भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

३५१] यमकके अन्य विशिष्ट भेद ६३ १. सन्दष्ट-यमक-स्थानमन्तादी पादयोर्द्वयोः । उक्तान्तर्गतमप्येतत् स्वातन्त्र्येणात्र कीर्त्यते ।। ५१ ।। (१) दो पादोंमें अन्त और आदि स्थान 'सन्दष्टयमक' का स्थान होता है। यह यद्यपि उक्त उदाहरणोंमें आ चुका है, तथापि यह स्वतन्त्रतासे बताया जा रहा है ।। ५१ ।। यमकके अन्य विशिष्ट भेद—(१) सन्दष्ट यमक : आदिमध्यादि सात स्थानोंके आधारपर अव्यपेत आदि त्रिविध यमकका प्रदर्शन ४२ उदाहरणोंमें करनेके बाद आचार्यने यमककी स्थानगत अन्य विच्छित्तियोंका निरूपण अगले प्रकरणमें किया है। भरतने इस प्रकारकी विच्छित्तियोंको उनके द्वारा लोकमें उपलब्ध आकारविशेष धारण कर लिये जानेके कारण उन आकारों वाले नाम दिये हैं : काञ्ची, समुद्ग, विक्रान्त, चक्रवाल, सन्दष्ट एवम् माला यमक ।¹ भरतका जो चक्रवाल यमक है, उसे ही दण्डीने सन्दष्ट यमक नामसे दिया है। यह संज्ञा 'सम् + √दंश् + क्त' से 'सन्धान' अर्थमें निष्पन्न अभीष्ट है : जहाँ एक पादका अन्त दूसरे पादके आदिसे आवृत्तिके द्वारा जुड़ा हो, वह 'संदंश' यमक होता है। इस प्रकार आवृत्ति अव्यवधानमें ही सम्भव है। यमकका यह स्वरूप भरतके 'चक्रवाल' यमकमें मिलता है।² भरतका 'सन्दष्ट'का स्वरूप स्पष्ट नहीं है : आदिमें दो पाद जहाँ अक्षरोंसे समान हों, वह सन्दष्ट बताया है ।³ परन्तु उदाहरणमें चारोंपादोंके आदिमें दो-दो पद समान हैं एवं द्वितीय पादके आदिके दो पदोंको छोड़कर शेष भागकी आवृत्ति चतुर्थ पादमें १. पादान्तयमकं चैव, काञ्चीयमकमेव च । समुद्गयमकं चैव विक्रान्तयमकं तथा ।। नाट्यशास्त्र १६।६३ यमकं चक्रवालं च, सन्दष्टयमकं तथा । पादादि-यमकं चैव, आम्रेडितमथापि च ।। ६४ चतुर्व्यवसितं चैव, मालायमकमेव च । एतद्दशविधं ज्ञेयं यमकं नाटकाश्रयम् ।। ६५ ।। २. पूर्वस्यान्तेन पादस्य परस्यादिर्यदा समः । चक्रवच् 'चक्रवालं' तद् विज्ञेयं नामतो, यथा ।। नाट्य० १६।७४ शैला यथा शत्रुभिराहता हता, हताश्च भूयोऽप्यनुपुङ्खगैः खगैः । खगैश्च सर्वेर्युधि संचिताश्चिताश्चिताधिरूढा निहताः फलैः फलैः ।। ७५ ३. आदौ द्वौ यत्र पादौ तु भवेतामक्षरैः समौ । 'सन्दष्टयमकं' नाम विज्ञेयं तद् बुधैर्यथा ।। नाट्यशास्त्र १६।७६