन्य स्त्रीके सम्भोगचिह्न आदिसे युक्त होनेके कारण नायिकाके प्रति अपराधी किसी नायककी मानवती नायिकाके मानके कारण होने वाले कष्टका वर्णन किया है । मन्यु-रसेन—मन्यु (क्रोध) रौद्ररस नहीं है, उसका स्थायी भाव है । तथापि शृङ्गाराङ्ग क्रोध अन्य क्रोधोंसे भिन्न है । वह नायकको प्रियाकी अन्य ही शोभाका दर्शक होनेके कारण आनन्ददायी है । इसलिये इसका रसत्व औपचारिक है ।² नायिकाके मानके कारण नायकके तापका आधिक्य प्रेमकी अधिकता सूचित करनेके कारण मन्युकी रसताका पोषक है । १. सरस्वतीकण्ठाभरण २।१२६-१३१ देखें । २. वादी जी ने इसे भिन्न प्रकारसे कहा है : यद्यपि क्रोधो रौद्ररसस्य स्थायिभावो, न रसः, तथाऽप्यभेदोपचारात् कार्यकारणयोः कथञ्चि- देकत्वपरिणामात् क्रोधोऽपि रस एवेति मन्युरसस्य क्रोधव्याख्याने न दोषः ।
६६ काव्यादर्श [३।५३ २. अर्धाभ्यासः समुद्गः स्यादस्य भेदास्त्रयो मताः । ३. पादाभ्यासोऽप्यनेकात्मा; व्यज्यते स निदर्शनैः ॥ ५३ ॥ (२) आधेकी आवृत्ति समुद्ग होता है । इसके तीन भेद माने गये हैं । (३) पादकी आवृत्ति भी अनेक प्रकारकी होती है । उसे उदाहरणोंसे व्यक्त किया जा रहा है ॥ ५३ ॥ प्रथम ‘योजिता’ पद √युज् + णिच् + क्त (कर्मणि) से है तथा द्वितीय ‘योजिता’ √युज् + णिच् से आदिकर्ममें कर्तृवाच्यमें क्तसे है : योजितवती ।¹ ममासनेयतेका पदच्छेद टीकाकारोंने मम आस न इयते (अथवा नेयते) किया है । आस को अस् भुवि (अदादि) से कर्तरि लिट्, प्रथम, ए० व० में व्युत्पादित किया है । इसमें दो दोष हैं : (१) सामान्य भूतार्थक ‘क्त’ के प्रकरणमें तदुत्तरवर्ती क्रियाको परोक्ष भूतकालमें रखना कालैकवाक्यताकी दृष्टिसे अनुचित है । (२) आदादिक √अस् + लिट्में (क) वेदमें या (ख) अनुप्रयोगमें ही प्रयुक्त होती है । (ग) अन्यत्र लोक में √अस् के स्थानमें √भू का ही प्रयोग शिष्टसम्मत है । दण्डी जैसे सावधान और समर्थ आचार्यसे शिष्टविरुद्ध एवं एकवाक्यताविरुद्ध प्रयोगकी अपेक्षा नहीं की जा सकती । अतः √असु क्षेपणे (दिवादि) से कर्त्रर्थमें ‘ल्यु’ प्रत्ययसे स्त्री०में ‘असना = क्षेपणी’, दूर हटाने वाली, व्याख्या निर्दोष एवं प्रसङ्गानुकूल है । चतुर्थ पादमें इसके पूर्व ‘अपि’ भी इसी व्याख्यामें अनुकूल है । अन्यथा ‘अनङ्गतापिताङ्गता होते हुए भी मुझे इतना ताप नहीं देती’, यह विपरीत अर्थ निकलता है । यदि ‘नेयते = न इयते = अनियते = अपरिमिताय’ अर्थ भी कर लें, तब भी ‘अपि’ से क्या वैपरीत्य अभीष्ट है ? यहाँ प्रथमपादान्तगत ‘मदेन सा’ द्वितीयपादान्तगत ‘न योजिता’ तृतीय- पादान्तवर्ती ‘ङ्गतापिता’ बहुवर्णसमुदाय निरन्तर अगले पादमें आवृत्त होकर दो पादोंको जैसे सँडसीसे पकड़ लेते हैं; उन्हें जोड़ देते हैं । इसके अतिरिक्त प्रकारका कोई यमक यहाँ नहीं हैं । इसलिये यह शुद्ध चतुष्पाद अव्यपेत सन्दष्ट यमक का उदाहरण है । ‘तापितापाय’ में मृदुवर्णोंकी आवृत्तिसे विप्रलम्भ रतिके अनुकूल अनुप्रास यहाँ माधुर्योत्पादक है । छन्द वंशस्थ है ॥ ५२ ॥ (२) समुद्ग यमक—‘समुद्ग’ शब्द ‘सम्पुटक’ (दौने) का पर्याय है । इस सजावटी यमककी परिकल्पना भरतने इस प्रकार की है : जो वृत्त १. वादितीका : ‘न योजिता’ इत्यादि कर्तरि क्तः । अष्टा० ३।४।७१ : आदिकर्मणि क्तः कर्तरि च ।
३।५४] १. यमकके विशिष्ट भेद : (२) समुद्ग ६७ २. १ ना स्थेयस्सत्त्वया वर्ज्यः परमायतमानया । नास्थेयस्स त्वयाऽऽवर्ज्यः परमायतमानया १ ।। ५४ ।। (२.१) अत्यधिक कठोरहृदया (हठीले स्वभाव वाली), अत्यधिक दीर्घ मान (रुठने) वाली तेरे द्वारा विश्वास करने योग्य वह पुरुष ठुकराये जाने योग्य नहीं है (उसे ठुकराना नहीं) । (अपि तु) खूब प्रयत्न करती हुई (तेरे) द्वारा आकृष्ट किये जाने योग्य है ।। ५४ ।। (छन्दोबद्ध रचना, श्लोक) सारा ही एक अर्धालीसे समाप्त किया जाता है, वह 'समुद्ग यमक' कहलाता है। २ भरतने इसके भेद नहीं बताये हैं। दण्डीने समुद्ग यमकका लक्षण तो भरतोक्त लिया है, किन्तु भेद अपनी तरफसे तीन बताये हैं। सन्दष्ट यमक, जैसा कि हम देख चुके हैं, दण्डीको अव्यपेत रूपमें ही अभीष्ट हैं। रुद्रटने उसके (१) अव्यपेत और (२) व्यपेत रूपोंके भिन्न-भिन्न नाम दिये हैं : (१) गर्भ यमक एवं (२) सन्दंश तथा (३) सन्दष्टक यमक । इसके विपरीत समुद्गयमकके दण्डीने (१) व्यपेत, (२) अव्यपेत और (३) व्यपेताव्यपेत तीन भेद दिये हैं। रुद्रटने समुद्गयमकके लक्षण और उदाहरण भरतके समान ही दिये हैं । ३ तिरपनवें श्लोकके उत्तरार्धकी व्याख्या समुद्ग यमकके तीन उदाहरणों (५४-५६ श्लोकों) की व्याख्याके बाद (पृष्ठ ७० पर) देंगे ।। ५३ ।। (२.१) प्रथम-तृतीय और द्वितीय-चतुर्थ-पादावृत्ति व्यपेत समुद्ग यमक— प्रस्तुत श्लोकमें कविने प्रियकी किसी बातपर नाराज़ होकर रूठी बैठी मानिनी हठीली नायिकाको उसकी ग़लतफ़हमी दूर करती हुई सहेलीने मान छोड़कर प्रियको अपनानेकी उचित सलाह दी है। १. अन्वयः--स्थेयस्सत्त्वया, परमायतमानया त्वया आस्थेयः स ना न वर्ज्यः । परम् आयतमानया आवर्ज्यः ।। २. अर्धेनैकेन यद् वृत्तं सर्वमेव समाप्यते । 'समुद्गयमकं' नाम तज्ज्ञेयं पण्डितैर्यथा ।। नाटच० १६।७० 'केतकीमुकुलपाण्डुरदन्तः शोभते प्रवरकाननहस्ती । केतकीमुकुलपाण्डुरदन्तः शोभते प्रवरकाननहस्ती ।। ७१ ३. अर्धं पुनरावृत्तं जनयति यमकं समुद्गकं नाम । काव्याल० ३।१६ ननाम लोको विदमानवेन मही न चारित्रमुदारधीरम् । न नामलोऽकोविदमानवेन महीनचारित्रमुदारधीरम् ।। १७
६८ काव्यादर्श [३।५५ २.२ नरा जिता माननया समेत्य न राजिता मान-नयासमेत्य । विनाशिता वैभव-तापनेन विनाशिता वै भवतापनेन१ ॥ ५५ ॥ (२.२) वैभव (विभुत्व, प्रभुत्व) को सन्तप्त करने वाले, घेरने वाले आपके द्वारा सम्मान (कीर्ति) से संयुक्त होकर जीते हुए लोग मान (गर्व) और नीतिके आस (आक्षेप, निषेध) को पाकर शोभासम्पन्न नहीं रहे हैं । या तो इधर उधर भगाये गये, या पक्षी (गीधों) के द्वारा खा लिये गये ॥ ५५ ॥ यहाँ (क) प्रथम, तृतीय पादोंमें एक ही वर्णसमुदाय है, (ख) द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें भी उससे भिन्न किन्तु एक ही वर्णसमुदाय प्रयुक्त है । इस प्रकार दोनों आवृत्तियाँ एकैक पादसे व्यवहित हैं । पूरे श्लोककी दृष्टिसे पूरे पूर्वार्धकी आवृत्ति उत्तरार्धमें की गई है । अतः यहाँ श्लोकार्धका अभ्यास (आवृत्ति) होनेसे समुद्ग यमक का प्रथम प्रकार है ॥ ५४ ॥ (२.२) प्रथम-द्वितीय, तृतीय-चतुर्थ पादवर्ती अव्यपेत समुद्ग यमक— प्रस्तुत श्लोकमें कविने किसी राजाके प्रतापका वर्णन किया है । यहाँ और अगले श्लोकमें उपेन्द्रवज्रा छन्द है । विनाशिताः—दो बार प्रयुक्त यह शब्द दो प्रकारसे व्युत्पन्न है : (१) वि+√नश्+णिच्+क्त, पुं०, प्रथमा, ए० व० । यहाँ √नश् वैदिक और लौकिक (पँजाबी आदि) भाषाओंमें प्रसिद्ध 'भागना' अर्थमें है । पाणिनीय धातुपाठके 'अदर्शन' का यह (अनात्यन्तिक अदर्शन) तात्पर्य भी लिया जा सकता है । (२) विना = वि पक्षी, तृतीया, ए० व०, अशिताः— √अश् भोजने (क्र्यादि)+क्त (कर्मणि) । भवतापनेन—तरुण वाचस्पतिने 'भवताऽपनेन' छेद करके 'अपनेन' को पन कौटिल्ये से अच् प्रत्ययसे निष्पन्न बताया है ।२ किन्तु √पन् सब धातुपाठोंमें व्यवहार और स्तुति अर्थोंमें ही उपलब्ध है । अतः वादी जङ्घालदेवकृत व्युत्पत्ति ही उचित है । इस श्लोकमें भी श्लोकार्धोमें अभ्यास है : पूर्वार्धके दोनों और उत्तरार्धके दोनों पादोंमें समान वर्णसमुदाय प्रयुक्त हैं । यह आवृत्ति निरन्तर—(१) १. अन्वयः—वैभव-तापनेन आपनेन भवता माननया समेत्य जिता नरा माननयासम् एत्य न राजिताः । विनाशिता वै विनाऽशिताः ॥ २. अपनेन = अकुटिलेन, 'पन कौटिल्ये' इत्यस्मात् पचाद्यच् । ३. वादिटीका : आपनेन - आप्नोति = व्याप्नोति...आपनः,, तेन (विना) ।
३।५६] १. यमकके विशिष्ट भेद : (२) समुद्ग ६६ (२.३) कलापिनां चारुतयोपयान्ति वृन्दानिलापोढघनागमानाम् । वृन्दानि लापोढघनागमानां कलापिनां चारुतयोपयान्ति ॥ ५६ ॥ (२.३) लापों (केकाओं) के द्वारा बादलोंकी व्याप्ति सूचित करने वाले मयूरोंकी केकाएँ तथा समूह जा रहे हैं । लाप (कलरव) के द्वारा मेघोंके गमन (प्राप्ति) के विपरीत भाव अर्थात् उनके विनाशके सूचक जलमें बोलने वालों (हंस, कारण्डरव, बतखु आदि पक्षियों) के झुण्ड सुन्दरतासे आ रहे हैं ॥ ५६ ॥ प्रथम पादकी द्वितीय पादमें और (२) तृतीय पादकी चतुर्थ पादमें—हुई हैं, में इसलिये यहाँ अव्यपेत द्विपाद यमक है । रुद्रटने (i) प्रथम पादकी द्वितीय पादसे आवृत्तिमें 'मुख', (ii) तृतीयकी चतुर्थमें आवृत्तिसे 'पुच्छ' एवम् (iii) इन दोनोंके युगपत् प्रयोगसे 'युग्मक' यमक माना है ।¹ रुद्रटने दण्डीके ही भेदोंको पृथक्-पृथक् सञ्ज्ञाएँ देकर व्यवस्थित किया है । किसी नवीन प्रकार की उद्भावना नहीं की है ॥ ५५ ॥ (२.३) प्रथम-चतुर्थ व्यपेत, द्वितीय-तृतीय अव्यपेत समुद्ग यमक—इस श्लोकमें कविने 'बरखा बिगत, शरद ऋतु आई' का व्यञ्जक वर्णन किया है । यदि इसी वर्णविन्यासको केवल एक अर्धालीके रूपमें कहा जाता, तो यहाँ भिन्नपद (शब्द-) श्लेष होता । श्लिष्ट पदोंको आवृत्तिसे पृथक्-पृथक् कहनेसे श्लेषका क्षेत्र नहीं रहा, यमकका निष्पन्न हो गया । यहाँ प्रथम पादके और चतुर्थ पादके मध्य दो पाद हैं, अतः व्यपेत यमक है । द्वितीय पाद की तृतीय पादमें आवृत्ति निरन्तरतासे हुई है, अतः अव्यपेत यमक है । एक श्लोकमें दोनों सम्पन्न होनेसे यह उभयात्मक यमक है । वादी जी और तरुण वाचस्पतिने मयूरोंके चारुतासे उपयान (आगमन) तथा हंसोंकी आरुतियोंके अपयान (प्रयाण) के रूपमें व्याख्या की है । यह प्राकृत क्रमके विपरीत होनेके कारण उचित नहीं है : शरद् ऋतु होनेपर हंसों का भारतमें आगमन तथा वसन्तागमनपर यहाँसे प्रयाण होता है । मयूरोंकी केकाएँ वर्षाकालमें प्रस्फुटित होती हैं तथा वर्षाकालकी समाप्तिके साथ शरदके १. (i) पर्यायेणान्येषाम आवृत्तानां सहादिपादेन । मुख-सन्दंशावृतयः क्रमेण यमकानि जायन्ते ॥ काव्याल० ३।३ (ii) अन्योन्यं पश्चिमयोरावृत्त्या पादयोर्भवेत्पुच्छः । १० (iii) मुख-पुच्छयोश्च योगाद् युग्मकमिति पादजं नवमम् ॥ १३
७० काव्यदर्श [ ३।५६ भागमनपर समाप्त हो जाती हैं। मतभेद 'मयूरोंके विगमको पहले कहा जाये, या हंसोंके आगमनको', इसपर हो सकता है। हंसोंके आगमनकी पूर्वता पीछे २।३३२ में बताई जा चुकी है। कलापिनां च आरुतयः पदच्छेद अभीष्ट¹ होनेके कारण 'च' वाले वाक्यका क्रम (स्थान) दूसरा ही उचित है : हंस आए, मयूर गये ।। ५६ ।। तिरपनवेँ श्लोकके उत्तरार्धमें प्रोक्त (३) पादाभ्यास यमकके— (i) एक पादकी एक बार आवृत्तिसे छह भेद होते हैं : (क) प्रथम पादकी (१) द्वितीय पादमें, (२) तृतीय पादमें और (३) चतुर्थ पादमें एक बार आवृत्ति से तीन भेद होते हैं; (ख) द्वितीय पादकी (१) तृतीय और (२) चतुर्थ पादमें एक बार आवृत्तिसे दो भेद होते हैं; (ग) तृतीय पादकी चतुर्थ पादमें आवृत्तिसे एक भेद होता है । इनमें से तीन (क १, ख १, ग १) यमक अव्यपेत होते हैं और शेष तीन व्यपेत होते हैं । इन छह भेदोंके उदाहरण ५७-६२ श्लोकोंमें दिये हैं । (ii) एक पादकी दो बार आवृत्ति से चार भेद बनते हैं : (क) प्रथम पादकी (१) द्वितीय-तृतीय पादोंमें आवृत्तिसे अव्यपेत, (२) द्वितीय, चतुर्थ पादोंमें आवृत्तिसे व्यपेत, (३) तृतीय-चतुर्थ पादोंमें आवृत्तिसे अव्यपेत, कुल तीन तथा (ख) द्वितीय पादकी तृतीय, चतुर्थ पादोंमें² आवृत्तिसे एक अव्यपेत । (क १-२, खके) उदाहरण ६३-६५ में दिए हैं । (iii) एक (प्रथम) पाद की तीन बार आवृत्तिसे एक अव्यपेत चतुष्पाद यमक भेद होता है। उदाहरण ६६वेँ श्लोकमें दिया है । अन्तिम भेदको (५) महायमक भी कहते हैं (श्लोक ७०) । जो दो प्रकारका होता है : (१) समूचे पादमें एक ही वर्णसमुदाय होता है, जो शेष तीन पादोंमें दुहराया जाता है । (२) इससे भी उत्कृष्ट एकाकार चतुष्पाद यमक वह होता है, जिसके प्रथम पादमें भी वर्णसमुदायकी आवृत्ति की होती है । इस प्रकार आवृत्तियुक्त पादकी तीन बार आवृत्ति करनेसे अत्युत्कृष्ट त्रिवाराभ्यास पादावृत्ति यमक निष्पन्न होता है । इसका प्रदर्शन ७१वें श्लोक में किया है ।। १. 'च' से युक्त परवर्ती होता है । अतः 'चारुतया' छेदके अनन्तर 'कला- पिनां च आरुतयः' कहना उचित है । २. तरुण वाचस्पतिने ६५वें श्लोककी व्याख्यामें इसे 'त्रिपादावृत्ति' कहा है । पर वहाँ आवृत्त पाद एक है और आवृत्तियाँ दो हैं । अतः इसे 'पादका द्विरभ्यास' कहना उचित है । 'त्रिपादावृत्ति' कहना उचित नहीं है ।
३।५७-५८] १. यमकके विशिष्ट भेद : (३) पादाभ्यास ७१ ३.१ नमन्दयावर्जितमानसात्मया न मन्दयाऽऽवर्जित-मान-सात्मया । उरस्युपास्तीर्णपयोधरद्वयं मया समालिङ्ग्यत जीवितेश्वरः१ ।।५७।। २. सभासुराणामबलाविभूषिता गुणैस्तवारोहि मृणालनिर्मलैः । सभासुराणामबलाविभूषिता विहारयन्निर्वश सम्पदः पुराम्२ ।।५८।। ३. १ दयासे रहित (कठोर) हृदय वाली, अभागिन (या मन्दबुद्धि), अपनाए हुए मानसे एकाकार बनी हुई मेरे द्वारा झुकता हुआ (अपराधकी क्षमा माँगता हुआ) प्राणेश्वर (उसके) वक्षस्थलपर दोनों पयोधरोंको (दबाकर) फैलाते हुए आलिङ्गित नहीं किया गया ।। ५७ ।। २ तुम्हारे कमलनालके समान शुभ्र गुणोंके द्वारा रमणियों (अप्सराओं) से विभूषित देवताओंकी सभा आरूढ हुई है । इस प्रकारके तुम अलङ्कृत रमणियोंको विहार कराते हुए शोभासम्पन्न शत्रुओंसे विजित नगरियोंकी सम्पदाओंका भोग करो ।। ५८ ।। १. (३. i. क १) अव्यपेत, द्वितीयपादवर्ती, प्रथमपादाभ्यास यमक—कोई मानवती नायिका अपराध क्षमा करानेके लिये अवनत अपने प्रियतमके प्रति मान रखे रहनेपर पछता रही है । यहाँ पूरा प्रथम पाद द्वितीय पादमें दुहराया गया है । अतः यहाँ अव्यपेत पादाभ्यास यमक है । कविने विप्रलम्भरतिकी अभिव्यक्तिके लिये वंशस्थ छन्दका प्रयोग किया है । 'उपास्तीर्ण-पयोधर- द्वयम्' क्रियाविशेषण है । इस समस्त पदकी उपसर्जनीभूत 'उपास्तीर्ण' क्रिया (समुदायके अवयव) से 'उरस्' का आधाराधेय भाव सम्बन्ध समुदायके माध्यमसे है ।३ ५७-६१ श्लोक वंशस्थ छन्दमें निबद्ध हैं ।। ५७ ।। २. (३. i. क २) तृतीयपादवर्ती व्यवहित प्रथमपादाभ्यास यमक—इस श्लोकमें कविने किसी राजाकी प्रशंसा करते हुए उसे आशीः दी है । प्रथम पादके 'अबला विभूषिता' पदोंकी व्याख्या वादीजी, तरुणवाचस्पति और रत्नेश्वर मिश्रने यों की है : जिसमें 'बल' नामक दानव विद्यमान नहीं है, क्योंकि उसे इन्द्रने मार डाला था, इसलिये इन्द्र 'बलभिद्' कहे जाते हैं । १. अन्वयः—दया-वर्जित-मानसात्मया, मन्दयाऽऽवर्जित-मान-सात्मया मया नमन् जीवितेश्वरः उरस्युपास्तीर्ण-पयोधरद्वयं न समालिङ्ग्यत । २. अन्वयः—मृणाल-निर्मलैस्तव गुणैः अबला-विभूषिता सुराणां सभा आरोहि । स विभूषिता अबला विहारयन्भासुराणां पुरां सम्पदः निर्विश । ३. २६वें श्लोकमें 'अलेः समकेशं ते' पर टीका, पृष्ठ ४०, देखें ।
७२ काव्यादर्श [३।५६ ३ कलङ्कमुक्तं तनु-मद्ध्य-नामिका स्तनद्वयी च त्वदृते न हन्त्यतः । न याति भूतं गणने भवन्मुखे कलङ्कमुक्तं तनुमद्वचनामिका¹ ॥५६॥ ३ मधुर वाणी, शरीरके मध्य भाग (कमर) को झुकाने (लचकाने) वाले अर्थात् पृथुल दोनों स्तन तुम्हें छोड़कर किसे नहीं घायल करते ? इसलिये आप जैसोंकी गिनतीमें अनामिका (चिटलीसे दूसरी अँगुली) कलङ्कसे रहित शरीरधारी भूतको नहीं पाती ॥ ५६ ॥ इस प्रकार देवसभा 'अ-बला' है । विभु = प्रभु इन्द्र, बृहस्पति आदि उसमें (उषित) रहते हैं, इसलिये देवसभा 'विभूषिता' है । 'अबला' की यह व्याख्या उचित नहीं है : इन्द्र-शत्रु 'बल' देवसभामें कभी रहा नहीं, जो कि देवसभाको अब उसके मरनेके बाद 'अविद्यमानबला = अबला' कहा जाये । देवसभामें अबलायें = अप्सरायें अलबत्ता रहतीं हैं । राजाको भी नगरियोंमें अबलाओंको विहार करानेको कहा है । इससे धरती की अबलाओंका स्वर्गकी अबलाओंसे सादृश्य व्यक्त होता है । यह एक अतिरिक्त काव्यसौन्दर्य है 'अबला = रमणी' व्याख्यामें, जो 'अबला = बलासुर- रहिता' व्याख्यामें नहीं है । आरोहि — आ + √रुह् + णिच्, कर्मणि लुङ्, प्रथम ए० व० । प्रथम वाक्य कर्मवाच्यमें है एवं द्वितीय कर्तृ वाच्यमें । वामनके अनुसार यहाँ मार्गभेदके कारण वैषम्य दोष है, जो शाब्द समता गुणका विपर्यय है² ॥ ५८ ॥ ३ (३. i. क. ३) चतुर्थपादवर्ती व्यवहित प्रथमपादाभ्यास यमक — इस श्लोक में किसी जितेन्द्रिय (कामजयी) महापुरुषकी अद्वितीयता बताई है । यहाँ प्रथम १. अन्वयः—कलम् उक्तं, तनु-मद्धचनामिका स्तनद्वयी च त्वदृते कं न हन्ति ? अतः हि अनामिका भवन्मुखे गणने कलङ्क-मुक्तं तनुमद् भूतं न याति । २. काव्यालङ्कारसूत्र ३।१।१२ : मार्गभेदः समता । वृत्ति : 'येन मार्गेणो- पक्रमस्तस्यात्याग' इत्यर्थः । ⋯ विपर्ययस्तु यथा — प्रसीद, चण्डि, त्यज मन्युमञ्जसा; जनस्तवायं पुरतः कृताञ्जलिः । किमर्थमुत्कम्पितपीवरस्तनद्वयं त्वया लुप्तविलासमास्यते ॥ यहाँ दो प्रकारका मार्गभेद है : (१) पूर्वार्धके तीनों वाक्य कर्तृ- वाच्यमें हैं; उत्तरार्धमें भाववाच्य है; (२) पूर्वार्धमें असमासा रचना है, उत्तरार्धमें दीर्घसमासा और अल्पसमासा । त्रिपुरहर भूपालने प्रथम मार्गभेद माना है, अभिनवगुप्तने द्वितीय ।
२. द्वितीय परिच्छेद: शब्दालंकार एवं अर्थालंकार विवेचन (उपमा, रूपक, दीपक आदि)
३।६०] १. यमकके विशिष्ट भेद : (३) पादाभ्यास ७३ ४ यशश्च ते दिक्षु रजश्च सैनिका वितन्वतेऽजोपम दंशिता युधा । वितन्वतेजोऽपमदं शितायुधा द्विषां च कुर्वन्ति कुलं तरस्विनः ॥६०॥ ४ हे अजन्मा (विष्णु) के समान, कवचधारी, तीखे आयुधों वाले अर्थात् शूर, शत्रुपंर तेजीसे झपटने वाले सैनिक युद्धके द्वारा दिशाओंमें तुम्हारा यश और धूल फैला रहे हैं । और शत्रुओंके कुल (खानदान अथवा समूह) को शरीर- रहित, तेजके अभावसे युक्त और नष्ट हुए गर्व वाला कर रहे हैं ॥ ६० ॥ पादके चौथे पादमें दुहराये वर्णसमुदायके मध्य दो (द्वितीय और तृतीय) पादोंका व्यवधान है। समूचे पादकी आवृत्ति होनेसे यह 'पादाभ्यास' यमक है। रत्नेश्वरमिश्रने (रत्नदर्पण २।१४४में) 'तनुमधि= शरीरमधिकृत्य' व्याख्या की है । पर शरीरवाची 'तनु' तो नित्यस्त्रीलिङ्ग है । अतः उचित नहीं है । रुद्रटने इस भेदको 'आवृत्तियमक' नाम दिया है ॥ ५६ ॥ ४ (३. i. ख. १) अव्यवहित द्वितीयपादाभ्यास यमक—इस श्लोकमें आचार्य कवि दण्डीने किसी राजाके सैनिकों द्वारा घमासान युद्धसे उसकी कीर्तिके विस्तार और शत्रुओंके प्राणपरित्याग और तेज और गर्वके नाशका वर्णन किया है। यहाँ घटनाओंका क्रम उचित नहीं है : पहले घमासान युद्धका, फिर शत्रुमरण और बच रहे शत्रुओंके तेजोनाश और मानभञ्जनका तथा फिर राजाकी कीर्तिका वर्णन उचित होता । वादी जङ्घालदेव और तरुण वाचस्पतिने 'तरस्विन्'का अर्थ 'वेगवान्' किया है। सैनिकोंके प्रसङ्गमें 'वेगवान्' अर्थकी अपेक्षा 'शूर' अर्थ अधिक उचित है । यहाँ द्वितीय पादकी आवृत्ति तृतीय पादमें की गई है । अतः अव्यपेत द्वितीयपादाभ्यास यमक है । रुद्रटने श्लोकके गर्भ (मध्य) में उपस्थितिके कारण इसे 'गर्भयमक' नाम दिया है ॥ ६० ॥ १. अन्वयः—अजोपम, दंशिताः, शितायुधाः, तरस्विनः सैनिकाः युधा दिक्षु ते यशश्च रजश्च वितन्वते । द्विषां कुलं च वि-तनु, अतेजः, अप-मदं च कुर्वन्ति । २. अमरकोष ३।३।१२८ : वेगि-शूरो तरस्विनौ । 'तरस्'का मूल अर्थ 'वेग' है । वेग विना बलके सम्भव नहीं है । अतः 'तरस्वान्', 'तरस्वी'का परिनिष्ठित अर्थ 'बलवान्' से होते-होते 'शूर' हो गया है । हैमकोष : तरो जवे बले । अमरकोष २।८।१०२ : द्रविणं तरः-सहो-बल-शौर्याणि, स्थाम, शुष्मं च ।। शक्तिः, पराक्रमप्राणौ ।
७४ काव्यादर्श [३।६१-६२ बिभर्ति भूमेर्वलयं भुजेन ते भुजङ्गमोऽमा स्मरतो मदञ्चितम् । शृणूक्तमेकं स्वमवेत्य भूधरं भुजङ्गमो मा स्म रतो मदञ्चितम् ॥ ६१ ॥ स्मरानलो मान-विवर्धितो यः, स निर्वृतिं ते किमपाकरोति ? समन्ततस्तामरसेक्षणे न समन्ततस्तामरसे क्षणेन ॥ ६२ ॥ ५ सर्प (शेषनाग) तुम्हारी भुजाके साथ (मिलकर) भूगोलको धारण करता है । (इस बातको) स्मरण करते हुए मुझसे एक अच्छी बात सुनो— एक (अकेली) अपनी भुजाको पृथिवीका धारक समझकर प्रसन्न हुए तुम प्रभूत गर्व मत करना ॥ ६१ ॥ ६ हे अपनेको म्लान करनेपर तुली हुई, कमलसदृश लोचनों वाली, तुम्हारा कामाग्नि (कामपीडा) मान करनेसे बढ़ गया है । सब तरफसे समान रूपसे (एक साथ) फैला हुआ वह क्षण भरमें तुम्हारे धैर्य (सुस्थिति) को क्यों नहीं दूर कर रहा है ? अर्थात् इस अवस्थाको प्राप्त करके भी तुम मान क्यों नहीं छोड़ रही ? ॥ ६२ ॥ ५ (३. i. ख. २) व्यवहित द्वितीयपादाभ्यास यमक—इस श्लोकमें कविने किसी राजाकी प्रशंसा व्याजस्तुतिसे की है । यहाँ द्वितीयपादकी आवृत्ति तृतीय पादके व्यवधानसे चौथे पादमें की गई है । रुद्रटने इसे 'सन्दष्टक' नाम दिया है । माघने इस यमकका प्रयोग बहुत किया है ॥ ६१ ॥ ६ (३. i. ग) तृतीयपादाभ्यास अव्यपेत यमक—प्रियतमके किसी अपराधपर अत्यन्त तनी हुई मानवती नायिकाके प्रति उसके प्रति हितैषी किसीका कथन उपेन्द्रवज्रा छन्दमें निबद्ध प्रकृत श्लोकमें कविने दिया है । रमणी अत्यन्त सुन्दर है । उसके नयन तामरस (तामरस = जल में रहने से कमल) के समान झूमने वाले हैं । अथवा ताम = चाहतके रससे सराबोर, प्रेमाल है । अथवा प्रियविरहके कारण उनका रस = पानी ताम = म्लान हो गया है, रोते-रोते सूख गया है । वह स्वयं भी तामरसा है : कमलका फूल है, उस जैसी कोमल तथा सुन्दर है । पर अब वह ताम = म्लानतामें रस अनुभव १. अन्वयः—भुजङ्गमः ते भुजेन अमा भूमेर्वलयं बिभर्ति । स्मरतः मत् अञ्चितमेकमुक्तं शृणु । स्वं भुजं भूधरम् अवेत्य रतः चितं मदं मा स्म गमः । २. अन्वयः—तामरसे, तामरसेक्षणे, यः स्मरानलः, मान-विवर्धितः समन्ततः समं ततः, स क्षणेन ते निर्वृतिं किं न अपाकरोति ?
३।६३] १. यमकके विशिष्ट भेद : (३) पादाभ्यास ७५ ७ प्रभावतो नामन, वासवस्य प्रभावतोऽनामन, वाऽऽसवस्य । प्रभावतो नाम न वा सवस्य विच्छित्तिरासीत् त्वयि विष्टपस्य१ ।। ६३ ।। ७ हे तेजोदीप्त इन्द्रको तेजके या यज्ञके कारण नीचा दिखाने वाले तथा लोगोंको पीडासे मुक्ति दिलाने वाले (राजन्), तुम जब लोकके शासक हो, तब निश्चय ही सोमयागोंका (कभी) विच्छेद नहीं हुआ ।। ६३ ।। कर रही है, अपनेको सुखानेपर उतरी हुई है । 'तामरसे, तामरसेक्षणे' इन विशेषताओंसे युक्त सुन्दरियोंके सम्बोधनके एक वचन हैं । स्मरपर अनलका आरोप होनेसे रूपक है । कमल-कोमल-कायाके लिये प्रेम ही आग है । तुम्हारे इस मानने उसे हवा दे दी है : मान स्मराग्निका उद्दीपक हो गया है । तुम प्रेमज्वरसे अङ्गारेके समान दहक रही हो । पर हो तुम बड़ी हठीली ! प्रियके प्रति उद्दाम प्रेम, उसका अपराध, वसन्त, यौवन आदि सब उद्दीपनोंके एक साथ एकत्र उपस्थित हो जानेसे खूब फैला हुआ वह प्रेमाग्नि भी तुम्हारे धैर्य अथवा हठ, क्षण भरमें क्यों नहीं भङ्ग कर पा रहा है ? यही मुझे आश्चर्य है ! बावली, क्षणभरकी भी देर न कर । मान छोड़ । प्रियतमके सङ्गसुखसे कामज्वरकी पीड़ाको दूर कर । व्याख्याभेदके लिए वादी, तरुणवाचस्पति, रत्नेश्वर मिश्र प्रभृतिकी टीकायें देखें । यहाँ पूरे तृतीयपादकी आवृत्ति चतुर्थ पादके रूपमें की गई है । तृतीय- पादावृत्ति पादाभ्यास यमकका और भेद सम्भव नहीं है । श्लोकके अन्तमें आवृत्तिके कारण रुद्रटने इसे 'पुच्छ यमक' नाम दिया है ।। ६२ ।। ७ (३. ii. क. १) द्वितीय-तृतीय-पादावृत्त प्रथमपादाभ्यास अव्यपेत यमक— इस श्लोकमें कविने अपने वर्ण्य राजाको इन्द्रसे दो कारणोंसे अधिक बताया है : इन्द्र की प्रसिद्धि (१) वीरके रूपमें है; (२) शतक्रतुके रूपमें है कि सौ अश्वमेध यज्ञ करनेसे मनुष्य इन्द्र बन जाता है ।२ प्रकृत राजा (१) १. अन्वयः—प्रभाव-तः, न वा आसवस्य, प्रभा-वतः वासवस्य नामन, अना- मन, अतो नाम त्वयि विष्टपस्य प्रभौ न वा सवस्य विच्छित्तिः आसीत् । २. वेदमें इन्द्रका 'शत-क्रतु' नाम प्रसिद्ध है । वहाँ इसका अर्थ इष्ट था : शतं क्रतवः कर्माणि, धियः = सङ्कल्पा वा यस्य, स शतक्रतुः । हस्ते वज्रं भरति, शीर्षणि क्रतुम् (ऋ० २।१६।२), हृत्सु क्रतुं वरुणो, अप्स्वग्निं, दिवि सूर्यमदधात् सोममद्रौ (ऋ० ५।८५।२) । ब्राह्मण कालमें क्रतु
७६ काव्यादर्श [३।६४ ८ परम्पराया बलवारणानां, परम्पराया बलवारणानाम् । धूलीः स्थलीर्व्योम विधाय रुन्धन् परम्पराया बलवा रणानाम् ॥६४॥ ८ सेनाओंको खूब रोकने वाले सेनाङ्ग हाथियोंकी उत्कृष्ट परम्परा (लम्बी कतारों) की धूलको स्थली (टेकड़ी, धरतीका टुकड़ा) बनाकर आकाशको रोकते हुए, युद्धोंके बलको प्राप्त तुम शत्रुके विपरीत गये हो ॥ ६४ ॥ कोश और दण्डके तेजरूपी प्रभावमें२ इन्द्रको नीचा दिखाने वाला है। इन्द्रको अपने कई शत्रुओंके विनाशके लिये पार्थिवोंकी सहायता लेनी पड़ी, पर यह राजा अकेला ही शत्रुविजय करता है। इसके आगे तो 'इन्द्र बापुरो रंक' है। (२) इन्द्रके तो सौ ही यज्ञ हैं; यह राजा तो अविच्छिन्न रूपसे यागपर याग किये जा रहा है; उनकी अभीसे इयत्ता कैसे बताई जाये । इन्द्र तो अधीनस्थोंके लिये आमन=रुजाकारक भी हो जाता है, पर यह राजा अपने अधीनस्थोंको आधिव्याधिसे मुक्त रखनेके कारण 'अनामन' है। उसे 'नामन' और 'अनाम' कहनेसे विरोध अलङ्कार है। यहाँ प्रथम पादकी दो बार (दूसरे और तीसरे पादोंके रूप में) अव्य- वहित आवृत्ति हुई है ॥ ६३ ॥ ८ (३. ii. क. २) द्वितीय-चतुर्थपादावृत्त प्रथमपादाभ्यास अव्यवहित- व्यवहित यमक—प्रकृत श्लोकमें कविने किसी राजाके समरशौर्यका वर्णन उपेन्द्रवज्रा (प्रथम, द्वितीय-चतुर्थ पादोंमें) और इन्द्रवज्रा (तृतीय पाद) की उपजातिमें निबद्ध किया है। बलवा (रणानाम्)—बलं चतुरङ्गिणीं सेनां वृणोति इति वा, वाति इति वा । रत्नश्री और वादी जी ने यहाँ (३. ii. क. ३) द्वितीयपादव्यवहित कर्मार्थक होनेके कारण यज्ञ (विशेष कर्म) अर्थमें रूढ हो गया । पुराणों में आकर यज्ञ करके इन्द्रपदप्राप्ति बताई गई और 'शतक्रतु' नाम इस प्रकार इन्द्रके लिये रूढ हो गया : अथादीक्षत राजा तु हयमेधशतेन सः ।... शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम् ॥... चरमेणाश्वमेधेन यजमाने यजुष्पतिम् । वैन्ये यज्ञपशुं स्पर्धन्नपोवाह तिरोहितः ॥ (श्रीमद्भागवत ४।१६।१,२,११) । निरुक्तके पाँच अध्याय, पृष्ठ २६५ भी देखें । १. अन्वयः—परं बल-वारणानां बल-वारणानां परायाः परम्परायाः धूलीः स्थलीः विधाय व्योम रुन्धन् रणानां बल-वाः परं पराऽयाः । २. स प्रतापः प्रभावश्च यत्तेजः कोशदण्डजम् । अमरकोष २।८।२०