भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 100

परिच्छेद ] प्रयोजन-प्रतिपादन ८५ प्रत्यवस्थातुं शक्यत्वात् । वैयाकरणानामिव च शब्दसिद्धिप्रश्नस्य परकीयतत्त्वज्ञान- निरूपणार्थं समानपक्षस्थित्याऽपि पर्यनुयोगसांव्यवहारिकतायाः संभवात् । वस्तुस्थितिं कुर्वाणेन च विचारकेणावश्यमेता युक्तय उद्धरणीयाः । अन्यथा वस्तुस्थितेरशक्यत्वादिति वादेऽपि प्रयोगः संभवत्येव खण्डनयुक्तीनाम् । जल्पस्त्वेका कथा न संभवत्येवाऽसामयिकी, वितण्डाद्वयशरीरत्वात् । अन्यथा जल्पद्वयेनापि किमित्येका कथा न कल्प्यते । अवोचाम च जल्पविचारप्रस्तावे विस्तरेणैतदिति । लिए परस्पर प्रश्न किया करते हैं, वैसे ही समान पक्ष में भी प्रश्न तथा खण्डन-युक्तियों का प्रयोग हो सकता है । तत्त्व का निश्चय करनेवाले परीक्षकों को तो अवश्य ही इन खण्डन-युक्तियों का आश्रयण करना चाहिए । क्योंकि जबतक खण्डन-युक्तियों से परमत का खण्डन न हो, तबतक तत्त्व का निश्चय हो ही नहीं सकता । इसलिए वाद में भी खण्डन- युक्तियों का प्रयोग हो सकता है । प्रश्न—जल्प में स्वपक्ष का स्थापन अवश्य करना पड़ता है, किन्तु खण्डन-युक्तियाँ खण्डनमात्र में प्रगल्भ और स्थापन में तो मूक हैं । इसलिए जल्प में इन खण्डन-युक्तियों से उपकार कैसे होगा ? उत्तर—जल्प तो कोई एक अलग कथा है ही नहीं; क्योंकि उसके शरीर में दो वितण्डाएँ प्रविष्ट हैं । अर्थात् एक ने स्वपक्ष का स्थापन किया और अन्य ने उसके पक्ष को दूषित किया, यह एक वितण्डा हुई तथा अन्य ने स्वपक्ष का स्थापन किया और प्रथम ने उसके पक्ष का खण्डन किया, यह दूसरी वितण्डा हुई । इस तरह दो वितण्डाएँ मिलकर एक जल्प होता है, अतः वह कथान्तर ही नहीं है । किञ्च—जल्प सर्वशास्त्रों के सिद्धान्त से सिद्ध भी नहीं है, केवल नैयायिकों के संकेत से ही कल्पित है । अन्यथा यदि दो वितण्डाओं को मिलाकर 'जल्प' नामक अलग कथा मानी जाय, तो दो जल्‍पों को मिलाकर चौथी भी एक अलग कथा क्यों नहीं मानते । अर्थात् स्वपक्ष-द्वय का स्थापन और परपक्ष-द्वय का खण्डन-स्वरूप एक कथान्तर भी जल्प के तुल्य हो सकता है, फिर वह भी अलग कथा क्यों न मानी जाय ? प्रश्न—यदि जल्प वितण्डा-द्वय-शरीर होने से कथान्तर नहीं है, तो वाद भी वितण्डा-द्वय-शरीर होने से अलग कथा नहीं कहलायेगा । एकमात्र वितण्डा ही कथा कहलायेगी ? उत्तर—वाद और जल्प-वितण्डा में फल-भेद है । अर्थात् वाद का फल

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक) · पृष्ठ 100, कुल 610 में से · BharatKosha