खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम न; अरजतादेरपि रजताद्यात्मना अनुभूतिविषयतासंभवात् असत्यानुभूत्य- व्यवच्छेदात् भवितुरतत्वशब्दार्थत्वप्रसङ्गेन धर्म्यंशे विशिष्टे च प्रमाया अप्रमात्वापातात् । अथोच्यते—अवयवार्थचिन्तया दूषणाभिधानमिदं त्यज्यताम्, यतोऽयं तत्त्वशब्दः स्वरूपमात्रवचन इति । एतदप्ययुक्तम्; स्वरूपत्वस्य जातेरुपाधेर्वा स्वात्मनि वृत्त्यवृत्तिभ्यामनुपपत्तेः, स्वरूपशब्दार्थस्यैकस्यासम्भवेन प्रतिविषयन्या- वृत्त्या लक्षणस्याव्यापकत्वापातात् । कथञ्च तत्त्वेति विपर्यासादेर्निरासः । तथा हि-शुक्तौ यो ‘रजतमि’ति प्रत्ययः, सोऽपि स्वरूपबुद्धिर्भवत्येव । न हि धर्मी वा रजतत्वं वा न स्वरूपम्, नापि तयोः प्रतिभासमानः सम्बन्धो न स्वरूपमिति युक्तम्; समवायो हि तयोः सम्बन्धः प्रतिभाति, स च स्वरूपमेव । विषय का आक्षेप होगा और वही विषय तत्-शब्द से परामृष्ट होगा । वक्ता तथा श्रोता की बुद्धि का विषय ही 'प्रकरण' पद का वाच्य है । अतः जिस अर्थ का जो भाव है, वही उसका तत्त्व है । खण्डनकर्ता—शुक्ति में 'इदं रजतम्' इत्याकारक भ्रम भी रजतत्वरूप तत्त्वविषयक है । अतः वहाँ प्रमा के लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । धर्मी तत्त्व नहीं है, अतः धर्मी-अंश तथा विशिष्ट अंश में ( प्रमा में ) भी प्रमा-लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । निर्वचनकर्ता—'तत्त्व' शब्द स्वरूप में रूढ़ है; अतः अवयवार्थ के अनुरोध से दोष देना अनुचित है । उसे रूढ़ि मानने में धर्म, धर्मी, सम्बन्ध—सभी के स्वरूपरूप होने से धर्मी तथा विशिष्टांश में अव्याप्ति नहीं है । खण्डनकर्ता—स्वरूपत्व में स्वरूपत्व रहता है या नहीं ? यदि रहता है, तो स्व में स्व का वृत्तित्व होने से आत्माश्रय दोष है । यदि नहीं रहता, तो स्वरूपत्व से रहित होने से वह स्वरूप नहीं हुआ, क्योंकि स्वरूपत्वविशिष्ट को ही स्वरूप कहते हैं । अतः स्वरूपत्व-प्रमा में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—तत्त्व-विशेषण से 'इदं रजतम्' इस भ्रम में प्रमा-लक्षण की अतिव्याप्ति का वारण कैसे होगा ? देखिये, शुक्ति में जो रजतत्वबुद्धि है, वह भी स्वरूप की बुद्धि ही है । क्योंकि धर्मी तथा रजतत्व स्वरूप ही हैं और उन दोनों का प्रतिभासमान सम्बन्ध ( समवाय ) भी स्वरूप ही है । निर्वचनकर्ता—रजतत्व-समवाय स्वरूप है सही, किन्तु वह रजत में है, शुक्ति में