भारतकोश
काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

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पृष्ठ 90

३।५४] १. यमकके विशिष्ट भेद : (२) समुद्ग ६७ २. १ ना स्थेयस्सत्त्वया वर्ज्यः परमायतमानया । नास्थेयस्स त्वयाऽऽवर्ज्यः परमायतमानया १ ।। ५४ ।। (२.१) अत्यधिक कठोरहृदया (हठीले स्वभाव वाली), अत्यधिक दीर्घ मान (रुठने) वाली तेरे द्वारा विश्वास करने योग्य वह पुरुष ठुकराये जाने योग्य नहीं है (उसे ठुकराना नहीं) । (अपि तु) खूब प्रयत्न करती हुई (तेरे) द्वारा आकृष्ट किये जाने योग्य है ।। ५४ ।। (छन्दोबद्ध रचना, श्लोक) सारा ही एक अर्धालीसे समाप्त किया जाता है, वह 'समुद्ग यमक' कहलाता है। २ भरतने इसके भेद नहीं बताये हैं। दण्डीने समुद्ग यमकका लक्षण तो भरतोक्त लिया है, किन्तु भेद अपनी तरफसे तीन बताये हैं। सन्दष्ट यमक, जैसा कि हम देख चुके हैं, दण्डीको अव्यपेत रूपमें ही अभीष्ट हैं। रुद्रटने उसके (१) अव्यपेत और (२) व्यपेत रूपोंके भिन्न-भिन्न नाम दिये हैं : (१) गर्भ यमक एवं (२) सन्दंश तथा (३) सन्दष्टक यमक । इसके विपरीत समुद्गयमकके दण्डीने (१) व्यपेत, (२) अव्यपेत और (३) व्यपेताव्यपेत तीन भेद दिये हैं। रुद्रटने समुद्गयमकके लक्षण और उदाहरण भरतके समान ही दिये हैं । ३ तिरपनवें श्लोकके उत्तरार्धकी व्याख्या समुद्ग यमकके तीन उदाहरणों (५४-५६ श्लोकों) की व्याख्याके बाद (पृष्ठ ७० पर) देंगे ।। ५३ ।। (२.१) प्रथम-तृतीय और द्वितीय-चतुर्थ-पादावृत्ति व्यपेत समुद्ग यमक— प्रस्तुत श्लोकमें कविने प्रियकी किसी बातपर नाराज़ होकर रूठी बैठी मानिनी हठीली नायिकाको उसकी ग़लतफ़हमी दूर करती हुई सहेलीने मान छोड़कर प्रियको अपनानेकी उचित सलाह दी है। १. अन्वयः--स्थेयस्सत्त्वया, परमायतमानया त्वया आस्थेयः स ना न वर्ज्यः । परम् आयतमानया आवर्ज्यः ।। २. अर्धेनैकेन यद् वृत्तं सर्वमेव समाप्यते । 'समुद्गयमकं' नाम तज्ज्ञेयं पण्डितैर्यथा ।। नाटच० १६।७० 'केतकीमुकुलपाण्डुरदन्तः शोभते प्रवरकाननहस्ती । केतकीमुकुलपाण्डुरदन्तः शोभते प्रवरकाननहस्ती ।। ७१ ३. अर्धं पुनरावृत्तं जनयति यमकं समुद्गकं नाम । काव्याल० ३।१६ ननाम लोको विदमानवेन मही न चारित्रमुदारधीरम् । न नामलोऽकोविदमानवेन महीनचारित्रमुदारधीरम् ।। १७