भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] योजन-प्रतिपादन ८३ तदेतादृशीषु सर्वासपि दर्शनस्थितिषु काममास्माकीनाः खण्डनयुक्तयः प्रगल्भन्ते, यासामीश्वरपरवशां ^१विश्वव्यवस्थामनास्थाय निरसनमशक्यं तासा- मेवावतारणार्थमयं ^२प्रावादुकप्रवादोपन्यासः। तथाहि—यदि शून्यवादानिर्वचनीय- पक्षयोराश्रयणम्, तदा तावदमूषां निराबाधैव सार्वपथीनता। यदि तु प्रमाणादिसत्ताभ्युपगन्तुमतावलम्बनम्, तदाऽपि लक्षणखण्डनयुक्तीनां उत्तर—यथार्थ में हमने अद्वैत-सिद्धि के लिए ही खण्डन-युक्तियाँ कही हैं। फिर भी आप लोगों की अभीष्ट-सिद्धि में (शब्द के नित्यत्व, अनित्यत्वादि के व्यवस्थापन में) भी राजाओं के तुल्य इन खण्डन-युक्तियों की आज्ञा का खण्डन (निवारण) नहीं किया है। अतः आप लोग अपनी-अपनी अभिलाषा के अनुसार तत्-तत् सिद्धान्त की सिद्धि या खण्डन में इन खण्डन-युक्तियों की योजना करें । यद्यपि खण्डन-युक्ति का, अद्वय-सिद्धि-नियोग । तदपि निज सिद्धान्त में, सब कर सकते योग ॥ इन खण्डन-युक्तियों का तत्-तत् सिद्धान्त की सिद्धि के लिए निवारण नहीं किया गया है। अतः सब सिद्धान्त माननेवाले दर्शनों के [ पर-सिद्धान्तों के खण्डन द्वारा ] स्थापन में हमारी खण्डन-युक्तियाँ यथेष्ट समर्थ हैं। जिन खण्डन-युक्तियों का ईश्वर (राजा) के अधीन विश्व-व्यवस्थापक आज्ञा के बिना निवारण नहीं हो सकता, उन्हींके अवतरण के लिए इस उद्धत ग्रन्थ का निर्माण किया गया है। देखिये, यदि आप शून्यवाद या अनिर्वचनीयवाद का आश्रयण करें, तब तो इन खण्डन-युक्तियों का सर्वत्र उपकार निर्बाध ही है। क्योंकि इन मतों में स्वमत का स्थापन तो करना है ही नहीं, केवल परमत का खण्डन ही करना है और परमत के खण्डन में खण्डन- युक्तियाँ सार्वपथीन (बेरोक) हैं । यदि प्रमाण की सत्ता माननेवाले नैयायिक, मीमांसक आदि के मतों का आश्रयण करें, तो लक्षण-विशेष के खण्डन की युक्तियों की लक्षण-विशेष के खण्डन में उपकारकता है और लक्ष्य-विशेष की खण्डन-युक्तियों का तद्विषयक १. विश्वं व्यवस्थाप्यते = नियम्यते, अनया = दण्डधारयेति; राजाधीन-दण्डेनेत्यर्थः । २. प्रावादुकः = उद्धतः, अयम् = खण्डनग्रन्थः, तस्य उपन्यासः = निर्माणम् ।