काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३।५०] दुष्कर यमक ६१ १२. कालकालगलकालकालमुखकालकाल- कालकालपन कालकालघनकालकाल । कालकालसितकालका ललनिकालकाल- कालका लगतु कालकालकलिकालकाल² ।। ५० ।। १२. काले (नाग) के काल (परम शत्रु), गलेमें काल चिह्नसे युक्त (नीलकण्ठ), काल (वर्ष) के मुख (वर्षा) कालमें बोलने वाले, काली (शिखा) सिरपर धारण करने वाले (शिखी) मयूरोंके बोलनेके काल (वर्षा ऋतु) में काले मेघों वाला काल (वर्षा ऋतु) जिसके लिए मौत जैसा है, इस प्रकारके (तथा) कालोंमें काल (सब समयोंमें श्रेष्ठ ऋतुराज), कलियाँ और उनपर मँडराते भ्रमरोंका समूह जिसके लिये काल (अत्यन्त कष्टदायी) है, इस प्रकारके हे मित्र, कालक (लहसुनिया या तिलचिह्न) से सुशोभित मुखसे भूषित लाडली विलासिनी आ लगे (तुमसे संयुक्त हो) ।। ५० ।। १२. (३. घ.) आदि-मध्यान्तवर्ती चतुष्पाद अव्यपेत-व्यपेत सजातीय त्रिस्थानयमक—इस श्लोकमें कविने ख, घ, प, म, स का एकेक बार त, ग का दो बार और न का तीन बार प्रयोग करके शेष वर्णविन्यासमें क और ल वर्णोंका प्रयोग किया है। ये वर्ण भी प्रथम और तृतीय पादोंमें एकेक बार 'ल' को और चतुर्थ पादमें 'कलि' को छोड़कर समूचे श्लोकमें २४ बार 'काल' वर्णसमुदायके रूपमें अव्यवहित और नियत (दो-दो) वर्णोंके व्यवधान में आवृत्त हुए हैं। स्वर भी 'अ', 'आ', 'इ' और 'उ' ही आये हैं। इस प्रकार यह यमक अत्यन्त दुष्कर है। वामनोक्त अत्यधिक आवृत्तिके कारण दूषित यमकके उदाहरणके रूपमें त्रिपुरहर भूपालने यह श्लोक उचित ही उद्धृत किया है।³ १. रत्नश्री आदि तीनों टीकाओंमें यही पाठ धृत एवं व्याख्यात है। काम- धेनु ४।१।७ में उद्धृत इस श्लोकमें 'पन'की जगह 'घ' एवम् आगे 'घन'की जगह 'पन' पाठ है। २. अन्वयः—कालकाल-गलकाल-कालमुखकालकाल-कालकालपन-काल-काल घनकाल-काल, कालकाल-कलिकाऽऽल-काल, कालकालसित-कालका, आल-कालकालका ललनिकाऽऽलगतु । ३. आरूढं भूयसा यत्तु पदं यमकभूमिकाम् । दुष्येच्चेन्न, न पुनस्तस्य युक्ताऽनुप्रासकल्पना ।। काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति ४।१।७ में छठे श्लोकपर कामधेनु : यथा दण्डिनोक्तम्—'कालकाल...कलिकालकाल ।।' इति