भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

पृष्ठ 91, कुल 270 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 91

६८ काव्यादर्श [३।५५ २.२ नरा जिता माननया समेत्य न राजिता मान-नयासमेत्य । विनाशिता वैभव-तापनेन विनाशिता वै भवतापनेन१ ॥ ५५ ॥ (२.२) वैभव (विभुत्व, प्रभुत्व) को सन्तप्त करने वाले, घेरने वाले आपके द्वारा सम्मान (कीर्ति) से संयुक्त होकर जीते हुए लोग मान (गर्व) और नीतिके आस (आक्षेप, निषेध) को पाकर शोभासम्पन्न नहीं रहे हैं । या तो इधर उधर भगाये गये, या पक्षी (गीधों) के द्वारा खा लिये गये ॥ ५५ ॥ यहाँ (क) प्रथम, तृतीय पादोंमें एक ही वर्णसमुदाय है, (ख) द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें भी उससे भिन्न किन्तु एक ही वर्णसमुदाय प्रयुक्त है । इस प्रकार दोनों आवृत्तियाँ एकैक पादसे व्यवहित हैं । पूरे श्लोककी दृष्टिसे पूरे पूर्वार्धकी आवृत्ति उत्तरार्धमें की गई है । अतः यहाँ श्लोकार्धका अभ्यास (आवृत्ति) होनेसे समुद्ग यमक का प्रथम प्रकार है ॥ ५४ ॥ (२.२) प्रथम-द्वितीय, तृतीय-चतुर्थ पादवर्ती अव्यपेत समुद्ग यमक— प्रस्तुत श्लोकमें कविने किसी राजाके प्रतापका वर्णन किया है । यहाँ और अगले श्लोकमें उपेन्द्रवज्रा छन्द है । विनाशिताः—दो बार प्रयुक्त यह शब्द दो प्रकारसे व्युत्पन्न है : (१) वि+√नश्+णिच्+क्त, पुं०, प्रथमा, ए० व० । यहाँ √नश् वैदिक और लौकिक (पँजाबी आदि) भाषाओंमें प्रसिद्ध 'भागना' अर्थमें है । पाणिनीय धातुपाठके 'अदर्शन' का यह (अनात्यन्तिक अदर्शन) तात्पर्य भी लिया जा सकता है । (२) विना = वि पक्षी, तृतीया, ए० व०, अशिताः— √अश् भोजने (क्र्यादि)+क्त (कर्मणि) । भवतापनेन—तरुण वाचस्पतिने 'भवताऽपनेन' छेद करके 'अपनेन' को पन कौटिल्ये से अच् प्रत्ययसे निष्पन्न बताया है ।२ किन्तु √पन् सब धातुपाठोंमें व्यवहार और स्तुति अर्थोंमें ही उपलब्ध है । अतः वादी जङ्घालदेवकृत व्युत्पत्ति ही उचित है । इस श्लोकमें भी श्लोकार्धोमें अभ्यास है : पूर्वार्धके दोनों और उत्तरार्धके दोनों पादोंमें समान वर्णसमुदाय प्रयुक्त हैं । यह आवृत्ति निरन्तर—(१) १. अन्वयः—वैभव-तापनेन आपनेन भवता माननया समेत्य जिता नरा माननयासम् एत्य न राजिताः । विनाशिता वै विनाऽशिताः ॥ २. अपनेन = अकुटिलेन, 'पन कौटिल्ये' इत्यस्मात् पचाद्यच् । ३. वादिटीका : आपनेन - आप्नोति = व्याप्नोति...आपनः,, तेन (विना) ।