भारतकोश
संग्रह पर लौटें

काव्यप्रकाश (आचार्य मम्मट - सम्पूर्ण १० उल्लास सटीक)

Kavyaprakasha of Mammata with Hindi Commentary

आचार्य मम्मट / पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि द्वारा

DevanagariSanskritpublished616 पृष्ठ

Alphabetical Index of Sanskrit Terms Pages अकाण्डे छेदः (दोष) (Untimely Interruption) .. 284 अकाण्डे प्रथनं (दो०) (Untimely Introduction) .. 284 अक्रमता (दो०) (Absence of Uniformity) .. 239 अगूढव्यङ्गम् (Explicit Suggestion) .. 28, 120 अङ्गस्यातिविस्तृतिः (दो०) (Profuse Description of the Subordinate Element) .. 285 अङ्गाङ्गिभावः संकरः (अलंकार) (Commixture) .. 463 अङ्गिनोऽननुसंधानं (दो०) (Neglect of the Principal Element) .. 285 अतद्गुणः (अ०) (Non-borrowing of Qualities) .. 459 अतिशयोक्तिः (अ०) (Hyperbole) .. 390 अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यध्वनिः (Suggestion wherein the .. Expressed Meaning is altogether neglected) .. 48 अधमकाव्यम् (Third Class Poetry) .. 7 अधिकम् अ० (The Exceeding) .. 443 अधिकपदता (दो०) (Redundant Word) .. 216 अधिकपदता क्वचिद्गुणः .. .. 275 अनङ्गस्याभिधानं (दो०) (Celebration of an Unim- portant Object) .. .. 288 अनन्वयः (अ०) (Comparison Absolute) .. 365 अनभिहितवाच्यता (दो०) (Omission of a Neces- sary Statement) .. .. 225 अनवीकृतत्वं (दो०) (Monotony) .. .. 250 अनियमे सनियमः (दो०) (Specification of the Un- specifiable) .. .. 250 अनुकरणे सर्वेषामदोषता (No Defect in Imitation) .. 263 अनुचितार्थता (दो०) (Improper Significance) .. 169 अनुप्रासः (अ०) (Alliteration) .. 219

492 KĀVYAPRAKĀŚA Pages अनुप्रासदोषाः तेषामुक्तेष्वन्तर्भावश्च (Defects in Al- literation) .. .. .. 477 अनुभावस्य कष्टकल्पना (दो०) (Far-fetched Significa- tion of the Ensuant) .. .. .. 282 अनुमानं (अ०) (Inference) .. .. .. 421 अनुवादायुक्तता (दो०) (Improper Adjunct) .. .. 433 अन्योन्यम् (अ०) (Reciprocal) .. .. .. 216 अपदयुक्तता (दो०) (Misplaced) .. .. 254 अपराङ्गव्यङ्ग्यम् (Subservient to something else) .. 121 अपह्नुति (Concealment) .. .. .. 377 अपुष्टार्थता (Irrelevancy) .. .. .. 242 अप्रतीतत्वं (दो०) (Unintelligibility) .. .. 175 अप्रतीतत्वं क्वचिद्गुणः .. .. .. 271 अप्रयुक्तता (दो०) (Non-usage) .. .. .. 168 अप्रयुक्तता क्वचित् न दोषः .. .. .. 268 अप्रयुक्ततादीनां पृथगुक्तिबीजम् .. .. .. 207 अप्रस्तुतप्रशंसा (अ०) (Indirect Description) .. .. 383 अप्रस्तुतप्रशंसाभेदाः .. .. .. 383 अप्रस्तुतप्रशंसायाः दोषः, तस्योक्तेऽन्तर्भावश्च .. .. 489 अभवन्मतयोगः (दो०) (Want of Intended Con- nection) .. .. .. 219 अभिधाविचारः (Denotation) .. .. .. 17 अमतपरार्थता (दो०) (Undesirable Second Inten- tion) .. .. .. 241 अर्थगुणास्वीकारः (Non-acceptance of Excellences of Meaning) .. .. .. 311 अर्थचित्रस्वरूपम् (Fanciful Meaning) .. .. 161 अर्थचित्रस्य बहुभेदता (Many Forms of Fanciful Meaning) .. .. .. 164 अर्थचित्रोदाहरणम् (Example of Fanciful Meaning) .. 163 अर्थदोषाः (Defects of Sense) .. .. 241 अर्थभेदाः (Kinds of Meaning) .. .. 9

INDEX 493 Pages अर्थव्यक्तिः (अर्थगुणः) (Expression of Meaning as belonging to Meaning) .. .. .. 310 अर्थव्यक्तिः (शब्दगुणः) (Expression of Meaning as belonging to Words) .. .. .. 311 अर्थव्यञ्जकता (Suggestion belonging to Meanings) 10 अर्थव्यञ्जकतायां शब्दस्य साहाय्यम् (Help of Words in the Suggestiveness of Meanings).. .. 39 अर्थशक्त्युत्थध्वनिविभागः (Divisions of Sugges- tion based on power of Meaning) .. 82 अर्थशक्त्युत्थध्वनिप्रभेदानामुदाहरणानि (Examples of Suggestion based on the power of Mean- ings) .. .. .. 82 अर्थशक्त्युत्थध्वनिप्रभेदानां प्रबन्धगतत्वम् (Do. occur- ring in context) .. .. .. 103 अर्थान्तरन्यासः (अ०) (Transition) .. .. 406 अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनिः (Suggestion where the Expressed Meaning is transferred to an- other) .. .. .. 48 अर्थान्तरैकवाचकता (दो०) (Isolation of an Expres- sive Word) .. .. .. 219 अलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनिः (Process of Suggestion where the order of sequence is imper- ceptible) .. — .. 50 अलङ्कारदोषाणामुक्तेष्वन्तर्भावः .. .. 475 अलङ्कारलक्षणम् (Definition of Figure of Speech, .. 301 अलङ्काराणां शब्दार्थगतत्वे नियामकम् (Grounds of dis- tinguishing Figures into Verbal and Ideal) .. .. .. 336, 473 अवाचकता (दो०) (Inexpressiveness) .. .. 170 अविमृष्टविधेयांशत्वं (दो०) (Suppression of the Predicate) .. .. .. 177

494 KĀVYAPRAKĀŚA Pages अविवक्षितवाच्यध्वनिः (Suggestion where the Ex- pressed Meaning is incompatible .. .. 48 अविशेषे विशेषः (दो०) (Restriction of the Un- restrictable) .. .. 252 अश्लीलता (दो०) (Indecorousness of Word) .. 173 अश्लीलता क्वचिद्गुणः .. .. 269 अश्लीलार्थता (दो०) (Indecorousness of Mean- ing) .. .. 270 असङ्गतिः (अ०) (Disconnection) .. .. 437 असङ्गतेर्विरोधाद्भेदः (Difference between Discon- nection and Contradiction) .. .. 438 असमर्थता (दो०) (Incapability of giving Sense) .. 168 असुन्दरव्यङ्ग्यम् (Non-beautiful Suggestion) .. 132 अस्थानस्थपदता (दो०) (Misplaced Word) .. 227 अस्थानस्थसमासता (दो०) (Misplaced Compound) .. 228 अस्थानसमासता क्वचिद्गुणः .. .. 278 अस्फुटव्यङ्ग्यम् (Abstruse Suggestion) .. .. 129 आक्षेपः (अ०) (Hint) .. .. 402 आर्थी उपमा (अ०) (Indirect Simile) .. 351 आर्थी व्यञ्जना (Suggestiveness of Meanings) .. 40 उत्तमकाव्यम् (First Class Poetry) .. .. 5 उत्तरम् (अ०) (Reply) .. .. 434 उत्तरस्य नान्यस्मिन्नन्तर्भावः .. .. 434 उत्प्रेक्षा (अ०) (Poetic Fancy) .. .. 366 उत्प्रेक्षादोषः, तस्योक्तेऽन्तर्भावश्च .. .. 366 उदात्तम् (अ०) (The Exalted) .. .. 419 उदारता (अर्थगुणः) (Fanciful Grouping—of Meanings) .. .. 311 उदारता (शब्दगुणः) (Fanciful Grouping—of Words) .. .. 311 उद्देश्यप्रतिनिर्देश्यस्थले कथितपदस्यादुष्टता .. .. 233

INDEX 495 Pages उपनागरिका (रीतिः) .. .. .. 321 उपमा (अ०). (Simile) .. .. .. 349 उपमादोषाः, तेषामुक्तेष्वन्तर्भावश्च .. .. .. 478 उपमानस्य आधिक्ये न व्यतिरेकः .. .. .. 396 उपमायां कालादिभेददोषः .. .. .. 482 उपमायां कालादिभेदस्य क्वचित् अदोषत्वम् .. .. 483 उपमायां लिङ्गवचनभेददोषः .. .. .. 482 उपमायां लिङ्गवचनभेदस्य अदोषता .. .. 483 उपमाया : पञ्चविंशतिविधित्वम् (Twenty-five Forms of Simile) .. .. .. 363 उपमेयोपमा (अ०) (Reciprocal Comparison) .. 365 उपहतविसर्गता (दो०) (Bluntedness of Visarga) .. 210 उपादानलक्षणा (Inclusive Indication) .. .. 19 एकावली (अ०) (Necklace) .. .. .. 447 ओजोगुणलक्षणम् (Floridity defined) .. .. 306 ओजोगुणस्य व्यञ्जकाः (Letters Suggestive of Floridity) .. .. .. 312 कथितपदत्वम् (दो०) (Repetition of Words) .. 217 कथितपदत्वस्य गुणता .. .. .. 233, 276 कर्णावतंसादिपदे न पौनरुक्त्यदोषः .. .. .. 258 कष्टार्थता (दो०) (Obscurity of Sense) .. 243 काक्वाक्षिप्तव्यङ्ग्यम् (Suggestion manifested by Emphasis) .. .. .. 131 कान्तिः (Brilliancy) .. .. .. 308 कारणमाला (अ०) (String of Causes) .. .. 431 काव्यलिङ्गम् (अ०) (Poetical Reason) .. .. 416 काव्यस्य कारणम् (Cause of Poetry) .. .. 3 काव्यस्य प्रयोजनम् (Effects of Poetry) .. .. 2 काव्यस्य स्वरूपम् (Definition of Poetry) .. .. 4 कोमला (रीतिः) (Softness of Diction) .. .. 321 क्लिष्टता (दो०) (Obscurity of Word) .. .. 177

496 KĀVYAPRAKĀŚA Pages खङ्गबन्धः (अ०) .. .. .. 344 गर्भितत्वम् (दो०) (Parenthetical) .. .. 230 गर्भितत्वं क्वचिद्गुणः .. .. .. 278 गुणलक्षणम् (Definition of Excellence or Dic- tion) .. .. .. 299 गुणविभागः (Forms of Excellence) .. .. 305 गुणानां रसधर्मत्वम् (Excellences belong to the Rasa) .. .. .. 299 गुणालङ्कारयोर्भेदः (Difference between Excellence and Figure) .. .. .. 303 गुणीभूतव्यङ्ग्यकाव्यम् (Poetry of Subordinate Suggestion) .. .. .. 7,119 गुणीभूतव्यङ्ग्यकाव्यप्रभेदाः .. .. .. 119 गूढव्यङ्ग्यम् (Abstruse Suggestion) .. .. 27 गौडी (रीतिः) .. .. .. 322 गौणीलक्षणा (Qualitative Indication) .. .. 23 गौर्वाहीक इत्यत्र लक्ष्यार्थनिर्णयः .. .. .. 23 ग्राम्यत्वं (दो०) (Vulgarity of Word) .. .. 175 ग्राम्यत्वं क्वचिद्गुणः .. .. .. 273 ग्राम्या (रीतिः) .. .. .. 321 ग्राम्यार्थता (दो०) (Vulgarity of Sense) .. .. 246 चित्रम् (अ०) (The Pictorial) .. .. 344 चित्रकाव्यम् (Fanciful Poetry) .. .. .. 7,344 चित्रकाव्यस्य बहुभेदता .. .. .. 164 च्युतसंस्कारः (दो०) (Lacking Correctness) .. 166 छेकानुप्रासः (अ०) (Isolated Alliteration) .. .. 320 तद्गुणः (अ०) (Borrower) .. .. .. 458 तात्पर्यार्थः (Import, the fourth kind of meaning).. 9 तुल्यप्राधान्यव्यङ्ग्यम् (Suggestion of equal Pro- .. minence) .. .. .. 131 तुल्ययोगिता (अ०) (Equal Pairing) .. .. 396

INDEX 497 Pages त्यक्तपुनःस्वीकृतता ( दो० ) (Resuming the Con- cluded) .. .. .. 257 दीपकम् (Illuminator) .. .. .. 394 दुष्क्रमत्वम् (दो०) (Irregularity) .. .. .. 245 दृष्टान्तः (अ०) (Exemplification) .. .. 393 दोषगुणालङ्काराणां शब्दार्थगतत्वे नियामकम् (Grounds of distinguishing Defects, Excellences and Figures into Verbal and Ideal) .. .. 336 दोषलक्षणम् (Definition of Defect) .. .. 165 दोषाणां क्वचित् अदोषता गुणता वा .. .. .. 263 ध्वनिकाव्यम् (Suggestive Poetry) .. .. 6 ध्वनिगुणीभूतव्यङ्ग्ययोः संकरः (Combination of Sugges- tion Poetry and Poetry of Subordinate Suggestion) .. .. .. 133 ध्वनेर्भेदसमष्टिः (10455 Forms of Suggestive Poetry) 116 ध्वनेः शुद्धभेदसङ्कलनम् (51 Pure Forms of Suggestive Poetry) .. .. .. 115 ध्वनेः संसृष्टसङ्करौ .. .. .. 116 ध्वनेः संसृष्टिसङ्करादीनां संख्या (Number of Combina- tions, etc., of Suggestion : 10404) .. 116 ध्वनेस्त्रैविध्यम् .. .. .. 134 निदर्शना (अ०) (Illustration) .. .. .. 381 निदर्शना अन्यविधा (अ०) (Another Form of Illustration) .. .. .. 382 निरर्थकत्वम् (दो०) (Useless or Redundant) .. 170 निर्हेतुता (दो०) (Inconsequentiality) .. .. 246 निर्हेतुता क्वचित् न दोषः .. .. .. 263 निहतार्थता (दो०) (Suppression of Meaning) .. 169 निहतार्थता क्वचित् न दोषः .. .. .. 268 नेयार्थता (दो०) (Presence of such meaning as has to be guessed out) .. .. .. 176 न्यूनपदत्वं (दो०) (Deficiency of Word) .. .. 215

498 KĀVYAPRAKĀŚA Pages न्यूनपदत्वं क्वचिद्गुणः .. .. .. 273 न्यूनपदत्वं क्वचित् न गुणो नापि दोषः .. .. .. 274 पतत्प्रकर्षः (दो०) (Receding of Excellence) .. 217 पतत्प्रकर्षः क्वचिद्गुणः .. .. .. 277 पददोषविभागः (Defects of Word Enumerated) .. 163 पददोषाणां केचित् वाक्यपदांशगताः (Some of the above applying to the Sentence) .. .. 184 पदांशगतदोषाणामुदाहरणानि (Defects in Particles of Words) .. .. .. 201 पद्मबन्धः (अ०) .. .. .. 345 परिकरः (अ०) (Insinuator) .. .. .. 427 परिवृत्तिः (अ०) (Exchange) .. .. .. 414 परिसङ्ख्या (अ०) (Special Mention) .. .. 429 परुषा (रीतिः) .. .. .. 321 पर्यायः (अ०) (Sequence) .. .. .. 424 पर्यायोक्तम् (Periphrasis) .. .. .. 418 पाञ्चाली (रीतिः) .. .. .. 322 पुनःपुनर्दीप्तिः (दो०) (Repeated Heightening) .. 284 पुनरुक्तवदाभासः (अ०) (Semblance of Repetition) .. 346 पौनरुक्त्यम् (दो०) (Tautophonous) .. .. 245 प्रकाशितविरुद्धता (दो०) (Disagreeable Second Entendre) .. .. 255 प्रकृतिविपर्ययः (दो०) (Perversion of Characters) .. 287 प्रतिकूलवर्णता (दो०) (Discord of Letters) .. .. 207 प्रतिकूलविभावादिपरिग्रहः (दो०) (Admission of Conflicting Excitants and Ensuants, etc.) .. 284 प्रतिपक्षः (अ०) (The Hostile) .. .. .. 444 प्रतिवस्तूपमा (अ०) (Typical Comparison) .. 392 प्रतीपम् (अ०) (The Converse) .. .. .. 451 प्रत्यनीकम् (अ०) (Hostile) .. .. .. 444 प्रसादगुणलक्षणम् (Definition of Lucidity) .. .. 305-306

INDEX 499 Pages प्रसिद्धिविरोधः (दो०) (Opposed to Popular Notions) .. .. .. 247 प्रसिद्धिविरोधस्य क्वचित् अदोषता .. .. .. 247 प्रसिद्धिरतत्वम् (दो०) (Disregard of usage) .. 231 भग्नप्रक्रमता (दो०) (Violation of the Uniformity of Expression) .. .. .. 232 भावः (Emotion Defined) .. .. .. 70 भावस्य उदयः (Manifestation of Emotion) .. 73 भावस्य शवलता (Variegation of Emotions) .. 73-74 भावस्य शान्तिः (Allayment of Emotion) .. .. 73 भावस्य शान्त्यादीनां क्वचित् प्राधान्यम् (Allayment, etc. of Emotion sometimes the Predomina- ting Element) .. .. .. 74 भावस्य सन्धिः (Mixture of Emotions) .. .. 73 भावाभासः (Semblance of Emotion) .. .. 73 भाविकम् (अ०) (Vision) .. .. .. 415 भ्रान्तिमान् (अ०) (Mistaker) .. .. .. 450 मङ्गलाचरणम् (Invocation) .. .. .. 1 मध्यमकाव्यम् (Middling Poetry) .. .. 7 माधुर्यगुणस्य लक्षणम् (Sweetness of Diction Defined) .. .. .. 305 माधुर्यगुणस्य व्यञ्जकम् (Letters Suggestive of Sweetness) .. .. .. 311 मालादीपकम् (अ०) (Stringed Illuminator) .. 395 मालानिदर्शना (अ०) (Stringed Illustration) .. 382 मालारूपकम् (अ०) (Stringed Metaphor) .. .. 372 मालोपमा (अ०) (Stringed Simile) .. .. 363 मीलितम् (अ०) (The Lost) .. .. .. 446 मुरजबन्धः (अ०) .. .. .. 345 यत्तत्पदयोः साकाङ्क्षनिराकाङ्क्षताविचारः .. .. 194-95 यथासङ्ख्यम् (अ०) (The Symmetrical) .. .. 405 यमकम् (अ०) (Chime) .. .. .. 324

500 KĀVYAPRAKĀŚA Pages यमकदोषः तस्योक्तेऽन्तर्भावश्च .. .. .. 417 रचनायाः क्वचित् वैपरीत्यम् (Occasional Perversion of Diction, etc.) .. .. .. 314 रशनारूपकम् (अ०) (Girdle-Metaphor) .. .. 372 रशनोपमा (अ०) (Girdle-Simile) .. .. 364 रसस्वरूपम् (Definition of Rasa) .. .. 52 रसदोषविभागः (Defects of Rasa Enumerated) .. 279 रसविभागः (Rasas Enumerated) .. .. 62 रसस्य स्वशब्दवाच्यता (दो०) (Mention of the Rasa by Name) .. .. .. 280 रसादेः पदैकदेशरचनावर्णगतत्वम् .. .. 105 रसाभासः (Aberrations of Rasa) .. .. 72 रसोदाहरणानि (Examples of Rasas) .. .. 62 रूपकम् (अ०) (Metaphor) .. .. .. 369 लक्षितलक्षणा (Indicative Indication) .. .. 19 लक्षणालक्षणम् (Indication Defined) .. .. 17 लक्षणामूलव्यञ्जनाव्यवस्थापनम् .. .. 29 लक्षणायां प्रयोजनप्रतीतिः (Comprehension of the Motive of Indication) .. .. .. 30 लक्षणायाः षड्विधत्वम् (Six forms of Indication) .. 27 लक्षणायास्त्रैविध्यम् (Three-foldness of Indication) .. 29 लाक्षणिकशब्दः (Indicative Word) .. .. 29 लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनिः (Suggestion, whose Order of Sequence is Perceptible) .. .. 50 [ लाटानुप्रासः (अ०) .. .. .. 322 लुप्तोपमा (अ०) (Elliptical Simile) .. .. 349 लुप्तोपमाभेदाः (Different Forms of Elliptical Simile) .. .. .. 355 वक्तादीनां वैशिष्ट्ये व्यञ्जनोदाहरणम् (Suggestion based on speciality of Speaker etc.) .. 40 वक्रोक्तिः (अ०) (Equivoque) .. .. .. 317 वस्तुव्यङ्गचालङ्कारस्य न गुणीभूतव्यङ्ग्यता .. .. 119

INDEX 501 Pages वाक्यदोषाः Defects of Sentence Enumerated) .. 207 वाक्यनिष्ठपददोषाणांमुदाहरणानि (Defects of Words occurring in a Sentence) .. .. 184 वाचकशब्दः (The Expressive Word) .. .. 12 वाच्यसिद्ध्यङ्गव्यङ्ग्यम् (The Suggested Meaning being a part of the accomplishment of the Expressed Meaning) .. .. 119 वाच्यार्थनिर्णयः (What is the Denoted Meaning ?) .. 12 वामनाद्युक्तगुणालंकारलक्षणखण्डनम्-- .. .. 104 वामनाद्युक्तदशविधशब्दगुणास्वीकारः .. .. .. 307 वामनाद्युक्तदशविधार्थगुणास्वीकारः .. .. .. 307 विद्याविरोधः (दो०) (Unscientific) .. .. 248 विधेयाविमर्शः (दो०) Non-discrimination of the Predicate) 177 विध्ययुक्तता (दो०) (Improper Predication) .. 255 विनोक्तिः (अ०) (Privative Description) .. 413 विप्रलम्भविभागः (Erotic in Privation) .. .. 64 विभावः (Excitant) .. .. .. 52 विभावना (अ०) (Peculiar Causation) .. .. 404 विभावस्य कष्टकल्पना (दो०) (Far-fetched Signification of the Excitant) .. .. 282 विरुद्धमतिकारिता (दो०) (Repugnant Implication in Words) .. .. .. 181 विरुद्धयोरपि रसयोः क्वचित् अविरोधः .. .. .. 294 विरुद्धयोरपि रसयोरेकत्र समावेशप्रकारः .. .. 293 विरुद्धरससञ्चारिभावादीनां बाध्यत्वेनोक्तिर्गुणः .. .. 289 विरोधः [विरोधाभासः] (अ०) (Contradiction) .. 407 विरोधविभागः (Forms of contradiction) .. 408 विरोधाऽसङ्गत्योर्भेदः (Difference between Contradiction and Disconnection) .. .. .. 439 विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनिः .. .. .. 50 विशेषः (अ०) (Extraordinary) .. .. 456

502 KĀVYAPRAKĀŚA Pages विशेषे अविशेषः (दो०) (Non-specification of the Specifiable) .. .. 251 विशेषोक्तिः (अ०) (Peculiar Allegation) .. .. 404 विषमः (The Incongruous) .. .. .. 441 विसन्धिः (दो०) (Cacophony) .. .. .. 210 वृत्त्यनुप्रासः (अ०) .. .. .. 320 वैदर्भीरीतिः .. .. .. 322 व्यञ्जकः शब्दः (The Suggestive Word) .. .. 39 व्यञ्जनावृत्तिसंस्थापनम् (Arguments in favour of accepting Suggestion as a process apart from Indication and Denotation) .. 121 व्यतिरेकः (अ०) (Dissimilitude) .. .. 396 व्यतिरेकविभागः (Twenty four kinds of Dissimi- litude) .. .. 397 व्यभिचारिणः स्वशब्दवाच्यत्वम् (दो०) .. .. 279 व्यभिचारिणः स्वशब्दवाच्यत्वं क्वचिन्न दोषः .. 288 व्यभिचारिभावाः (Accessory Emotions) .. .. 69 व्याघातः (अ०) (Frustration) .. .. .. 461 व्याजस्तुतिः (अ०) (Dissembling Eulogy) .. .. 411 व्याजोक्तिः (अ०) (Artful Assertion) .. .. 428 व्याहतार्थता (दो०) (Inconsistency) .. .. 244 शब्दचित्रस्य बहवो भेदाः (Forms of Fanciful Word) .. 164 शब्दचित्रस्वरूपम् (Definition of Fanciful Word) .. 161 शब्दचित्रोदाहरणम् (Example of Fanciful Word) .. .. .. 162 शब्दभेदाः (Three kinds of Word) .. .. 9 शब्दशक्त्युत्थध्वनिः (Suggestion arising from the power of Word) .. .. .. 76 शब्दार्थोभयशक्त्युत्थध्वनिः (Suggestion arising from the power of both Word and Meaning) .. शान्तरसः (The Quietistic) .. .. .. 70

INDEX 503 Pages शुद्धा लक्षणा (Pure Indication) .. .. .. 19 श्रुतिकटुत्वम् (दो०) (Unmelodiousness) .. .. 166 श्लेषः (अर्थगतः) (अ०) (Ideal Paronomasia) .. 379 श्लेषः (शब्दगतः) (अ०) (Verbal Paronomasia) .. 330 श्लेषगुणः (अर्थगतः) .. .. .. 310 ,, (शब्दगतः) .. .. .. 309 श्लेषविचारः (Consideration of the character of Ślesha) .. .. .. 335 सङ्करः (अ०) (Commixture) .. .. .. 463 सङ्कीर्णता (दो०) (Confusion) .. .. .. 229 सन्दिग्धत्वम् (दो०) (Ambiguousness) .. .. 174 ,, क्वचिद्गुणः .. .. .. 271 सन्दिग्धप्राधान्यव्यङ्ग्यम् (Suggestion of Doubtful Predominance) .. .. .. 117 सन्दिग्धार्थता (दो०) (Dubiousness) .. .. 246 सन्देहसङ्करः (अ०) (Second form of Commixture) 467 सन्धावश्लीलता (दो०) (Indecorousness in Euphony) 210 सम्भोगः (Erotic in Enjoyment) .. .. 63 संयोगादिनैकार्थनियमनम् (Causes of Suggestion) .. 57 संलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यध्वनिः (Suggestion where the order of Sequence is Perceptible) .. 76 संसृष्टि (अ०) (Collocation) .. .. .. 461 सनियमेऽनियमः (दो०) (Non-restriction of the Restrictable) .. .. .. 251 समता (अर्थगुणः) .. .. .. 308 समता (शब्दगुणः) .. .. .. 308 समम् (अ०) (Equal) .. .. .. 440 समाधिः (अ०) (Convenience) .. .. 439 ,, (अर्थगुणः) .. .. .. 310 ,, (शब्दगुणः) .. .. 308

504      KĀVYAPRAKĀŚA Pages समाप्तपुनरात्तता (दो०) (Resuming the Con- cluded)  ..  ..  ..  218 ” क्वचिन्न दोषो न गुणः  ..  ..  278 समासोक्तिः (अ०) (Modal Metaphor)  ..  380 समासोक्तिदोषः तस्योक्तेष्वन्तर्भावश्च  ..  ..  487 समुच्चयः (अ०) (Conjunction)  ..  ..  420 सर्वतोभद्रम्  ..  ..  ..  345 सन्देहः (अ०) (Dubious)  ..  ..  367 सहचरभिन्नता (दो०) (Mismatched Associates)  ..  255 सहोक्तिः (अ०) (Connected Description)  ..  412 साकाङ्क्षता (दो०) (Incompleteness)  ..  253 साध्यवसानालक्षणा (Intro-susceptive Indication)  ..  22 सामान्यम् (अ०) (Sameness)  ..  ..  454 सारः (अ०) (Climax)  ..  ..  437 सारोपालक्षणा (Superimponent Indication)  ..  22 सूक्ष्मम् (अ०) (Subtle)  ..  ..  436 सौकुमार्यम् (अर्थगुणः)  ..  ..  309 ” (शब्दगुणः)  ..  ..  308 स्थायिनः स्वशब्दवाच्यत्वम् (दो०) (Mention by name of Permanent Emotions)  ..  ..  281 स्थायिभावाः (Permanent Emotions)  ..  ..  68 स्मरणम् (अ०) (Reminiscence)  ..  ..  449 स्वभावोक्तिः (अ०) (Natural Description)  ..  411 हतवृत्तता (दो०) (Marred metre)  ..  ..  212

Appendices Prepared under the direction of Prof. S. M. Mukhopadhyaya.

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APPENDIX A Sanskrit Versions of Prakrit Verses P. 10, L. 3 मातर्गृहोपकरणमद्य खलु नास्तीति साधितं त्वया । तद्भण किं करणीयमेवमेव न वासरः स्थायी ॥६॥ P. 10, L. 7. साधयन्ती सखि सुभगं क्षणे क्षणे दूनाऽसि मत्कृते । सद्भावस्नेहकरणीयसदृशकं तावद्विरचितं त्वया ॥७॥ P. 11, L. 4. पश्य निश्चलनिष्पन्दा विसिनीपत्रे राजते बलाका । निर्मलमरकतभाजनपरिस्थिता शंखशुक्तिरिव ॥८॥ P. 38, L. 2. एतावन्मात्रस्तनिका एतावन्मात्राभ्यामक्षिपत्राभ्याम् । एतावन्मात्रावस्था एतावन्मात्रैर्दिवसैः ॥११॥ P. 41, L. 3. अतिपृथुलं जलकुम्भं गृहीत्वा समागतास्मि सखि त्वरितम् । श्रमस्वेदसलिलनिःश्वासनिःसहा विश्राम्यामि क्षणम् ॥१३॥ P. 41, L. 6. औन्निद्र्यं दौर्बल्यं चिन्तालसत्वं सनिःश्वसितम् । मम मन्दभागिन्याः कृते सखि त्वामप्यहह परिभवति ॥१४॥ P. 43, L. 1. तदा मम गण्डस्थलनिमग्नां दृष्टिं नानैषीरन्यत्र । इदानीं सैवाहं तौ च कपोलौ न च सा दृष्टिः ॥१६॥ P. 44, L. 2. नुदत्यनाद्रमनाः श्वश्रूमां गृहभरे सकले । क्षणमात्रं यदि संध्यायां भवति न वा भवति विश्रामः ॥१८॥ P. 44, L. 5. श्रूयते समागमिष्यति तव प्रियोऽद्य प्रहरमात्रेण । एवमेव किमिति तिष्ठसि तत् सखि सज्जय करणीयम् ॥१९॥ P. 45. L. 6. गुरुजनपरवश प्रिय किं भणामि तव मन्दभागिनी अहकम् । अद्य प्रवासं व्रजसि व्रज स्वयमेव श्रोष्यसि करणीयम् ॥२१॥ P. 80, L. 3. पथिक नात्र स्रस्तरमस्ति मनाक् प्रस्तरस्थले ग्रामे । उन्नतपयोधरं प्रेक्ष्य यदि वससि तदा वस ॥५८॥ P. 82, L. 4. अलसशिरोमणिर्धूर्तानामग्रिमः पुत्रि धनसमृद्धिमयः । इति भणितेननताङ्गी प्रफुल्लविलोचना जाता ॥६०॥ P. 84, L. 9. केशेषु बलात्कारेण तेन च समरे जयश्रीर्गृहीता । यथा कन्दराभिर्विधुरस्तस्य दृढं कण्ठे संस्थापिता ॥६५॥ P. 85, L. 6. गाढालिङ्गन रभसोद्यते दयिते लघु समपसरति । मनस्विन्याः मानः पीडनभीत इव हृदयात् ॥६६॥

iv KĀVYAPRAKĀSA P. 86. L. 1. या स्थविरमिव हसन्ती कविवदनाम्बुरुहबद्धविनिवेशा । दर्शयति भुवनमण्डलमन्यदिव जयति सा वाणी ॥६७॥ P. 86. L. 6. ये लङ्कागिरिमेखलासु स्खलिताः संभोगखिन्नोरगी- स्फारोत्फुल्लफणावलीकवलने प्राप्ता दरिद्रत्वम् । त इदानीं मलयानििला विरहिणीनिःश्वाससंपर्किणो जाता झटिति शिशुत्वेऽपि बहलास्तारुण्यपूर्णा इव ॥६८॥ P. 87, L. 3. सखि विरचय मानस्य मम धीरत्वेनाश्वासम् । प्रियदर्शनविशृङ्खलक्षणे सहसेति तेनापसृतम् ॥६९॥ P. 87, L. 7. आर्द्रार्द्रकरजरदनक्षतस्तव लोचनयोर्मम दत्तम् । रक्तांशुकं प्रसादः कोपेन पुनरिमे नाक्रान्ते ॥७०॥ P. 88, L. 4. महिलासहस्सभरिते तव हृदये सुभग सा अमान्ती । अनुदिनमनन्यकर्मा अङ्गं तनुकमपि तनयति ॥७१॥ P. 92, L. 5. खलव्यवहारा दृश्यन्ते दारुणा यद्यपि तथापि धीराणाम् । हृदयवयस्यबहुमता न खलु व्यवसाया विमुह्यन्ति ॥७४॥ P. 97, L. 1. तव वल्लभस्य प्रभात आसीदधरो म्लानकमलदलम् । इति नववधूः श्रुत्वा करोति वदनं महीसंमुखम् ॥८३॥ P. 97, L. 6. रात्रीषु चन्द्रधवलासु ललितमास्फाल्य यश्चापम् । एकच्छत्रमिव करोति भुवनराज्यं विजृम्भमाणः ॥८४॥ P. 98, L. 8. वार्यमाणोऽपि पुनः संतापकर्दथितेन हृदयेन । स्तनभरवयस्येन विशुद्धजातिर्न चलत्यस्या हारः ॥८६॥ P. 99, L. 2. स मुग्धश्यामलाङ्गो धम्मिल्लः कलितललितनिजदेहः । तस्याः स्कन्धाद्गलन्न गृहीत्वा स्मरः सुरतसंगरे जयति ॥८७॥ P. 99, L. 8. नवपूर्णिमामृगाङ्कस्य सुभग कस्स्वमसि भण मम सत्यम् । का सौभाग्यसमग्रा प्रदोषरजनीव तवाद्य ॥८८॥ P. 100, L. 3. सखि नवनिधुवनसमरेऽङ्कपालीसह्या निबिड्या । हारो निवारित एवोच्छ्रियमाणस्ततः कथं रमितम् ॥८९॥ P. 101, L. 1. प्रविशन्ती गृहद्वारं विवलितवदना विलोक्य पन्थानम् । स्कन्धे गृहीत्वा घटं हा हा नष्ट इति रोदिषि सखि किमिति ॥९०॥ P. 101, L. 6. विशृङ्खलां त्वां सखि दृष्ट्वा कुटेन तरलतरदृष्टिम् । द्वारस्पर्शमिषेण चात्मा गुरुक इति पातयित्वा विभिन्नः ॥९१॥ P. 102, L. 3. ज्योत्स्नया मधुरसेन च वितीर्णतारुण्योत्सुकमनाः सा । वृद्धापि नवोढेव परवधूररहह हरति तव हृदयम् ॥९२॥

APPENDIX A V P. 105, L. 6. रतिकेलिहृतनिवसनकरकिसलयरुद्धनयनयुगलस्य । रुद्रस्य तृतीयनयनं पार्वतीपरिचुम्बितं जयति ॥९७॥ P. 108, L. 6. ग्रामरुहास्मि ग्रामे वसामि नगरस्थितिं न जानामि । नागरिकाणां पतीन् हरामि या भवामि सा भवामि ॥१०१॥ P. 109, L. 5. तेषां गुणग्रहणानां तासामुत्कण्ठानां तस्य प्रेम्नः । तासां भणितीनां सुन्दर ईदृशं जातमवसानम् ॥१०२॥ P. 117, L. 2. क्षणप्राघुणिका देवर जायया सुभग किमपि ते भणिता । रोदिति गृहपश्चाद्भागवलभीगृहेऽनुनीयतां वराकी ॥१११॥ P. 132, L. 2. वानीरकुञ्जजोड्डीनशकुनिकोलाहलं शृण्वन्त्याः । गृहकर्मव्यापृताया वध्वः सीदन्त्यङ्गानि ॥१३२॥ P. 151, L. 4. कस्य वा न भवति रोषो दृष्ट्वा प्रियाया सव्रणमधरम् । सभ्रमरपद्माघ्रायिणि वारितवामे सहस्वेदानीम् ॥१३५॥ P. 154, L. 6. श्वशूरत्र निमज्जति अत्राहं दिवसके प्रलोकय । मा पथिक रात्र्यन्धक शय्यायामावयोरनिमङ्क्ष्यसि ॥१३६॥ P. 156, L. 3. विपरीतरते लक्ष्मीर्ब्रह्माणं दृष्ट्वा नाभिकमलस्थम् । हरेर्दक्षिणनयनं रसाकुला झटिति स्थगयति ॥१३७॥ P. 158, L. 4. भ्रम धार्मिक विश्रब्धः स शूनकोऽद्य मारितस्तेन । गोदानदीकच्छकुञ्जवासिना दृप्तसिंहेन ॥१३८॥ P. 213, L. 6. यत् परिहर्तुं तीर्यते मनागपि न सुन्दरत्वगुणेन । अथ केवलं यस्य दोषः प्रतिपक्षैरपि प्रतिपन्नः ॥२१६॥ P. 273, L. 2. पुष्पोत्करं कलमभक्तनिभं वहन्ति ये सिन्धुवारविटपा मम वल्लभास्ते । ये गालितस्य महिषीदध्नः सदृक्षा स्तेकिं च मुग्धविचकिलप्रसूनपुञ्जाः ॥ ३०९ ॥ P. 277, L. 1. तदा जायन्ते गुणाः यदा ते सहृदयैर्गृह्यन्ते । रविकिरणानुगृहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि ॥३१५॥ P. 278, L. 7. भवाम्यपहस्तितेरेखो निरङ्कुशोऽथ विवेकरहितोऽपि । स्वप्नेऽपि त्वयि पुनः प्रतीहि भक्तिं न प्रस्मरामि ॥३२०॥ P. 283, L. 9. निभृतरमणे लोचनपथे पतिते गुरुजनमध्ये । सकलपरिहारहृदया वनगमनमेवेच्छति वधूः ॥३२८॥ चित्ते विघटते...३४४ मम देहि रसं धर्मे तमोवशां आशां गमागमात् हर नः । हरवधुः शरणं त्वं चित्तमोहोऽपसरतु मे सहसा ॥३७२॥

vi KĀVYAPRAKĀŚA P. 302, L. 7. चित्ते विघटते न त्रुट्यति सा गुणेषु शय्यासु लुठति विसर्पति दिङ्मुखेषु । वचने वर्तते प्रवर्तते काव्यबन्धे ध्यानेन त्रुट्यति चिरं तरुणी प्रगल्भा ।। ३४३ ।। P. 357, L. 2. सकलकरणपरविश्रामश्रीवितरणं न सरसकाव्यस्य । दृश्यतेऽथ वा निशम्यते सदृशमंशांशमात्रेण ।।४००।। P. 361, L. 2. दुण्टुणायमानो मरिष्यसि कण्टककलितानि केतकीवनानि । मालतीकुसुमसदृक्षं भ्रमर भ्रमन् न प्राप्स्यसि ।।४०७।। P. 371, L. 1. यस्य रणान्तःपुरे करे कुर्वतो मण्डलाग्रलताम् । रससंमुख्यपि सहसा पराङ्मुखी भवति रिपुसेना ।।४२२।। P. 380, L. 5. लब्ध्वा तव बाहुस्पर्शं यस्याः स कोऽप्युल्लासः । जयलक्ष्मीस्तव विरहे न खलूज्ज्वला दुर्बला ननु सा ।।४३४।। P. 391, L. 2. अन्यत्सौकुमार्यम् अन्यैव च कापि वर्तनच्छाया । श्यामा सामान्यप्रजापतेः रेखैव च न भवति ।।४५०।। P. 395, L. 1. कृपणानां धनं नागानां फणमणिः केसरा सिंहानाम् । कुलबालिकानां स्तनाः कुतः स्पृश्यन्तेऽमृतानाम् ।।४५७।। P. 403, L. 2. ए एहि किमपि कस्या अपि कृते निष्कृप भणामि अलमथ वा । अविचारितकार्यारम्भकारिणी म्रियतां न भणिष्यामि ।।४७१।। P. 413, L. 3. सह दिवसनिशाभिर्दीर्घाः श्वासदण्डाः सह मणिबलयैर्बाष्पधारा गलन्ति । तव सुभग वियोगे तस्या उद्विग्नायाः सह च तनुलतया दुर्बला जीविताशा ।।४९५।। P. 425, L. 5. तत्तेषां श्रीसहोदररत्नभरणे हृदयमेकरसम् । बिम्बाधरे प्रियाणां निवेशितं कुसुमबाणेन ।।५१५।। P. 433, L. 8. हंसानां सरोभिः श्रीः सार्यते अथ सरसां हंसैः । अन्योन्यमेव एते आत्मानं केवलं गरयन्ति ।।५२७।। P. 434, L. 5. वाणिजक हस्तिदन्ताः कुतोऽस्माकं व्याघ्रकृत्तयश्च । यावत् लुलितालकमुखी गृहे परिष्वक्कते स्नुषा ।।५२८।। P. 435, L. 4. का विषमा दैवगतिः किं लब्धव्यं यत् जनो गुणग्राही । किं सौख्यं सुकलत्रं किं दुःखं यत् खलो लोकः ।।५२९।। P. 438, L. 5. यस्यैव व्रणस्तस्यैव वेदना भणति तज्जनोऽलीकम् । दन्तक्षतं कपोले वध्वाः वेदना सपत्नीनाम् ।।५३३।।