भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 104

परिच्छेद ] प्रमा-लक्षण में तत्त्वपदार्थ-खण्डन ८६ सत्यम्, समवायः स्वरूपम् । स एव तु शुक्तिव्यक्तौ रजतत्वस्य नास्तीति चेत् । मैवम्; तत्र नास्तित्वेऽपि स्वरूपताया अन्यावृत्तेः । न हि गृहे देवदत्तो नास्तीति स्वरूपं न स्यात् । न स्वरूपमात्रं तत्त्वमुच्यते, किन्तु यद्देशकालसम्बन्धि यत्स्वरूपं प्रतीत तस्य तद्देशकालसम्बन्धि स्वरूपं तत्त्वमुच्यत इति चेत् । मैवम् ; देशकालसम्बन्धांशे प्रमाया अप्रमात्वापातात् तयोः स्वरूपमेव तत्त्वशब्दार्थ इति चेन्न । तत्त्व- पदस्यानेकार्थत्वे लक्षणाव्यापकत्वापत्तेः । अथैवं ब्रूषे—यद्यथाभूतं प्रतीयते तत्तथा परमार्थतो व्यवस्थितं तत्त्वमुच्यते । नैतदपि युक्तम् ; यद्यथाभूतं प्रतीयते, तद्यदि प्रतीतिसमयमपहाय कालान्तरे नहीं, क्योंकि शुक्ति में रजतत्व का सम्बन्ध अविद्यमान है। खंडनकर्ता—शुक्ति में अविद्यमान होने पर भी रजतत्व का समवाय स्वरूप ही है। क्योंकि घर में अविद्यमान भी देवदत्त स्वरूप ही है। अर्थात् स्वरूपत्व में विद्यमानत्व हेतु ( साधक ) नहीं है। यदि विद्यमानत्व को साधक मानें, तो घर में अविद्यमान देवदत्त स्वरूप न कहलायेगा । निर्वचनकर्ता—केवल 'स्वरूप' तत्त्व नहीं है; किन्तु जिस देश तथा काल से सम्बद्ध जो प्रतीत होता हो, उस देश तथा काल से सम्बद्ध स्वरूप ही तत्त्व है। खंडनकर्ता—देश-काल में देश-काल का सम्बन्ध नहीं रहता। अतः देश-काल के स्वरूपों के तत्त्व न होने से देश तथा काल की प्रमा में प्रमा-लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी। निर्वचनकर्ता—अन्यत्र तो देश-काल से सम्बद्ध स्वरूप ही तत्त्व है, तथापि देश- कालस्थलमें केवल स्वरूप ही तत्त्व है। खंडनकर्ता—देश-स्वरूप, काल-स्वरूप तथा देश-कालसम्बद्ध स्वरूप, इनमें प्रत्येक को समुदित रूप से 'तत्त्व'पदवाच्य मानें, तो लक्षण का अनुगम नहीं होगा। यदि प्रत्येक को वाच्य मानें, तो समुदाय में और समुदाय को वाच्य मानें तो प्रत्येक में अव्याप्ति हो जायगी। निर्वचनकर्ता—जो स्वरूप यद्धर्म-विशिष्ट ( जैसा ) प्रतीत होता हो, यदि उस धर्म से विशिष्ट हो, तो वह 'तत्त्व' कहा जाता है। खंडनकर्ता—तद्धर्मवैशिष्ट्य का यह ज्ञान प्रमाण से ही होगा और 'प्रमाण' प्रमिति के करण को कहते हैं। तब तो प्रमा की सिद्धि होने पर प्रमाण की सिद्धि और प्रमाण की सिद्धि होने पर तद्धर्म के निश्चय- द्वारा प्रमा की सिद्धि—इस प्रकार अन्योन्याश्रय आदि दोष हो जायेंगे । १२