खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ६१
एतेन कारणं तत्त्वमित्यपि निरस्तम् । सर्वस्य तथात्वे प्रमित्यभावेन आत्मा- श्रयेण च प्रतिक्षणविशिष्टविश्वावश्यकारणत्वोपगमे दुरपवादार्थक्रियाकारित्वस्वरूप- सत्त्वलक्षणाङ्गीकारिजैनचरणशरणप्रवेशविडम्बनापादिदोषग्रासेन चेति । अनुभूतित्वजातिखण्डनम् किञ्च— इदमनुभूतित्वं नाम ? ज्ञानत्वावान्तरजातिभेदो वा, स्मृतिव्यतिरिक्त- निर्वचनकर्ता— हम कारण को ही 'तत्त्व' कहते हैं । खण्डनकर्ता— स्व में स्व का वृत्तित्व न होने से काल में नियत-प्राक्क्षणवृत्तित्वरूप कारणत्व नहीं है ; अतः काल की प्रमा में अव्याप्ति हो जायगी । निर्वचनकर्ता— यद्यपि अन्यत्र नियत-पूर्वकालवृत्तित्व ही कारणत्व है, तथापि कालस्थल में नियतपूर्वत्वमात्र कारणत्व है ; अतः काल की प्रमा में अव्याप्ति नहीं होगी । खण्डनकर्ता—अन्तिम कार्य तथा पारिमाण्डल्यादि किसीके कारण न होने से 'वस्तुमात्र कारण हैं' इसमें कोई प्रमाण नहीं । फलतः अन्त्य-कार्यादिविषयक प्रमा में अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—'कारणत्व से युक्त' को कारण कहते हैं। फिर यदि कारणत्व में उसी कारणत्व को मानें, तो आत्माश्रय होगा । यदि अन्य कारणत्व मानें, तो उस दूसरे कारणत्व में कौन-सा कारणत्व रहेगा ? यदि प्रथम कारणत्व रहेगा, तो अन्योन्याश्रय और यदि तृतीय कारणत्व मानें, तो उस तृतीय में चतुर्थ, चतुर्थ में पञ्चम एवं उत्तरोत्तर कारणत्व मानने से अनवस्था हो जायगी । यदि किसी कारणत्व में कारणत्व न मानें, तो वह कारण न होगा, अतः तत्कारणत्वविषयक प्रमा में अव्याप्ति सुस्थिर है । निर्वचनकर्ता— सभी भाव प्रतिक्षण परिणामी हैं, अतः पूर्व-क्षणविशिष्ट भाव उत्तरक्षणविशिष्ट भाव का कारण है । इसलिए सभी वस्तुओं के कारण हो जाने से कहीं भी अव्याप्ति नहीं होगी । खंडनकर्ता—क्षणिक विश्वमात्र को अवश्य कारण मानें, तो 'कारणत्व ही सत्त्व ( भाव ) का लक्षण है' ऐसा माननेवाले बौद्ध-मत का स्वीकार करना होगा । फलतः आप नैयायिक के लिए यह अपसिद्धान्त हो जायगा । अनुभूतित्व-जाति का खण्डन किञ्च—'अनुभूतित्व' क्या है ? क्या वह ज्ञानत्व-व्याप्य जाति है, स्मृतिसे भिन्न