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काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 270 में से

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पृष्ठ 85

६२ काव्यादर्श [३।५०] इतिहासविदोंके मतमें इस श्लोकमें आवृत्त कालकाल शब्द काव्यादर्श (२।२७७) में राजवर्मणः से सूचित राजसिंह, राजसुन्दरवर्मा और अत्यन्तक विरुदोंसे प्रसिद्ध काञ्चीपति पल्लवनरेश नरसिंहवर्मा द्वितीय (राज्यकाल ७००-७२८ ई०) का ही एक विरुद है।¹ दण्डीने अवन्तिसुन्दरी कथा में भी कालकालका यमक दिया है।² इस दृष्टिसे चतुर्थ पादके अन्तमें पठित कालकाल नरसिंहवर्माका विरुदसे सम्बोधन हो सकता है। कलिकालकाल पद 'कलि (युद्ध) में काल (स्वयं मृत्युका अथवा कालसदृश पराक्रमी शत्रु) का भी काल' अर्थमें विशेषण सम्बोधन हो सकता है। ललनिकासे ललनासे भी अधिक लाडली विजयश्री अभिप्रेत हो सकती है। वह वर्षाकालमें युद्ध न हो पानेके कारण राजाको न पानेसे दुःखी है। उसके बाद शीतकालमें प्रयाण अभियानके चलते भी विर- हिणी ही है। वसन्तके आते-आते कालकाल द्वारा शत्रुविनाश किये जानेपर विजयश्रीरूपी ललनिका (अत्यन्त चहेती ललना) आ लगे, तुम्हारे पास चली आए। इस प्रकार कवि द्वारा आशीः प्रकट की गई है। प्रायः सभी टीकाकारोंने इसकी व्याख्या विविध प्रकारसे की हैं। हमने भी उनमें एक और जोड़ दी है। तत्त्वं त्वस्य कविर्वेत्ति, कल्पनोल्लासिनो वयम्। युक्ताऽर्थाऽक्लिष्टकल्पा च व्याख्या सद्भिः प्रगृह्यताम् ॥ १ ॥ नेयत्ता कविभावानां, दारिद्र्यं तद्बुधेषु न। विविधैर्विविधं तस्मात् काव्यभिप्राय उच्यते ॥ २ ॥ ६५५३६ भेदों³ वाली षोडशाक्षर अष्टि वृत्तजातिके र, न, र, न, र गण और लघु अक्षरविन्यास वाले किसी छन्दका प्रयोग कविने इस श्लोकमें किया है। यति ६, ६, ४ पर अभीष्ट लगती है ॥ ५० ॥ १. डॉ० धर्मेन्द्रकुमार गुप्त काव्यादर्शः, भूमिका, पृष्ठ ३६; श्री नीलकण्ठ शास्त्री, ए हिस्ट्री आफ साउथ इण्डिया, पृष्ठ ४६० ! प्रसादिनी २।२७७; पृष्ठ २३७ भी देखें। २. पृष्ठ १११, पंक्ति २१ : प्रवृत्तकालकालरात्रिभुजलतायमानया...। ३. पञ्चषष्टिसहस्राणि, सहस्रार्धं च सङ्ख्यया ।। नाट्य० १४।६७, षट्त्रिंशच्चैव वृत्तानामष्टौ निगदितानि च । ६८

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