भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तथाभूतं स्यात्तदाऽप्येवं तत्त्वं स्यादेवेति भाविपाकजरागः कुम्भः श्यामदशायामपि रक्तपित्तिना रक्ततयोपलभ्यमानस्तत्त्वं स्यादिति तद्बुद्धेः प्रमात्वापातः । यदा तदेति विशेषणप्रक्षेपेण च कालविशिष्टताप्रतीतेरप्रमात्वापातो न हि कालवैशिष्ट्येऽपि कालान्तरसम्बन्धः सम्भवी । अन्योपाध्यवच्छिन्नः सोऽन्योपाध्यवच्छिन्नेन सम्बन्त्स्यतीति चेत् ; तर्हि दण्ड्यपि देवदत्तः कुण्डलिनं स्वमारोचयत्येव । उपाधिभेदेऽप्युपधेयस्य एकत्वानिवृत्ते- नैवमिति चेत्, तुल्यम् । किञ्च—जो स्वरूप यद्धर्मविशिष्ट प्रतीत होता हो, यदि वह प्रतीति-काल से अन्य काल में भी तद्धर्मविशिष्ट हो, तो वह तत्त्व ही कहा जायगा । तब तो जो अपक्व श्यामघट पाकजन्य रक्तरूप से युक्त होनेवाला है, वह भी रक्त-पित्तरोग से ग्रस्त मनुष्य द्वारा रक्तत्वेन ज्ञात होने से तत्त्व हो जायगा । फलतः श्यामता-दशा में 'रक्तो घटः' यह बुद्धि भी प्रमा हो जायगी । निर्वचनकर्ता—जो यद्धर्मविशिष्ट जिस काल में प्रतीत हो, वह उस काल में यदि तद्धर्म-विशिष्ट हो, तभी 'तत्त्व' है । अतः भावी रक्तता-स्थल में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडनकर्ता—लक्षण में 'यदा', 'तदा' निवेश करने पर काल-अंश तथा काल के सम्बन्धांश में, काल का सम्बन्ध न होने से अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि काल- सम्बन्ध में कालसम्बन्ध नहीं रहता । निर्वचनकर्ता—यद्यपि काल एक है, तथापि उसकी उपाधि ( सूर्य-क्रिया ) का भेद होने से एक उपाधि से युक्त काल का अन्य उपाधि से युक्त काल के साथ सम्बन्ध हो ही जायगा, जैसे कि संवत्सरावच्छिन्न काल का पक्षावच्छिन्न काल से और पक्षांवच्छिन्न काल का दिवसावच्छिन्न काल से सम्बन्ध होता है । खण्डनकर्ता—एक उपाधि से विशिष्ट काल अन्य उपाधि से विशिष्ट स्वात्मा (काल) से संबद्ध नहीं हो सकता, वस्तु होने से; जैसे देवदत्त अपने से विशिष्ट नहीं होता । अन्यथा दण्डी देवदत्त का कुण्डलीरूप स्व से आधाराधेयभाव सम्बन्ध होने लगेगा । निर्वचनकर्ता—दण्ड, कुण्डल आदि उपाधियों का भेद होने पर भी देवदत्त के एक होने से दण्डी देवदत्त कुण्डली देवदत्त से सम्बद्ध नहीं होता । खण्डनकर्ता—यह बात तो काल-स्थल में भी तुल्य है। अर्थात् सूर्य-क्रियारूप उपाधि का भेद होने पर भी काल एक ही है।