काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary
महाकवि दण्डी द्वारा
६८ काव्यादर्श [३।५५ २.२ नरा जिता माननया समेत्य न राजिता मान-नयासमेत्य । विनाशिता वैभव-तापनेन विनाशिता वै भवतापनेन१ ॥ ५५ ॥ (२.२) वैभव (विभुत्व, प्रभुत्व) को सन्तप्त करने वाले, घेरने वाले आपके द्वारा सम्मान (कीर्ति) से संयुक्त होकर जीते हुए लोग मान (गर्व) और नीतिके आस (आक्षेप, निषेध) को पाकर शोभासम्पन्न नहीं रहे हैं । या तो इधर उधर भगाये गये, या पक्षी (गीधों) के द्वारा खा लिये गये ॥ ५५ ॥ यहाँ (क) प्रथम, तृतीय पादोंमें एक ही वर्णसमुदाय है, (ख) द्वितीय और चतुर्थ पादोंमें भी उससे भिन्न किन्तु एक ही वर्णसमुदाय प्रयुक्त है । इस प्रकार दोनों आवृत्तियाँ एकैक पादसे व्यवहित हैं । पूरे श्लोककी दृष्टिसे पूरे पूर्वार्धकी आवृत्ति उत्तरार्धमें की गई है । अतः यहाँ श्लोकार्धका अभ्यास (आवृत्ति) होनेसे समुद्ग यमक का प्रथम प्रकार है ॥ ५४ ॥ (२.२) प्रथम-द्वितीय, तृतीय-चतुर्थ पादवर्ती अव्यपेत समुद्ग यमक— प्रस्तुत श्लोकमें कविने किसी राजाके प्रतापका वर्णन किया है । यहाँ और अगले श्लोकमें उपेन्द्रवज्रा छन्द है । विनाशिताः—दो बार प्रयुक्त यह शब्द दो प्रकारसे व्युत्पन्न है : (१) वि+√नश्+णिच्+क्त, पुं०, प्रथमा, ए० व० । यहाँ √नश् वैदिक और लौकिक (पँजाबी आदि) भाषाओंमें प्रसिद्ध 'भागना' अर्थमें है । पाणिनीय धातुपाठके 'अदर्शन' का यह (अनात्यन्तिक अदर्शन) तात्पर्य भी लिया जा सकता है । (२) विना = वि पक्षी, तृतीया, ए० व०, अशिताः— √अश् भोजने (क्र्यादि)+क्त (कर्मणि) । भवतापनेन—तरुण वाचस्पतिने 'भवताऽपनेन' छेद करके 'अपनेन' को पन कौटिल्ये से अच् प्रत्ययसे निष्पन्न बताया है ।२ किन्तु √पन् सब धातुपाठोंमें व्यवहार और स्तुति अर्थोंमें ही उपलब्ध है । अतः वादी जङ्घालदेवकृत व्युत्पत्ति ही उचित है । इस श्लोकमें भी श्लोकार्धोमें अभ्यास है : पूर्वार्धके दोनों और उत्तरार्धके दोनों पादोंमें समान वर्णसमुदाय प्रयुक्त हैं । यह आवृत्ति निरन्तर—(१) १. अन्वयः—वैभव-तापनेन आपनेन भवता माननया समेत्य जिता नरा माननयासम् एत्य न राजिताः । विनाशिता वै विनाऽशिताः ॥ २. अपनेन = अकुटिलेन, 'पन कौटिल्ये' इत्यस्मात् पचाद्यच् । ३. वादिटीका : आपनेन - आप्नोति = व्याप्नोति...आपनः,, तेन (विना) ।
३।५६] १. यमकके विशिष्ट भेद : (२) समुद्ग ६६ (२.३) कलापिनां चारुतयोपयान्ति वृन्दानिलापोढघनागमानाम् । वृन्दानि लापोढघनागमानां कलापिनां चारुतयोपयान्ति ॥ ५६ ॥ (२.३) लापों (केकाओं) के द्वारा बादलोंकी व्याप्ति सूचित करने वाले मयूरोंकी केकाएँ तथा समूह जा रहे हैं । लाप (कलरव) के द्वारा मेघोंके गमन (प्राप्ति) के विपरीत भाव अर्थात् उनके विनाशके सूचक जलमें बोलने वालों (हंस, कारण्डरव, बतखु आदि पक्षियों) के झुण्ड सुन्दरतासे आ रहे हैं ॥ ५६ ॥ प्रथम पादकी द्वितीय पादमें और (२) तृतीय पादकी चतुर्थ पादमें—हुई हैं, में इसलिये यहाँ अव्यपेत द्विपाद यमक है । रुद्रटने (i) प्रथम पादकी द्वितीय पादसे आवृत्तिमें 'मुख', (ii) तृतीयकी चतुर्थमें आवृत्तिसे 'पुच्छ' एवम् (iii) इन दोनोंके युगपत् प्रयोगसे 'युग्मक' यमक माना है ।¹ रुद्रटने दण्डीके ही भेदोंको पृथक्-पृथक् सञ्ज्ञाएँ देकर व्यवस्थित किया है । किसी नवीन प्रकार की उद्भावना नहीं की है ॥ ५५ ॥ (२.३) प्रथम-चतुर्थ व्यपेत, द्वितीय-तृतीय अव्यपेत समुद्ग यमक—इस श्लोकमें कविने 'बरखा बिगत, शरद ऋतु आई' का व्यञ्जक वर्णन किया है । यदि इसी वर्णविन्यासको केवल एक अर्धालीके रूपमें कहा जाता, तो यहाँ भिन्नपद (शब्द-) श्लेष होता । श्लिष्ट पदोंको आवृत्तिसे पृथक्-पृथक् कहनेसे श्लेषका क्षेत्र नहीं रहा, यमकका निष्पन्न हो गया । यहाँ प्रथम पादके और चतुर्थ पादके मध्य दो पाद हैं, अतः व्यपेत यमक है । द्वितीय पाद की तृतीय पादमें आवृत्ति निरन्तरतासे हुई है, अतः अव्यपेत यमक है । एक श्लोकमें दोनों सम्पन्न होनेसे यह उभयात्मक यमक है । वादी जी और तरुण वाचस्पतिने मयूरोंके चारुतासे उपयान (आगमन) तथा हंसोंकी आरुतियोंके अपयान (प्रयाण) के रूपमें व्याख्या की है । यह प्राकृत क्रमके विपरीत होनेके कारण उचित नहीं है : शरद् ऋतु होनेपर हंसों का भारतमें आगमन तथा वसन्तागमनपर यहाँसे प्रयाण होता है । मयूरोंकी केकाएँ वर्षाकालमें प्रस्फुटित होती हैं तथा वर्षाकालकी समाप्तिके साथ शरदके १. (i) पर्यायेणान्येषाम आवृत्तानां सहादिपादेन । मुख-सन्दंशावृतयः क्रमेण यमकानि जायन्ते ॥ काव्याल० ३।३ (ii) अन्योन्यं पश्चिमयोरावृत्त्या पादयोर्भवेत्पुच्छः । १० (iii) मुख-पुच्छयोश्च योगाद् युग्मकमिति पादजं नवमम् ॥ १३
७० काव्यदर्श [ ३।५६ भागमनपर समाप्त हो जाती हैं। मतभेद 'मयूरोंके विगमको पहले कहा जाये, या हंसोंके आगमनको', इसपर हो सकता है। हंसोंके आगमनकी पूर्वता पीछे २।३३२ में बताई जा चुकी है। कलापिनां च आरुतयः पदच्छेद अभीष्ट¹ होनेके कारण 'च' वाले वाक्यका क्रम (स्थान) दूसरा ही उचित है : हंस आए, मयूर गये ।। ५६ ।। तिरपनवेँ श्लोकके उत्तरार्धमें प्रोक्त (३) पादाभ्यास यमकके— (i) एक पादकी एक बार आवृत्तिसे छह भेद होते हैं : (क) प्रथम पादकी (१) द्वितीय पादमें, (२) तृतीय पादमें और (३) चतुर्थ पादमें एक बार आवृत्ति से तीन भेद होते हैं; (ख) द्वितीय पादकी (१) तृतीय और (२) चतुर्थ पादमें एक बार आवृत्तिसे दो भेद होते हैं; (ग) तृतीय पादकी चतुर्थ पादमें आवृत्तिसे एक भेद होता है । इनमें से तीन (क १, ख १, ग १) यमक अव्यपेत होते हैं और शेष तीन व्यपेत होते हैं । इन छह भेदोंके उदाहरण ५७-६२ श्लोकोंमें दिये हैं । (ii) एक पादकी दो बार आवृत्ति से चार भेद बनते हैं : (क) प्रथम पादकी (१) द्वितीय-तृतीय पादोंमें आवृत्तिसे अव्यपेत, (२) द्वितीय, चतुर्थ पादोंमें आवृत्तिसे व्यपेत, (३) तृतीय-चतुर्थ पादोंमें आवृत्तिसे अव्यपेत, कुल तीन तथा (ख) द्वितीय पादकी तृतीय, चतुर्थ पादोंमें² आवृत्तिसे एक अव्यपेत । (क १-२, खके) उदाहरण ६३-६५ में दिए हैं । (iii) एक (प्रथम) पाद की तीन बार आवृत्तिसे एक अव्यपेत चतुष्पाद यमक भेद होता है। उदाहरण ६६वेँ श्लोकमें दिया है । अन्तिम भेदको (५) महायमक भी कहते हैं (श्लोक ७०) । जो दो प्रकारका होता है : (१) समूचे पादमें एक ही वर्णसमुदाय होता है, जो शेष तीन पादोंमें दुहराया जाता है । (२) इससे भी उत्कृष्ट एकाकार चतुष्पाद यमक वह होता है, जिसके प्रथम पादमें भी वर्णसमुदायकी आवृत्ति की होती है । इस प्रकार आवृत्तियुक्त पादकी तीन बार आवृत्ति करनेसे अत्युत्कृष्ट त्रिवाराभ्यास पादावृत्ति यमक निष्पन्न होता है । इसका प्रदर्शन ७१वें श्लोक में किया है ।। १. 'च' से युक्त परवर्ती होता है । अतः 'चारुतया' छेदके अनन्तर 'कला- पिनां च आरुतयः' कहना उचित है । २. तरुण वाचस्पतिने ६५वें श्लोककी व्याख्यामें इसे 'त्रिपादावृत्ति' कहा है । पर वहाँ आवृत्त पाद एक है और आवृत्तियाँ दो हैं । अतः इसे 'पादका द्विरभ्यास' कहना उचित है । 'त्रिपादावृत्ति' कहना उचित नहीं है ।
३।५७-५८] १. यमकके विशिष्ट भेद : (३) पादाभ्यास ७१ ३.१ नमन्दयावर्जितमानसात्मया न मन्दयाऽऽवर्जित-मान-सात्मया । उरस्युपास्तीर्णपयोधरद्वयं मया समालिङ्ग्यत जीवितेश्वरः१ ।।५७।। २. सभासुराणामबलाविभूषिता गुणैस्तवारोहि मृणालनिर्मलैः । सभासुराणामबलाविभूषिता विहारयन्निर्वश सम्पदः पुराम्२ ।।५८।। ३. १ दयासे रहित (कठोर) हृदय वाली, अभागिन (या मन्दबुद्धि), अपनाए हुए मानसे एकाकार बनी हुई मेरे द्वारा झुकता हुआ (अपराधकी क्षमा माँगता हुआ) प्राणेश्वर (उसके) वक्षस्थलपर दोनों पयोधरोंको (दबाकर) फैलाते हुए आलिङ्गित नहीं किया गया ।। ५७ ।। २ तुम्हारे कमलनालके समान शुभ्र गुणोंके द्वारा रमणियों (अप्सराओं) से विभूषित देवताओंकी सभा आरूढ हुई है । इस प्रकारके तुम अलङ्कृत रमणियोंको विहार कराते हुए शोभासम्पन्न शत्रुओंसे विजित नगरियोंकी सम्पदाओंका भोग करो ।। ५८ ।। १. (३. i. क १) अव्यपेत, द्वितीयपादवर्ती, प्रथमपादाभ्यास यमक—कोई मानवती नायिका अपराध क्षमा करानेके लिये अवनत अपने प्रियतमके प्रति मान रखे रहनेपर पछता रही है । यहाँ पूरा प्रथम पाद द्वितीय पादमें दुहराया गया है । अतः यहाँ अव्यपेत पादाभ्यास यमक है । कविने विप्रलम्भरतिकी अभिव्यक्तिके लिये वंशस्थ छन्दका प्रयोग किया है । 'उपास्तीर्ण-पयोधर- द्वयम्' क्रियाविशेषण है । इस समस्त पदकी उपसर्जनीभूत 'उपास्तीर्ण' क्रिया (समुदायके अवयव) से 'उरस्' का आधाराधेय भाव सम्बन्ध समुदायके माध्यमसे है ।३ ५७-६१ श्लोक वंशस्थ छन्दमें निबद्ध हैं ।। ५७ ।। २. (३. i. क २) तृतीयपादवर्ती व्यवहित प्रथमपादाभ्यास यमक—इस श्लोकमें कविने किसी राजाकी प्रशंसा करते हुए उसे आशीः दी है । प्रथम पादके 'अबला विभूषिता' पदोंकी व्याख्या वादीजी, तरुणवाचस्पति और रत्नेश्वर मिश्रने यों की है : जिसमें 'बल' नामक दानव विद्यमान नहीं है, क्योंकि उसे इन्द्रने मार डाला था, इसलिये इन्द्र 'बलभिद्' कहे जाते हैं । १. अन्वयः—दया-वर्जित-मानसात्मया, मन्दयाऽऽवर्जित-मान-सात्मया मया नमन् जीवितेश्वरः उरस्युपास्तीर्ण-पयोधरद्वयं न समालिङ्ग्यत । २. अन्वयः—मृणाल-निर्मलैस्तव गुणैः अबला-विभूषिता सुराणां सभा आरोहि । स विभूषिता अबला विहारयन्भासुराणां पुरां सम्पदः निर्विश । ३. २६वें श्लोकमें 'अलेः समकेशं ते' पर टीका, पृष्ठ ४०, देखें ।
७२ काव्यादर्श [३।५६ ३ कलङ्कमुक्तं तनु-मद्ध्य-नामिका स्तनद्वयी च त्वदृते न हन्त्यतः । न याति भूतं गणने भवन्मुखे कलङ्कमुक्तं तनुमद्वचनामिका¹ ॥५६॥ ३ मधुर वाणी, शरीरके मध्य भाग (कमर) को झुकाने (लचकाने) वाले अर्थात् पृथुल दोनों स्तन तुम्हें छोड़कर किसे नहीं घायल करते ? इसलिये आप जैसोंकी गिनतीमें अनामिका (चिटलीसे दूसरी अँगुली) कलङ्कसे रहित शरीरधारी भूतको नहीं पाती ॥ ५६ ॥ इस प्रकार देवसभा 'अ-बला' है । विभु = प्रभु इन्द्र, बृहस्पति आदि उसमें (उषित) रहते हैं, इसलिये देवसभा 'विभूषिता' है । 'अबला' की यह व्याख्या उचित नहीं है : इन्द्र-शत्रु 'बल' देवसभामें कभी रहा नहीं, जो कि देवसभाको अब उसके मरनेके बाद 'अविद्यमानबला = अबला' कहा जाये । देवसभामें अबलायें = अप्सरायें अलबत्ता रहतीं हैं । राजाको भी नगरियोंमें अबलाओंको विहार करानेको कहा है । इससे धरती की अबलाओंका स्वर्गकी अबलाओंसे सादृश्य व्यक्त होता है । यह एक अतिरिक्त काव्यसौन्दर्य है 'अबला = रमणी' व्याख्यामें, जो 'अबला = बलासुर- रहिता' व्याख्यामें नहीं है । आरोहि — आ + √रुह् + णिच्, कर्मणि लुङ्, प्रथम ए० व० । प्रथम वाक्य कर्मवाच्यमें है एवं द्वितीय कर्तृ वाच्यमें । वामनके अनुसार यहाँ मार्गभेदके कारण वैषम्य दोष है, जो शाब्द समता गुणका विपर्यय है² ॥ ५८ ॥ ३ (३. i. क. ३) चतुर्थपादवर्ती व्यवहित प्रथमपादाभ्यास यमक — इस श्लोक में किसी जितेन्द्रिय (कामजयी) महापुरुषकी अद्वितीयता बताई है । यहाँ प्रथम १. अन्वयः—कलम् उक्तं, तनु-मद्धचनामिका स्तनद्वयी च त्वदृते कं न हन्ति ? अतः हि अनामिका भवन्मुखे गणने कलङ्क-मुक्तं तनुमद् भूतं न याति । २. काव्यालङ्कारसूत्र ३।१।१२ : मार्गभेदः समता । वृत्ति : 'येन मार्गेणो- पक्रमस्तस्यात्याग' इत्यर्थः । ⋯ विपर्ययस्तु यथा — प्रसीद, चण्डि, त्यज मन्युमञ्जसा; जनस्तवायं पुरतः कृताञ्जलिः । किमर्थमुत्कम्पितपीवरस्तनद्वयं त्वया लुप्तविलासमास्यते ॥ यहाँ दो प्रकारका मार्गभेद है : (१) पूर्वार्धके तीनों वाक्य कर्तृ- वाच्यमें हैं; उत्तरार्धमें भाववाच्य है; (२) पूर्वार्धमें असमासा रचना है, उत्तरार्धमें दीर्घसमासा और अल्पसमासा । त्रिपुरहर भूपालने प्रथम मार्गभेद माना है, अभिनवगुप्तने द्वितीय ।
२. द्वितीय परिच्छेद: शब्दालंकार एवं अर्थालंकार विवेचन (उपमा, रूपक, दीपक आदि)
३।६०] १. यमकके विशिष्ट भेद : (३) पादाभ्यास ७३ ४ यशश्च ते दिक्षु रजश्च सैनिका वितन्वतेऽजोपम दंशिता युधा । वितन्वतेजोऽपमदं शितायुधा द्विषां च कुर्वन्ति कुलं तरस्विनः ॥६०॥ ४ हे अजन्मा (विष्णु) के समान, कवचधारी, तीखे आयुधों वाले अर्थात् शूर, शत्रुपंर तेजीसे झपटने वाले सैनिक युद्धके द्वारा दिशाओंमें तुम्हारा यश और धूल फैला रहे हैं । और शत्रुओंके कुल (खानदान अथवा समूह) को शरीर- रहित, तेजके अभावसे युक्त और नष्ट हुए गर्व वाला कर रहे हैं ॥ ६० ॥ पादके चौथे पादमें दुहराये वर्णसमुदायके मध्य दो (द्वितीय और तृतीय) पादोंका व्यवधान है। समूचे पादकी आवृत्ति होनेसे यह 'पादाभ्यास' यमक है। रत्नेश्वरमिश्रने (रत्नदर्पण २।१४४में) 'तनुमधि= शरीरमधिकृत्य' व्याख्या की है । पर शरीरवाची 'तनु' तो नित्यस्त्रीलिङ्ग है । अतः उचित नहीं है । रुद्रटने इस भेदको 'आवृत्तियमक' नाम दिया है ॥ ५६ ॥ ४ (३. i. ख. १) अव्यवहित द्वितीयपादाभ्यास यमक—इस श्लोकमें आचार्य कवि दण्डीने किसी राजाके सैनिकों द्वारा घमासान युद्धसे उसकी कीर्तिके विस्तार और शत्रुओंके प्राणपरित्याग और तेज और गर्वके नाशका वर्णन किया है। यहाँ घटनाओंका क्रम उचित नहीं है : पहले घमासान युद्धका, फिर शत्रुमरण और बच रहे शत्रुओंके तेजोनाश और मानभञ्जनका तथा फिर राजाकी कीर्तिका वर्णन उचित होता । वादी जङ्घालदेव और तरुण वाचस्पतिने 'तरस्विन्'का अर्थ 'वेगवान्' किया है। सैनिकोंके प्रसङ्गमें 'वेगवान्' अर्थकी अपेक्षा 'शूर' अर्थ अधिक उचित है । यहाँ द्वितीय पादकी आवृत्ति तृतीय पादमें की गई है । अतः अव्यपेत द्वितीयपादाभ्यास यमक है । रुद्रटने श्लोकके गर्भ (मध्य) में उपस्थितिके कारण इसे 'गर्भयमक' नाम दिया है ॥ ६० ॥ १. अन्वयः—अजोपम, दंशिताः, शितायुधाः, तरस्विनः सैनिकाः युधा दिक्षु ते यशश्च रजश्च वितन्वते । द्विषां कुलं च वि-तनु, अतेजः, अप-मदं च कुर्वन्ति । २. अमरकोष ३।३।१२८ : वेगि-शूरो तरस्विनौ । 'तरस्'का मूल अर्थ 'वेग' है । वेग विना बलके सम्भव नहीं है । अतः 'तरस्वान्', 'तरस्वी'का परिनिष्ठित अर्थ 'बलवान्' से होते-होते 'शूर' हो गया है । हैमकोष : तरो जवे बले । अमरकोष २।८।१०२ : द्रविणं तरः-सहो-बल-शौर्याणि, स्थाम, शुष्मं च ।। शक्तिः, पराक्रमप्राणौ ।
७४ काव्यादर्श [३।६१-६२ बिभर्ति भूमेर्वलयं भुजेन ते भुजङ्गमोऽमा स्मरतो मदञ्चितम् । शृणूक्तमेकं स्वमवेत्य भूधरं भुजङ्गमो मा स्म रतो मदञ्चितम् ॥ ६१ ॥ स्मरानलो मान-विवर्धितो यः, स निर्वृतिं ते किमपाकरोति ? समन्ततस्तामरसेक्षणे न समन्ततस्तामरसे क्षणेन ॥ ६२ ॥ ५ सर्प (शेषनाग) तुम्हारी भुजाके साथ (मिलकर) भूगोलको धारण करता है । (इस बातको) स्मरण करते हुए मुझसे एक अच्छी बात सुनो— एक (अकेली) अपनी भुजाको पृथिवीका धारक समझकर प्रसन्न हुए तुम प्रभूत गर्व मत करना ॥ ६१ ॥ ६ हे अपनेको म्लान करनेपर तुली हुई, कमलसदृश लोचनों वाली, तुम्हारा कामाग्नि (कामपीडा) मान करनेसे बढ़ गया है । सब तरफसे समान रूपसे (एक साथ) फैला हुआ वह क्षण भरमें तुम्हारे धैर्य (सुस्थिति) को क्यों नहीं दूर कर रहा है ? अर्थात् इस अवस्थाको प्राप्त करके भी तुम मान क्यों नहीं छोड़ रही ? ॥ ६२ ॥ ५ (३. i. ख. २) व्यवहित द्वितीयपादाभ्यास यमक—इस श्लोकमें कविने किसी राजाकी प्रशंसा व्याजस्तुतिसे की है । यहाँ द्वितीयपादकी आवृत्ति तृतीय पादके व्यवधानसे चौथे पादमें की गई है । रुद्रटने इसे 'सन्दष्टक' नाम दिया है । माघने इस यमकका प्रयोग बहुत किया है ॥ ६१ ॥ ६ (३. i. ग) तृतीयपादाभ्यास अव्यपेत यमक—प्रियतमके किसी अपराधपर अत्यन्त तनी हुई मानवती नायिकाके प्रति उसके प्रति हितैषी किसीका कथन उपेन्द्रवज्रा छन्दमें निबद्ध प्रकृत श्लोकमें कविने दिया है । रमणी अत्यन्त सुन्दर है । उसके नयन तामरस (तामरस = जल में रहने से कमल) के समान झूमने वाले हैं । अथवा ताम = चाहतके रससे सराबोर, प्रेमाल है । अथवा प्रियविरहके कारण उनका रस = पानी ताम = म्लान हो गया है, रोते-रोते सूख गया है । वह स्वयं भी तामरसा है : कमलका फूल है, उस जैसी कोमल तथा सुन्दर है । पर अब वह ताम = म्लानतामें रस अनुभव १. अन्वयः—भुजङ्गमः ते भुजेन अमा भूमेर्वलयं बिभर्ति । स्मरतः मत् अञ्चितमेकमुक्तं शृणु । स्वं भुजं भूधरम् अवेत्य रतः चितं मदं मा स्म गमः । २. अन्वयः—तामरसे, तामरसेक्षणे, यः स्मरानलः, मान-विवर्धितः समन्ततः समं ततः, स क्षणेन ते निर्वृतिं किं न अपाकरोति ?
३।६३] १. यमकके विशिष्ट भेद : (३) पादाभ्यास ७५ ७ प्रभावतो नामन, वासवस्य प्रभावतोऽनामन, वाऽऽसवस्य । प्रभावतो नाम न वा सवस्य विच्छित्तिरासीत् त्वयि विष्टपस्य१ ।। ६३ ।। ७ हे तेजोदीप्त इन्द्रको तेजके या यज्ञके कारण नीचा दिखाने वाले तथा लोगोंको पीडासे मुक्ति दिलाने वाले (राजन्), तुम जब लोकके शासक हो, तब निश्चय ही सोमयागोंका (कभी) विच्छेद नहीं हुआ ।। ६३ ।। कर रही है, अपनेको सुखानेपर उतरी हुई है । 'तामरसे, तामरसेक्षणे' इन विशेषताओंसे युक्त सुन्दरियोंके सम्बोधनके एक वचन हैं । स्मरपर अनलका आरोप होनेसे रूपक है । कमल-कोमल-कायाके लिये प्रेम ही आग है । तुम्हारे इस मानने उसे हवा दे दी है : मान स्मराग्निका उद्दीपक हो गया है । तुम प्रेमज्वरसे अङ्गारेके समान दहक रही हो । पर हो तुम बड़ी हठीली ! प्रियके प्रति उद्दाम प्रेम, उसका अपराध, वसन्त, यौवन आदि सब उद्दीपनोंके एक साथ एकत्र उपस्थित हो जानेसे खूब फैला हुआ वह प्रेमाग्नि भी तुम्हारे धैर्य अथवा हठ, क्षण भरमें क्यों नहीं भङ्ग कर पा रहा है ? यही मुझे आश्चर्य है ! बावली, क्षणभरकी भी देर न कर । मान छोड़ । प्रियतमके सङ्गसुखसे कामज्वरकी पीड़ाको दूर कर । व्याख्याभेदके लिए वादी, तरुणवाचस्पति, रत्नेश्वर मिश्र प्रभृतिकी टीकायें देखें । यहाँ पूरे तृतीयपादकी आवृत्ति चतुर्थ पादके रूपमें की गई है । तृतीय- पादावृत्ति पादाभ्यास यमकका और भेद सम्भव नहीं है । श्लोकके अन्तमें आवृत्तिके कारण रुद्रटने इसे 'पुच्छ यमक' नाम दिया है ।। ६२ ।। ७ (३. ii. क. १) द्वितीय-तृतीय-पादावृत्त प्रथमपादाभ्यास अव्यपेत यमक— इस श्लोकमें कविने अपने वर्ण्य राजाको इन्द्रसे दो कारणोंसे अधिक बताया है : इन्द्र की प्रसिद्धि (१) वीरके रूपमें है; (२) शतक्रतुके रूपमें है कि सौ अश्वमेध यज्ञ करनेसे मनुष्य इन्द्र बन जाता है ।२ प्रकृत राजा (१) १. अन्वयः—प्रभाव-तः, न वा आसवस्य, प्रभा-वतः वासवस्य नामन, अना- मन, अतो नाम त्वयि विष्टपस्य प्रभौ न वा सवस्य विच्छित्तिः आसीत् । २. वेदमें इन्द्रका 'शत-क्रतु' नाम प्रसिद्ध है । वहाँ इसका अर्थ इष्ट था : शतं क्रतवः कर्माणि, धियः = सङ्कल्पा वा यस्य, स शतक्रतुः । हस्ते वज्रं भरति, शीर्षणि क्रतुम् (ऋ० २।१६।२), हृत्सु क्रतुं वरुणो, अप्स्वग्निं, दिवि सूर्यमदधात् सोममद्रौ (ऋ० ५।८५।२) । ब्राह्मण कालमें क्रतु
७६ काव्यादर्श [३।६४ ८ परम्पराया बलवारणानां, परम्पराया बलवारणानाम् । धूलीः स्थलीर्व्योम विधाय रुन्धन् परम्पराया बलवा रणानाम् ॥६४॥ ८ सेनाओंको खूब रोकने वाले सेनाङ्ग हाथियोंकी उत्कृष्ट परम्परा (लम्बी कतारों) की धूलको स्थली (टेकड़ी, धरतीका टुकड़ा) बनाकर आकाशको रोकते हुए, युद्धोंके बलको प्राप्त तुम शत्रुके विपरीत गये हो ॥ ६४ ॥ कोश और दण्डके तेजरूपी प्रभावमें२ इन्द्रको नीचा दिखाने वाला है। इन्द्रको अपने कई शत्रुओंके विनाशके लिये पार्थिवोंकी सहायता लेनी पड़ी, पर यह राजा अकेला ही शत्रुविजय करता है। इसके आगे तो 'इन्द्र बापुरो रंक' है। (२) इन्द्रके तो सौ ही यज्ञ हैं; यह राजा तो अविच्छिन्न रूपसे यागपर याग किये जा रहा है; उनकी अभीसे इयत्ता कैसे बताई जाये । इन्द्र तो अधीनस्थोंके लिये आमन=रुजाकारक भी हो जाता है, पर यह राजा अपने अधीनस्थोंको आधिव्याधिसे मुक्त रखनेके कारण 'अनामन' है। उसे 'नामन' और 'अनाम' कहनेसे विरोध अलङ्कार है। यहाँ प्रथम पादकी दो बार (दूसरे और तीसरे पादोंके रूप में) अव्य- वहित आवृत्ति हुई है ॥ ६३ ॥ ८ (३. ii. क. २) द्वितीय-चतुर्थपादावृत्त प्रथमपादाभ्यास अव्यवहित- व्यवहित यमक—प्रकृत श्लोकमें कविने किसी राजाके समरशौर्यका वर्णन उपेन्द्रवज्रा (प्रथम, द्वितीय-चतुर्थ पादोंमें) और इन्द्रवज्रा (तृतीय पाद) की उपजातिमें निबद्ध किया है। बलवा (रणानाम्)—बलं चतुरङ्गिणीं सेनां वृणोति इति वा, वाति इति वा । रत्नश्री और वादी जी ने यहाँ (३. ii. क. ३) द्वितीयपादव्यवहित कर्मार्थक होनेके कारण यज्ञ (विशेष कर्म) अर्थमें रूढ हो गया । पुराणों में आकर यज्ञ करके इन्द्रपदप्राप्ति बताई गई और 'शतक्रतु' नाम इस प्रकार इन्द्रके लिये रूढ हो गया : अथादीक्षत राजा तु हयमेधशतेन सः ।... शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम् ॥... चरमेणाश्वमेधेन यजमाने यजुष्पतिम् । वैन्ये यज्ञपशुं स्पर्धन्नपोवाह तिरोहितः ॥ (श्रीमद्भागवत ४।१६।१,२,११) । निरुक्तके पाँच अध्याय, पृष्ठ २६५ भी देखें । १. अन्वयः—परं बल-वारणानां बल-वारणानां परायाः परम्परायाः धूलीः स्थलीः विधाय व्योम रुन्धन् रणानां बल-वाः परं पराऽयाः । २. स प्रतापः प्रभावश्च यत्तेजः कोशदण्डजम् । अमरकोष २।८।२०
३।६५] १. यमकके विशिष्ट भेद : (३) पादाभ्यास ७७ ६ न श्रद्दधे वाचमलज्ज, मिथ्या भवद्विधानामसमाहितानाम् । भवद्विधानामसमाहितानां भवद्विधानामसमाहितानाम् ॥ ६५ ॥ ६ हे निर्लज्ज, असंयतचित्त, अत्यन्त विषम शत्रु, दोगले-पनसे युक्त आप जैसे लोगोंकी विषम (बिगड़े हुए) नागके समान प्रपञ्चशील संसारमें भेदभाव (फूट) वालोंकी मिथ्या वाणीका मैं विश्वास नही करता ॥ ६५ ॥ प्रथमपादाभ्यास यमक माना है।२ तरुण वाचस्पतिने प्रथम-द्वितीय-चतुर्थ (पादवर्ती तृतीयपादव्यवहित) यमक बताया है। हमने अर्थानुकूलताके कारण यह (तृतीयपादसे व्यवहित) पाठ उचित माना है। तरुण वाचस्पतिने द्वितीयपादव्यवहित त्रिपादावृत्तिका उदाहरण पाठान्तरोंमें खोजनेकी राय दी है। अर्थात् 'धूलोः०' आदि पादको द्वितीय या तृतीय पादके रूपमें रखनेके पाठभेदसे ये भेद प्राप्त हो जाते हैं। रङ्गाचार्य रेड्डीका यहाँ कहना है कि द्विरावृत्तिके तीन उदाहरण अपेक्षित हैं; पर तृतीय उदाहरण उपलब्ध नहीं है; न ही टीकाकारोंने इसका कुछ विवरण किया है; अतः बहुत समयसे तृतीय उदाहरण विच्छिन्न हो गया लगता है। पर इन दोनोंका यह कथन उचित तब होता, जब दण्डीने सब भेदोंके उदाहरण दिये होते। उनकी प्रवृत्ति उपलक्षणपरक है; यह दृष्टि समूचे ग्रन्थमें व्याप्त है। यमकके ही कितने ही भेदोंके उदाहरण उन्होंने नहीं दिये हैं। वादि-तरुण-टीकाओंमें 'व्योम्नि' धृत, व्याख्यात है। इस पाठमें 'रुन्धन्' के कर्मका अध्याहार अपेक्षित है। 'व्योम' पाठमें कोई अतिरिक्त कल्पना अपेक्षित नहीं है। अतः रत्नश्रीधृत 'व्योम' ही उचित है ॥ ६४ ॥ ६ (३. ii. ख) द्वितीय पादका द्विपादाभ्यास अव्यपेत यमक—प्रकृत श्लोकमें कविने किसी मिथ्यावादीके प्रति अपना आक्रोश प्रकट किया है। यहाँ द्वितीय पादकी दो बार (तृतीय और चतुर्थ पादोंमें) आवृत्तिसे यमक निष्पन्न है। द्वितीय पादकी दो बार आवृत्ति, स्पष्ट है, अव्यपेत ही होगी । तरुण वाचस्पतिने इसे 'प्रथम पादके बिना त्रिपादावृत्ति' का उदाहरण बताया है। पर आवृत्ति तो द्वितीय पादकी है, और दो बार है। अतः यहाँ 'त्रिपाद- यमक' तो है, 'त्रिपादावृत्ति' या 'त्रिपादावृत्ति यमक' नहीं है। वे तो अगले श्लोकमें दिये हैं ॥ ६५ ॥ १. अन्वयः—अलज्ज, अ-समाहितानाम्, असमाहितानाम्, भवद्-द्विधानां भवद्विधानाम असमाहितानां भव-द्विधानां मिथ्या वाचं न श्रद्दधे । २. 'धूली...रुन्धन्'को द्वितीय पाद बनानेसे यह भेद बननेसे सब भेदोंके उदाहरण बन जाते हैं।
७८ काव्यादर्श [३।६६-६७ सन्नाहितोमानमराजसेन सन्नाहितोऽमानम राजसे न । सन्नाहितोऽमानम राजसेन सन्नाहितोमानमराजसेन¹ ॥ ६६ ॥ सकृद्, द्विस् त्रिश्च योऽभ्यासः पादस्यैवं प्रदर्शितः । १० हे रजोगुणियोंसे भिन्न (सात्त्विक) लोगोंके स्वामी (उनमें अग्रगण्य), अमित लक्ष्मीसे सम्पन्न, अम (अमित) और अनम (नहीं झुकने वाली) तथा शोभायुक्त सेना वाले, (अङ्कमें) स्थापित उमा (पार्वती) और आ-नम (ईषद् झुके हुए, वक्र) राजा (चन्द्र) के कारण स्वामित्वसे युक्त (अर्धनारी- श्वर और चन्द्रशेखर शिवके समान राजन्), अहितों (शत्रुओं) को सन्न (विपद्ग्रस्त) करने वाले, सन्नाह (कवच) से युक्त होते हुए, मानको प्राप्त सत्पुरुष तुम शोभासम्पन्न नहीं हो, ऐसा नहीं है ॥ ६६ ॥ इस प्रकार पादकी (i) एक बार, (ii) दो बार और (iii) तीन बार आवृत्ति दिखला दी है । १० (३. iii) प्रथम पादका त्रिपादाभ्यास अव्यपेत यमक — प्रकृत श्लोकमें कविने किसी राजाका गौरवयुक्त वर्णन किया है। यहाँ प्रथम पादकी आवृत्ति अगले तीन पादोंमें हुई है । इससे यह अव्यपेत यमक है । दुष्करता तो स्वतः स्पष्ट है । इसे भरतने 'चतुर्व्यवसित' यमक नाम दिया है और रुद्रटने 'पङ्क्तियमक' नाम दिया है² ॥ ६६ ॥ (३) पादाभ्यास यमकका उपसंहार—तिरपनवें श्लोकके उत्तरार्धमें प्रतिपादित (३) पादाभ्यासयमकके (i) एक बार, (ii) दो बार और (iii) तीन बार आवृत्तिसे प्रतिपादित ११ भेदोंमें से निम्नलिखित १० भेदों को उदाहरणोंसे प्रदर्शित किया गया है : (i) एक (प्रथम) पादकी एक बार आवृत्तिसे निष्पन्न सभी छह भेदोंके उदाहरण ५७-६२ में, (ii) एक पादकी दो बार आवृत्तिके कारण सम्पन्न चार भेदोंमेंसे तीनके उदाहरण ६३-६५में और (iii) एक पादकी तीन बार आवृत्तिसे सम्पन्न एक भेदका उदाहरण ६६वें श्लोकमें दिया है । इस प्रकार कुल ११ भेदोंमेंसे १० भेदोंके उदाहरण आचार्यने १. अन्वयः - अ-राजसेन, अमान-म, अमानम-राज-सेन, आहितोमाऽऽनम- राज-सेन, सन्नाहितः, सन्नाहितः, मानं हितः, सन्ना (त्वं) न न राजसे । २. सर्वे पादाः समा यत्र भवन्ति नियताक्षराः । चतुर्व्यवसितं नाम विज्ञेयं तद् बुधैर्यथा ॥ नाट्य० १६।८२ सर्वैः सार्धं युगपत् प्रथमस्य तु जायते पङ्क्तिः ॥ काव्याल० ३।१०
३।६७-६८] १. यमकके विशिष्ट भेद : (४) श्लोकाभ्यास ७६ ४. श्लोकद्वयं तु युक्तार्थं श्लोकाभ्यासः स्मृतो, यथा ॥ ६७ ॥ विनायकेन भवता वृत्तोपचितबाहुना । स्वमित्रोद्धारिणा भीता पृथ्वीयमतुलाऽऽश्रिता ॥ ६८ ॥ (४) युक्त (एक-दूसरे के अनुरूप, या परस्पर सम्बद्ध) अर्थ वाले दो श्लोक श्लोककी आवृत्ति (वाला यमक होता) है ॥ ६७ ॥ (दुष्टोंको) विनीत करने (और सज्जनोंको सन्मार्गपर ले जाने) वाले, गोल और पुष्ट भुजाओं वाले, अमित्रों (शत्रुओं) को सु (भलीभाँति) उखाड़ने वाले आपके द्वारा भयरहित हुई, यह अनुपम पृथिवी अधिष्ठित है ॥ ६८ ॥ प्रस्तुत किये हैं । (ii. क. ३) प्रथम पादकी तृतीय चतुर्थ पादोंमें (द्वितीय पादसे व्यवहित) आवृत्ति का उदाहरण नहीं दिया है। ६४वें श्लोकका रत्नश्री और वादिटीकासम्मत पाठ यदि माना जाता है, तो (ii. क. २) प्रथम पादकी दूसरे और चौथे पादोंमें आवृत्ति वाला उदाहरण नहीं है। ६४वें श्लोकके द्वितीय या तृतीय पादको इधर उधर करके पढ़नेसे इसीमें दोनों भेद निष्पन्न हो जाते हैं । (४) श्लोकाभ्यास यमक—जिस प्रकार पादाभ्यास या अर्धाभ्यास यमक में अभ्यस्त पादोंका अर्थ परस्पर युक्त होता है, मुख्य प्रतिपाद्यसे उसकी एकवाक्यता होती है, वैसे ही यहाँ भी जाति या वृत्तमें निबद्ध चतुष्पदीरूप श्लोककी आवृत्तिसे 'श्लोकाभ्यास' नामक यमक सम्पन्न होता है । आवृत्त श्लोकका अक्षरानुपूर्वीसाम्य 'आवृत्ति' कहनेसे तथा प्रकरणसे स्वतः प्राप्त है। युक्तार्थता भी पादाभ्यास आदिके समान स्वतः प्राप्त है। अतः 'युक्तार्थं' विशेषणसे यहाँ कोई अपूर्वका विधान नहीं किया है। इसे प्राप्तका 'स्पष्ट- प्रतिपत्त्यर्थ किया अनुवाद' ही कहा जा सकता है। यदि यह विधेय माना जाता है, तो पादाभ्यास और अर्धाभ्यास यमकोंमें भी इसे दिया जाना चाहिये। यमकमें अर्थानुसन्धानकी अपेक्षा दण्डीने बताई ही कहाँ है ? तरुण वाचस्पतिने इससे पदभेदसे पाठकी व्यावृत्ति मानी है¹। 'पदभेदसे पाठ' से 'विषम वर्णानुपूर्वी वाला पदभेद' तो यमकविरोधी होनेसे सम्भव नहीं है। यदि सभङ्ग शब्दश्लेषके समान पदभेद अभिप्रेत है, तो वह तो होता ही है ॥६७॥ श्लोकाभ्यासयमकमें आवर्त्य श्लोक—प्रकृत श्लोकमें कविने अपने वर्ण्य राजाके अमित तेजका वर्णन किया है । राजाके मुख्य कर्तव्य होते हैं : दुष्ट- दमन, भुजबलसे शत्रुओंका उच्छेद । इस प्रकार निर्भय (निष्कण्टक) पृथिवी (राज्य) समृद्धिसे स्वतः अतुलनीय हो जाती है ॥ ६८ ॥ १ . युक्तार्थं परस्परसम्बद्धार्थम् । अनेन पदभेदपठितं व्यावर्तयति ।
८० काव्यादर्श [३।६६-७० विनायकेन भवता वृत्तोपचित-बाहुना । स्वमित्रोद्धारिणाऽभीता पृथ्वी यमतुलाऽऽश्रिता ॥ ६६ ॥ ५. एकाकारं चतुष्पादं तन्महायमकद्वयम् । तत्रापि¹ दृश्यतेऽभ्यासः, सा परा यमक-क्रिया ॥ ७० ॥ विगत हुए नायकों (सामन्त, सेनानायकों) वाले, समाप्त हो चुके (वृत्त) पुष्ट भुजाओंसे युक्त पुरुषों वाले, अपने परित्यागकर्ता मित्रों वाले शत्रुके द्वारा यमराजके तराजूके रूपमें अभिमत (शत्रुको मौतके पलड़ेके समान प्रतीत होती) पृथ्वीको आपने अधिष्ठित किया है ॥ ६६ ॥ एक (समान) आकार (वर्णविन्यास) वाला चार पादों का समूह (पीछे बताया) है । वह 'महायमक' नाम वाला होता है । उस (एकाकार पाद) में भी आवृत्ति देखी जाती है । वह सर्वोत्कृष्ट यमकरचना होती है ॥ ७० ॥ श्लोकाभ्यास यमकमें आवृत्ति श्लोक—प्रकृत श्लोकमें पिछले श्लोक की ही आवृत्ति की गई है । अर्थ भिन्न है । यदि आवृत्ति नहीं की जाती है, तो इन दो अर्थोंकी प्रतिपत्ति श्लेषके द्वारा हो जाती है । इस प्रकार यह यमक श्लेषके आश्रय पदोंकी आवृत्तिका नाम है और श्लेषका परिपन्थी है । वृत्तोपचितबाहुना — √वृत् + क्त = 'वृत्त' शब्द 'गोल', 'मृत', 'समाप्त' आदि नाना अर्थों में है । उपचिताः पुष्टा बाहवो येषाम्, ते, वृत्ताः उपचित- बाहवो यस्य, तेन । वादी जी, तरुण वाचस्पति आदिने 'बाहु' शब्दको बाजू जैसे भाई-बन्दोंका उपलक्षक माना है ।² स्वमित्रोद्धारिणा — उज्जहतीति उद्धानि — उद् + √हा + क या विच् ।³ स्वमित्राणि उद्धानि यस्य, स स्व-मित्रोद्धः, स च अरिः स्वमित्रोद्धारिः, तेन । अभीता — अभि + √इ + क्त (कर्मणि) + टाप् ॥ ६६ ॥ ५. 'महायमक' — (३. iii) त्रिपादाभ्यासयमकका विशिष्ट भेद : प्रथम पादकी तीन बार आवृत्तिसे चतुष्पदी रूप पूरा पद्य वर्णसमुदायकी १. रत्नश्रीमें 'तस्यापि' पाठ धृत व्याख्यात है । इसके अनुसार महायमककी आवृत्ति प्राप्त होती है, जिसमें एकाकार आठ पाद होंगे । पर दण्डीने आगे जो उदाहरण दिया है, उससे इसकी पुष्टि नहीं होती । भोजके कथनसे भी यहाँ 'तत्रापि' पाठकी ही पुष्टि होती है । भोज और दण्डीमें पर्याप्त एकवाक्यता है । आगे टीका देखें । २. उपचितं (चितासमीपे) वृत्ताः (स्थिता) बाहवो (ज्ञातयो) यस्य, तेन । 'बाहु'-शब्दो लक्षण्या ज्ञातिषु प्रयुक्तः । 'हत-ज्ञातिना' इति यावत् । ३. 'आतश्चोपसर्गे' (अष्टा० ३।१।१३६) से 'क' या 'अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते' (३।२।७५) से 'विच्' ।
३७०] १. यमकके विशिष्ट भेद : (५) महायमक ८१ दृष्टिसे एक ही आकार वाला है । इस भेदको काव्यशास्त्री 'महायमक' कहते हैं । आवृत्त होने वाले एक ही पादमें अव्यपेत या व्यपेत प्रकारकी एक बार या अधिक बार आदि, मध्यादि स्थानोंमें आवृत्ति करके इस एकाकार चतुष्पादरूपी महायमकको और भी उत्कृष्ट बनाया जा सकता है । इस प्रकार महायमकके दो प्रकार हैं : (१) एक पादकी तीन बार आवृत्तिसे युक्त सादा चतुष्पाद यमक; (२) आवृत्त होने वाले पादमें भी पादांशकी आवृत्ति होती है । यह दूसरा भेद अत्युत्कृष्ट यमक होता है । महाकवियोंने प्रथम प्रकारके यमकका तो इक्का-दुक्का प्रयोग किया है,१ पर दूसरे भेदका प्रयोग हमें सुलभ नहीं हुआ । भरतमें भी 'चतुर्व्यवसित' नाम से और रुद्रटने 'पङ्क्ति' नामसे अभिहित इस महायमकके प्रथम प्रकारपर लागू होने वाला उदाहरण ही दिया है ।२ महाराज भोजने एकाकार चतुष्पाद यमक और श्लोकाभ्यास यमकको 'महायमक' नाम दिया है ।३ श्लोकाभ्यास यमक को 'महायमक' बतानेमें भोजका मत दण्डीसे पृथक् है । एकाकार चतुष्पाद यमकमें भोजने पादको पुनः अभ्यासके योग्य भी बताया है । इस अंशमें भोजने दण्डीका अनुकरण किया है । उनके आशयको विस्पष्ट रूपसे प्रस्तुत किया है रत्नेश्वर मिश्रने : एकाकारता दो प्रकारसे होती है—(१) चार आवृत्तियोंसे, (२) आठ (अर्थात् पादार्धोंकी) आवृत्तियों से ।४ उत्कृष्ट १. किरातार्जुनीय १५।१२ : विकाशमीयुर्जंगतीशमार्गणाः । भट्टिकाव्य १०।१६ : सर्वयमकम्—बभौ मरुत्वान् विकृतः समुद्रः । २. सर्वे पादाः समा यत्र भवन्ति नियताक्षराः । 'चतुर्व्यवसितं' नाम विज्ञेयं तद् बुधैर्यथा ।। नाट्य० १६।८२; ८३ : सावारणानामयमेव कालः...।। काव्यालङ्कार ३।१२ : सभाजनेनोपरि पूरितासो ...।। ३. एकाकारं चतुष्पादं महायमकमुच्यते । श्लोकाभ्यासश्च, तत्राद्यं पुनरभ्यासमर्हति ।। सरस्वती० २।६७ ४. द्विविधमेकाकारं भवति—(१) एकमावृत्तिचतुष्केण, (२) अपरमावृत्त्यष्ट- केन । तदिदमुक्तम्—'आद्यं पुनरनावृत्तम्'* इति । प्रतिपादमवान्तरा- वृत्तिभेदेनैवाष्टकनिर्वाहात् । * यहाँ 'अनावृत्तं' से मूलविरोधी तथा भोजके चतुर्थपादके अनुकूल सप्तम अक्षरके लघु न होनेके कारण भोजोक्तिको उद्धृत नहीं किया गया है । अपितु यह अपने 'एकं०' कथन का स्पष्टीकरण है कि इस प्रथम भेदमें अवान्तर आवृत्ति नहीं होती ।
८२ काव्यादर्श [३७१ स-मानयाऽसमानयाऽसमानयासमानया । समान-यास-मानया समानयासमानया ॥ ७१ ॥ मानवती, अनुपम, असम (विषम कामदेव) की अनीतिके कारण विषम (सङ्कटापन्न) प्राणों वाली (अर्थात् विप्रलम्भके कारण अत्यन्त कष्टावस्थाको प्राप्त), समान कामजन्य खेद और मान वाली इस प्रियासे मुझे मिला दे हे मेरे ऐसे अद्भुत (मित्र) ॥ ७१ ॥ महायमक (एकाकार चतुष्पाद यमक) का उदाहरण भोजने दण्डी वाला (७१वाँ श्लोक) ही दिया है । भट्टिके व्याख्याता जयमङ्गलने एकाकार चतुष्पाद यमक (प्रथम भेद) को 'सर्वयमक' कहा है तथा श्लोकाभ्यास यमक को 'महायमक' ।१ स्पष्ट ही यह भोजानुसृत परम्पराके अनुकूल है । रत्नश्रीज्ञानने एक पादकी तीन बार आवृत्ति वाले पादाभ्यास यमकसे आन्तरिक आवृत्तिसे निष्पन्न एकाकार पादकी तीन बार आवृत्तिसे सम्पन्न चतुष्पाद महायमकको पादके भीतरकी आवृत्तिके कारण भिन्न माना है ।२ अर्थात् वे इन दोनोंको पृथक्-पृथक् मानते हैं । तरुण वाचस्पतिने एकाकार चतुष्पाद यमकके ऊपर बताये प्रथम भेदको 'महायमक' माना है और आवृत्ति- गर्भित पादकी तीन बार आवृत्ति (अर्थात् आठ पादार्धों) वाले यमकको 'पर यमक' माना है । इन सबमें भोज और रत्नेश्वर मिश्रकी व्याख्या ही युक्तियुक्त है ॥७०॥ (३. iii. २) आवृत्तिगर्भित महायमक—प्रकृत श्लोकमें किसी पुरुषकी रूठी हुई प्रियाके प्रति विप्रलम्भरतिका चित्रण किया गया है । वर्ण्य पुरुषने उसे अत्यन्त प्रेम करने वाली इसलिये विरहकृश किन्तु प्रियकी किसी गलती पर मानकरके बैठी हुई प्रियाको मनाकर उससे मिलानेकी प्रार्थना अपने किसी नर्मसचिव मित्रसे की है । १. जयमङ्गला १०।१६ : 'सर्वयमकम्' इति चतुर्णामपि पादानां सदृशत्वात् । २०-२१ : 'महायमकम्' इति श्लोकस्यैकस्य द्वितीयेन श्लोकेन यमित- त्वात् । २. रत्नश्री २।७० : एकाकार-चतुष्पादत्वं प्रत्येकं सर्वतो यमक-योगाद् विनाऽभ्यासादपि सम्भवतीत्याह—'तस्यापि' इत्यादि । तस्यापि = महायमकस्यापि न केवलं समूहादेः, अभ्यासः त्रिपादावृत्तिर्दृश्यते ।...अत एवेदं त्रिपादाभ्यासाद् भिद्यते । तत्र प्रत्येकं पादेषु सर्वतो यमकाभावात् केवलं पाद-यमक-मात्रं त्रिरभ्यस्यते ।
३७२] १. यमकके विशिष्ट भेद : (६) यमक-सङ्कर ८३ ६. धराधराकारधरा धराभुजाम्भुजा महीं पातुमहीनविक्रमाः । क्रमात् सहन्ते सहसा हतारयो रयोद्धुरा मानधुरा वलम्बिनः १ ॥७२॥ ६. पृथ्वीको धारण करने वाले (शेष नाग) का आकार धारण करने वाली, हीनसे इतर (श्रेष्ठ) पराक्रमसे युक्त, बलसे अथवा वेगसे शत्रुओंको नष्ट कर चुकी, वेगसे अग्रगामी, मानरूपी धुरी वाली, (लोगों के लिये) आश्रय वाली पृथ्वीपतियोंकी भुजाएँ पृथ्वीकी रक्षा शास्त्रोचित मार्गसे करनेमें समर्थ हैं ॥ ७२ ॥ यहाँ प्रथमपादकी अव्यपेत आवृत्ति अगले तीन पादोंमें की गई है । इस- लिये यह त्रिरावृत्त प्रथम पादाभ्यास अव्यपेत यमक है । आवृत्त पादके आठ अक्षरोंमें भी चार वर्णों (अक्षरों) 'समानया' की एक बार अव्यवहित आवृत्ति हुई है । इस कारण यह साधारण महायमकसे उत्कृष्ट है । त्रिरावृत्त पादाभ्यास यमकका ही दूसरा नाम 'महायमक' है । पादके आदिम दो अक्षरों 'समा' को पादके मध्यमें व्यपेत आवृत्ति है । पादमध्यगत 'नया' की पादान्तमें व्यपेत आवृत्ति है। पादादिगत चार अक्षरों 'समानया' की पादान्तमें अव्यपेत आवृत्ति है । इस प्रकार सारे श्लोकमें 'व्यपेताव्यपेतयमक' स्थित है। इस अव्यपेतव्यपेतावृत्तिगर्भित महायमककी रचना शब्द-शिल्पी कवि कलाकारोंके लिये एक दुष्कर चुनौती है । दण्डीने इस चुनौतीका सरस उत्तर इस उदाहरणसे सफलतापूर्वक दिया है । महाराज भोजने भी इस उदाहरणसे ही काम चलाया है ॥ ७१ ॥ (६) यमक-सङ्कर—प्रकृत श्लोकमें कविने पृथ्वीकी रक्षा करनेमें समर्थ भुजाओंकी विशेषता बताकर उत्साहका उद्दीपन विभाव प्रस्तुत किया है । कविने वीरोंकी भुजाओंका वर्णन स्थूलसे सूक्ष्मकी ओर जाते हुए किया है : पहले भुजाओंका स्थूल आकार बताया है कि वे पृथ्वीको धारण करने वाले का आकार धारण करती हैं । अर्थात् इन्हें देखनेसे ही लगता है कि ये धरा- धारणसमर्थ हैं । 'धराधर' का दूसरा अर्थ है : शेष नाग । उसका आकार है स्थूल एवं लम्बा । भुजाएँ भी स्थूल एवं लम्बी हैं । इस विशेषणमें श्लेष और लुप्तोपमा है । भुजाओंके स्थूल आकारको देखनेके बाद 'अहीनविक्रमाः' से उनकी पराक्रमशालिताकी प्रतीति बताई है : ये भुजाएँ अत्यन्त पराक्रमी हैं । इनका पराक्रम शत्रुओंके विनाशसे सिद्ध हो चुका है । युद्धस्थलमें शत्रुओंपर १. तरुण० : विक्रमात् । वादी : धीरधुराव लम्बिनः ।
८४ काव्यदर्श [३।७२ लपालप चलने वाली भुजाएं जैसे मानको वहन करने वाला अक्षदण्ड हैं । लोगोंको इनका बड़ा सहारा मिलता है। निश्चय ही धराका भोग (पालन और सुखलाभ) करने वाले लोगोंकी भुजायें ऐसी होती हैं । यहाँ (१) 'धरा' शब्दकी आवृत्ति प्रथम पादके आदिमें और (२) मध्यमें अव्यवहित रूपसे दो बार हुई है । (३) 'धराधरा' की व्यवहित रूपसे हुई है। (४) प्रथमपादान्तके 'भुजाम्' की, द्वितीय पादान्तके 'क्षमा' की, तृतीयपादान्तके 'श्यो' की अगले पादोंके आदिमें अव्यपेत आवृत्तिसे भरतका 'चक्रवाल' तथा दण्डीका 'सन्दष्ट' यमक (द्र० श्लोक ५१-५२) निष्पन्न हुआ है । (५) द्वितीय पादके मध्यमें स्थित 'मही' की मध्यमें ही दो अक्षरोंके व्यवधानसे आवृत्तिसे पादमध्य व्यपेत यमक है । (६) तृतीय पादके प्रथम भागके अन्तमें स्थित 'सह' की मध्य भागमें एकाक्षर व्यवहित आवृत्ति है, तथा यदि ह्रस्व, दीर्घमें वर्णभेद न मानें, तो (७) मध्यके 'सह' की पादान्तके आदिमें 'साह' के रूपमें अव्यवहित आवृत्ति है । (८) चतुर्थ पादके आदिभागके अन्तकी ओर स्थित 'धुरा' की पादमध्यमें अक्षरद्वयव्यवहित आवृत्तिसे आदि- मध्य व्यवहित यमक है । इस प्रकार यहाँ एक पद्यमें ८ यमकोंका मिश्रण है । इनमेंसे १-३ में परस्परोपकार्योपकारक भाव सम्बन्धसे अङ्गाङ्गिभाव सङ्कर है । ६-७ में निरपेक्षता है । चारों पादोंमें वर्तमान होनेसे ४ सन्दष्ट यमक सबमें चारुत्वकी दृष्टिसे मुख्य है । शेष यमक परस्परसङ्कीर्ण और परस्पर तुल्यबल हैं । अतः श्लोकमें अधिक प्रभाव सङ्कीर्ण और असङ्कीर्ण यमकोंकी संसृष्टिका है । इस प्रकार यह श्लोक तृतीय श्लोकोक्त सम्भेदयोनि यमकोंका उदाहरण है । मानधुरा वलम्बिनः—मानस्य धुरः = मानधुराः, मान+धुर्+अ (समासान्त) १+टाप्, प्रथमा बहुवचन । भुजाओंपर मानधुराओंका आरोप है । 'धुर्' नित्य स्त्रीलिङ्ग है, अतः 'मानधुराः' भी स्त्रीलिङ्ग है । उपमेय 'भुज' स्त्री-पुं-लिङ्ग है : भुजा, भुज ।२ 'अव' के आदिम 'अ' का भागुरिके मत में लोप होनेसे 'वलम्बिनः' है । अन्य लोगोंने 'मानधुरावलम्बिनः' को समस्त पद माना है । पर इससे अर्थमें कोई विशेष शोभा नहीं आती । दोनोंको पृथक् करनेसे 'भुजा मानधुरा' रूपक या वाचकलुप्ता उत्प्रेक्षा निष्पन्न हो १. अष्टाध्यायी ५।४।७४ : ऋक्पूरब्धूःपथामानक्षे । २. अमरकोष २।६।७६-८० : द्वौ परौ द्वयोः ॥ भुजबाहू, प्रवेष्टो, दोः स्यात् । मेदिनी ८।१२-१३ : अथो भुजा ।। द्वयोर्बाहौ करे ।
३।७३] १. यमकके विशिष्ट भेद : (७) प्रतिलोम यमक ८५ ७. आवृत्तिः प्रातिलोम्येन पादार्ध-श्लोक-गोचरा । यमकं प्रतिलोमत्वात् प्रतिलोममिति स्मृतम् ॥ ७३ ॥ ७. (पद्यके १) पाद, (२) अर्धाली एवं (३ पूरे) पद्यको विषय बनाने वाली उलटे क्रमसे (वर्णोंकी) आवृत्ति प्रतिलोम (उलटा) होनेके कारण 'प्रतिलोम' कहलाती है ॥ ७३ ॥ जाती है तथा भुजाओंका आश्रयदातृत्व गुण अतिरिक्त कहा जाता है । नित्य- स्त्रीलिङ्ग पदका उपमेय किसी भी लिङ्गका पद हो सकता है । अतः 'भुजाः' पुँल्लिङ्ग भी हो सकता है । अथवा '०धुराः' के स्त्रीलिङ्ग विशेष्य और 'वलम्बितः' के पुँल्लिङ्ग विशेष्यके रूपमें 'भुजाः' को 'भुजा' और भुजाओं' का एकशेष मानकर दोनोंसे अन्वित किया जा सकता है । अथवा रुद्रटोक्त लिङ्गश्लेष भी हो सकता है ॥ ७२ ॥ ७. प्रतिलोम यमक—पीछेके उदाहरणोंमें दिये यमकोंमें वर्णोंकी आवृत्ति अनुलोम क्रमसे होती है । इस दृष्टिसे वे सब अनुलोमयमक हैं । इनके विपरीत जब पद्यके वर्णसमुदायकी प्रतिलोम (उलटे) क्रमसे आवृत्ति की जाती है, तब यह प्रतिलोम यमक होता है । यह आवृत्ति (क) पद्यके सबसे छोटे अंश पादसे लेकर (ख) पद्यके अर्ध तथा (ग) पूरे श्लोकमें व्याप्त होती है । अतः यह यमक (क) पादप्रतिलोम (ख) पद्यार्धप्रतिलोम और (ग) श्लोकप्रति- लोम यमक नामक तीन भेदोंमें निष्पन्न होता है । स्पष्ट है कि यह यमक दुष्कर होता है । विशुद्ध तकनीकी दृष्टिसे यदि देखा जाये, तो प्रतिलोम यमकके भी पदके (i) अन्त, (ii) मध्य और (iii) आदि प्रभृति स्थानोंमें प्रतिलोम आवृत्तिसे यमक निष्पन्न हो सकते हैं । पर वे उतने हृदयावर्जक नहीं होंगे । अतः लगता है दण्डीने उन्हें नहीं बताया है । महाकवि भारवि और माघने तीनों प्रकारके प्रतिलोम यमकोंका प्रयोग किया है । प्रतिलोम यमकका इतिहास— यह भरतमें उपलब्ध नहीं है । पादादि प्रभृति स्थानोंमें शब्दका अभ्यास अनुलोम होना चाहिये, या प्रतिलोम, यह यद्यपि भरतके लक्षणमें उक्त नहीं है, तथापि उन्होंने यमकके सब दश भेदोंके उदाहरण अनुलोम आवृत्तिके ही दिये हैं, प्रतिलोम आवृत्तिका एक भी स्थल नहीं है । इससे सिद्ध होता है कि भरतको प्रतिलोम यमक अभीष्ट नहीं हैं । भामहने यमकके भेदोंमें प्रतिलोमका विधान तो किया ही नहीं है, वे काव्यमें दुष्कर अलङ्कारोंके अत्यन्त विरोधी हैं । अतः न केवल प्रतिलोम यमक, अपितु चित्रबन्धोंके समर्थनकी आशा भामहसे नहीं है ।
८६ काव्यादर्श [३।७३ उपलब्ध काव्यशास्त्रियोंमें दण्डी ही प्रथम आचार्य हैं, जिन्होंने नानाविध दुष्कर अलङ्कारोंका सुन्दर, व्यवस्थित और परिमार्जित निरूपण इन्हें अलङ्कार की सम्भव गरिमा प्रदान करते हुए किया है । काव्यशरीरमें शब्दालङ्कारोंको महत्त्व देकर संस्कृत काव्यमें पच्चीकारी को कलाके स्तरकी ओर उन्मुख करने वाले महाकवियोंमें भारवि, माघ और भट्टिके नाम उल्लेख्य हैं : भारविने (१) न केवल दुष्कर यमकोंका पर्याप्त प्रयोग किया है, अपितु (२) प्रतिलोम यमकके भी तीनों भेदोंका सुन्दर प्रयोग किया है ।१ इससे प्रतीत होता है कि भारविसे पूर्वके महाकवियों और काव्य- शास्त्रियोंमें यमकके ये भेद प्रसिद्ध हो चुके थे । दण्डीने उनका प्रसिद्ध स्वरूप ही निरूपित किया है । (३) भारविने विविध प्रकारके दुष्कर बन्धोंका तथा एकाक्षर, द्वयक्षर, और अतालव्यादि दुष्कर श्लोकोंका भी प्रणयन किया है ।२ भारवि इस पच्चीकारीके ज्ञात प्रथम कलाकार महाकवि हैं । माघ तो उनके नक़लची हैं । भारवि और माघने (१) यमकों, चित्रबन्धों और एकाक्ष- रादिका प्रणयन एक ही प्रकरणमें मिश्रित रूपमें किया है ।३ (२) माघ तक १. (क) वेत्रशाककुजे शैलेऽलेशैजेऽकुकशात्रवे । यात किं विदिशो जेतुं तुब्जेशो दिवि किं तया ।। किराता०१५।१८ (ख) ननु हो मथना राघो घोरा नाथमहो नु न । तयदातवदा भीमा माभीदा बत दायत ॥ २० (ग) निशितासिरतोऽभीको न्येजतेऽमरणा रुचा । सारतो न विरोधी नः स्वाभासो भरवानुत ॥ २२ तनुवारभसो भास्वानधीरोऽविनतोरसा । चारुणा रमते जन्ये कोऽभीतो रसिताशिनि ॥ २३ २. किरातार्जुनीय, एकाक्षर पाद १५।५, एकाक्षर श्लोक १४, द्वयक्षर श्लोक ३८, निरोष्ठ्य श्लोक ७, २६, आद्यन्तयमक ३७, पादादियमक १०, पादाद्यन्तयमक ३१, पादान्तादियमक ८, द्वि-चतुर्थपादयमक ३५, शृङ्खलायमक ४२, समुद्गयमक १६, महायमक ५२, पादप्रतिलोम १८, अर्धप्रतिलोम २०, श्लोकप्रतिलोम २२-२३, गूढचतुर्थपाद ४, अर्थ- त्रयवाचक ४५, गोमूत्रिकाबन्ध १२, सर्वतोभद्र २५, अर्धभ्रमरक २७ । ३. शिशुपालवध एकाक्षरपाद १६।३, द्वि-चतुर्थपादाभ्यास यमक ५, १७, १६, २१, २५, ३१, ३८, ४२, ४८, ५०, ५२, ५४, ५६, ६४, ७४, ७६ ७८, ८०, ८२, निरोष्ठ्य श्लोक ११, सन्दंशयमक १३, विषमपादादि-
३७३] १. यमकके विशिष्ट भेद : (७) प्रतिलोम यमकका इतिहास ८७ आते-आते इन अलङ्कारोंमें तुलनात्मक उत्तमाधमत्वकी दिशा निर्धारित हो चुकी थी : उन्होंने चित्रबन्धोंको सर्वाधिक विषम (काव्यको दुरूह बनाने वाला) बताया है।¹ माघके इस कथनका एक फलितार्थ और भी है : वे आनन्दमात्र प्रयोजन वाले काव्यमें दुष्कर विधानसे विषमता लाना उचित नहीं समझते । भले ही भारविकी प्रतिद्वन्द्वितामें उन्होंने अपने ही काव्यको विषम बनानेसे बचनेका प्रयास नहीं किया : अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता । महाकवि भट्टिने अपने महाकाव्य 'रामचरित' के दशम सर्गमें अनुप्रास और यमक शब्दालङ्कारों तथा दीपक आदि अर्थालङ्कारोंका प्रशस्त प्रदर्शन किया है । उसमें उन्होंने (१) यमकके २० भेदोंके उदाहरण दिये हैं, जो भरत और भामहके भेदोंसे अधिक एवं भिन्न प्रकारके हैं, किन्तु दण्डीकी चिन्तनपरम्पराके अनुकूल हैं।² (२) भट्टि दुष्करतामें एकाकार चतुष्पाद, समपादान्त यमक २३, सर्वतोभद्रबन्ध २७, मुरजबन्ध २६, श्लोक प्रति- लोम ३३-३४, ६० पादादि व्यपेत यमक ३६, पादप्रतिलोम ४०, अर्धप्रतिलोम ४४, ८८, गोमूत्रिकाबन्ध ४६, समुद्गयमक ५८, ११८, प्रथम-तृतीय-पादादि यमक ६०, सजातीय चतुष्पादाद्यन्तादि व्यपेत यमक ६२, द्व्यक्षर श्लोक, ६६, ८४, ८६, ९४, ९८, १००, १०२, १०४, १०६, १०८, अर्धभ्रमक ७२, विषमान्त समान्त यमक ६२, गूढ चतुर्थपाद ६६, अतालव्य श्लोक ११०, विषमपादमध्य समपादान्त सजातीय यमक ११२, एकाक्षर श्लोक ११४, अर्थत्रयवाची ११६, चक्रबन्ध १२० । १. विषमं सर्वतोभद्र-चक्र-गोमूत्रिकाऽऽदिभिः । श्लोकैरिव महाकाव्यं व्यूहैस्तदभवद् बलम् ।। माघ १६।४१ २. भट्टिकाव्य, विषमपाद यमक १०।१०, समपाद यमक २, पादान्त अव्यपेत चतुष्पाद्यमक ३, पादादि अव्यपेत चतुष्पादयमक ४, पादमध्याव्यपेत चतुष्पाद यमक ५, चक्रवाल यमक ६, समुद्ग ७, काञ्ची ८, यमकावली (अव्यपेत आदियमक अन्त्यमक माला) ९, पादाद्यन्त विजातीय चतुष्पाद यमक ११, तृतीय चतुर्थ पाद (जयमङ्गल — मिथुन-) यमक १२, चतुष्पादादि (वृन्त) यमक १३, चतुष्पादान्त सजातीय (पुष्प-) यमक १४, एकपादादि-मध्य-व्यपेत विजातीय १५, प्रथम चतुर्थपादाभ्यास १६, एकपादमध्यान्त यमक १७, द्वि-तृतीयपादाभ्यास (गर्भ) यमक १८, महायमक (सादा) १९, श्लोकाभ्यास २०-२१, प्रथम पादादि अव्यपेत चतुर्थपादान्त अव्यपेत विजातीय यमक २२ ।