खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम
लक्षणविशेषखण्डने लक्ष्यखण्डनयुक्तीनां च तद्विषयप्रमाणादिविशेषखण्डने प्रत्येकं तात्पर्यम् । न च सूत्रादिलक्षणखण्डने१ अपसिद्धान्तापत्तिः ; तादृश्याः सूत्रादिव्याख्यायाः खण्ड्यमानत्वात् । न च वाच्यं लक्षणविशेषवस्तुव्यवस्थापकप्रमाणविशेषसूत्रादि- व्याख्याविशेषखण्डनपरत्वेन लक्षणान्तरं प्रमाणान्तरं व्याख्यान्तरं च वाच्यं प्रसज्येत भवतोऽपीति ; वितण्डाकथाम्बालम्ब्य खण्डनानां वक्तव्यत्वात् । तत्र च व्यावृत्य स्वपक्षनिर्वाहं प्रति पर्यनुयोगानवकाशात् । एवं च सति वादिदर्शनमाश्रित्यापि खण्डनप्रयोगो निर्बाध एव, एकदेशिवत्
प्रमाण-विशेष के खण्डन में तात्पर्य है । जैसे भेद के अनिर्वचनीयत्व से बाधितविषयक होने से अनुपलब्धि प्रमाण खण्डित हो जाता है । प्रश्न—गौतमादि के सूत्रों में उक्त लक्षणों का खण्डन करने से अपसिद्धान्त हो जायगा ? उत्तर—सूत्र के व्याख्याविशेष का खण्डन होने पर भी उसकी अन्य व्याख्या की सम्भावना से अपसिद्धान्त नहीं होगा । प्रश्न—लक्षण-विशेष, वस्तु के साधक प्रमाण-विशेष तथा सूत्र के व्याख्या- विशेष के खण्डनपरक अन्य प्रमाण और सूत्र की अन्य व्याख्या तो आपको भी कहनी पड़ेगी ? उत्तर—वितण्डारूप कथा का आश्रयण करके ही खण्डन-युक्तियों का उपन्यास किया गया है । वितण्डा में परमत-खण्डन को छोड़ स्वमत के स्थापन का आग्रह ही नहीं होता । इस प्रकार जब स्वमत-स्थापन में आग्रह है ही नहीं, तब वादी की दर्शन-मीमांसा आदि का आश्रयण करके भी खण्डन-युक्तियों का प्रयोग हो सकता है । क्योंकि मीमांसक- सामान्य मत के एकदेशी ( मीमांसक-विशेष ) प्रभाकर के तुल्य एक दर्शन का आश्रयण करके भी परस्पर खण्डन-प्रयोग हो सकता है । अथवा जैसे सभी वैयाकरण गोशब्द आदि की सिद्धि को तुल्यरूप मानकर भी दूसरे को तत्त्वज्ञान कराने के
१. प्रश्न—गौतमसूत्रस्थ प्रत्यक्षलक्षण के खण्डन से मीमांसकों को अपसिद्धान्त नहीं हो सकता, क्योंकि वे उन्हें प्रमाण नहीं मानते । अन्यथा न्यायाभिमत शब्दानित्यत्व भी न मानने से मीमांसकों को अपसिद्धान्त हो जायगा ? उत्तर—यहाँ इस शङ्का-समाधान का उल्लेख लेखक-प्रमाद से हुआ है । वस्तुतः ग्रन्थकार के अनुसार इसका लेख 'समानपक्षस्थित्याऽपि······ सम्भवात्' इसके आगे होना चाहिए ।