भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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९६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम जल्पकथायाऽपि चाभिधाने स्वपक्षे व्यावर्य्य सदोषस्यापि प्रमाणतया अभिधानं कृत्वा तद्दोषोद्भावनकारी कामपि खण्डनयुक्तिमवतार्य बाधनीय इति जल्पेऽपि नात्यन्तमनवकाशाः खण्डनयुक्तयः । अथ सामान्य-खण्डन-युक्तयः कीदृश्यः पुनस्ताः ? उच्यन्ते । तथाहि—लक्षणाधीना तावल्लक्ष्यव्यवस्थितिः, लक्षणानि चानुपपन्नानि, ज्ञाताधिकरणादिलक्षणनिरूपणद्वारेण चक्राकाद्यापत्तेः । तत्त्व-निर्णय है और जल्प-वितण्डा दोनों का विजयरूप एक फल। अतएव वह अन्य कथा है। किन्तु जल्प और वितण्डा में तो फल-भेद भी नहीं है, अतः जल्प का वितण्डा में अन्तर्भाव हो जाता है—वह अन्य कथा नहीं है। ये सब बातें हम 'ईश्वरमभिसन्धि' नामक ग्रन्थ में जल्प-विचार के प्रस्ताव में कह चुके हैं। प्रश्न—राम-रावण-युद्ध की तरह स्वपक्ष-रक्षण तथा परपक्ष-खण्डनरूप जल्प-कथा भी अनुभवसिद्ध ही है; क्योंकि शास्त्रार्थ भी वाग्युद्ध ही है। अतः उसका वितण्डा में अन्तर्भाव नहीं हो सकता । उस जल्प में खण्डन-युक्तियों की उपकारकता नहीं है, अतः सर्वत्र खण्डन-युक्तियों की उपकारकता सिद्ध नहीं हुई ? उत्तर—जल्प-कथा का पुरस्कारकर अभिधान करें, तो भी स-दोष प्रमाण का भी निर्दुष्टवत् अभिधान करते हुए किसी खण्डन-युक्ति का अवतारणकर स्वपक्ष में दोष के उद्भावनकारी वादी के पक्ष का बाध हो सकता है। तात्पर्य यह है कि प्रतिपक्षी के अपने पक्ष में दूषण देने के बाद अपना पक्ष स्थापन करने के लिए सद्धेतु ध्यान में न आये, तो सदोष भी प्रमाण निर्दुष्टवत् उपस्थितकर वह प्रतिपक्षी द्वारा दिये गये दोषों का निराकरण इन खण्डन-युक्तियों से कर ही सकता है। इस तरह जल्प में भी खण्डन-युक्तियों का अत्यन्त अनवकाश नहीं है। सामान्य-खण्डन की युक्तियाँ निर्वचनकर्ता—वे खण्डन-युक्तियाँ कैसी हैं ? खंडनकर्ता--वे युक्तियाँ कही जाती हैं। सुनिये, लक्ष्य का निश्चय लक्षण के अधीन होता है और लक्षणमात्र ही अनुपपन्न हैं। क्योंकि वे ज्ञान, अधिकरण आदि के लक्षण-निरूपण द्वारा चक्रक आदि दोषों से ग्रस्त हैं। अर्थात् ज्ञात (ज्ञान-विषय) ही लक्षण लक्ष्यव्यवहार तथा इतर-व्यावृत्तिरूप प्रयोजन सिद्ध कर सकते हैं, अज्ञात नहीं। यहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि 'वह ज्ञान कौन-सी वस्तु है ?' इस पर यदि यह उत्तर दिया जाय कि ज्ञानत्व-युक्त ज्ञान है;