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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

८८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम न; अरजतादेरपि रजताद्यात्मना अनुभूतिविषयतासंभवात् असत्यानुभूत्य- व्यवच्छेदात् भवितुरतत्वशब्दार्थत्वप्रसङ्गेन धर्म्यंशे विशिष्टे च प्रमाया अप्रमात्वापातात् । अथोच्यते—अवयवार्थचिन्तया दूषणाभिधानमिदं त्यज्यताम्, यतोऽयं तत्त्वशब्दः स्वरूपमात्रवचन इति । एतदप्ययुक्तम्; स्वरूपत्वस्य जातेरुपाधेर्वा स्वात्मनि वृत्त्यवृत्तिभ्यामनुपपत्तेः, स्वरूपशब्दार्थस्यैकस्यासम्भवेन प्रतिविषयन्या- वृत्त्या लक्षणस्याव्यापकत्वापातात् । कथञ्च तत्त्वेति विपर्यासादेर्निरासः । तथा हि-शुक्तौ यो ‘रजतमि’ति प्रत्ययः, सोऽपि स्वरूपबुद्धिर्भवत्येव । न हि धर्मी वा रजतत्वं वा न स्वरूपम्, नापि तयोः प्रतिभासमानः सम्बन्धो न स्वरूपमिति युक्तम्; समवायो हि तयोः सम्बन्धः प्रतिभाति, स च स्वरूपमेव । विषय का आक्षेप होगा और वही विषय तत्-शब्द से परामृष्ट होगा । वक्ता तथा श्रोता की बुद्धि का विषय ही 'प्रकरण' पद का वाच्य है । अतः जिस अर्थ का जो भाव है, वही उसका तत्त्व है । खण्डनकर्ता—शुक्ति में 'इदं रजतम्' इत्याकारक भ्रम भी रजतत्वरूप तत्त्वविषयक है । अतः वहाँ प्रमा के लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । धर्मी तत्त्व नहीं है, अतः धर्मी-अंश तथा विशिष्ट अंश में ( प्रमा में ) भी प्रमा-लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । निर्वचनकर्ता—'तत्त्व' शब्द स्वरूप में रूढ़ है; अतः अवयवार्थ के अनुरोध से दोष देना अनुचित है । उसे रूढ़ि मानने में धर्म, धर्मी, सम्बन्ध—सभी के स्वरूपरूप होने से धर्मी तथा विशिष्टांश में अव्याप्ति नहीं है । खण्डनकर्ता—स्वरूपत्व में स्वरूपत्व रहता है या नहीं ? यदि रहता है, तो स्व में स्व का वृत्तित्व होने से आत्माश्रय दोष है । यदि नहीं रहता, तो स्वरूपत्व से रहित होने से वह स्वरूप नहीं हुआ, क्योंकि स्वरूपत्वविशिष्ट को ही स्वरूप कहते हैं । अतः स्वरूपत्व-प्रमा में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—तत्त्व-विशेषण से 'इदं रजतम्' इस भ्रम में प्रमा-लक्षण की अतिव्याप्ति का वारण कैसे होगा ? देखिये, शुक्ति में जो रजतत्वबुद्धि है, वह भी स्वरूप की बुद्धि ही है । क्योंकि धर्मी तथा रजतत्व स्वरूप ही हैं और उन दोनों का प्रतिभासमान सम्बन्ध ( समवाय ) भी स्वरूप ही है । निर्वचनकर्ता—रजतत्व-समवाय स्वरूप है सही, किन्तु वह रजत में है, शुक्ति में

परिच्छेद ] प्रमा-लक्षण में तत्त्वपदार्थ-खण्डन ८६ सत्यम्, समवायः स्वरूपम् । स एव तु शुक्तिव्यक्तौ रजतत्वस्य नास्तीति चेत् । मैवम्; तत्र नास्तित्वेऽपि स्वरूपताया अन्यावृत्तेः । न हि गृहे देवदत्तो नास्तीति स्वरूपं न स्यात् । न स्वरूपमात्रं तत्त्वमुच्यते, किन्तु यद्देशकालसम्बन्धि यत्स्वरूपं प्रतीत तस्य तद्देशकालसम्बन्धि स्वरूपं तत्त्वमुच्यत इति चेत् । मैवम् ; देशकालसम्बन्धांशे प्रमाया अप्रमात्वापातात् तयोः स्वरूपमेव तत्त्वशब्दार्थ इति चेन्न । तत्त्व- पदस्यानेकार्थत्वे लक्षणाव्यापकत्वापत्तेः । अथैवं ब्रूषे—यद्यथाभूतं प्रतीयते तत्तथा परमार्थतो व्यवस्थितं तत्त्वमुच्यते । नैतदपि युक्तम् ; यद्यथाभूतं प्रतीयते, तद्यदि प्रतीतिसमयमपहाय कालान्तरे नहीं, क्योंकि शुक्ति में रजतत्व का सम्बन्ध अविद्यमान है। खंडनकर्ता—शुक्ति में अविद्यमान होने पर भी रजतत्व का समवाय स्वरूप ही है। क्योंकि घर में अविद्यमान भी देवदत्त स्वरूप ही है। अर्थात् स्वरूपत्व में विद्यमानत्व हेतु ( साधक ) नहीं है। यदि विद्यमानत्व को साधक मानें, तो घर में अविद्यमान देवदत्त स्वरूप न कहलायेगा । निर्वचनकर्ता—केवल 'स्वरूप' तत्त्व नहीं है; किन्तु जिस देश तथा काल से सम्बद्ध जो प्रतीत होता हो, उस देश तथा काल से सम्बद्ध स्वरूप ही तत्त्व है। खंडनकर्ता—देश-काल में देश-काल का सम्बन्ध नहीं रहता। अतः देश-काल के स्वरूपों के तत्त्व न होने से देश तथा काल की प्रमा में प्रमा-लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी। निर्वचनकर्ता—अन्यत्र तो देश-काल से सम्बद्ध स्वरूप ही तत्त्व है, तथापि देश- कालस्थलमें केवल स्वरूप ही तत्त्व है। खंडनकर्ता—देश-स्वरूप, काल-स्वरूप तथा देश-कालसम्बद्ध स्वरूप, इनमें प्रत्येक को समुदित रूप से 'तत्त्व'पदवाच्य मानें, तो लक्षण का अनुगम नहीं होगा। यदि प्रत्येक को वाच्य मानें, तो समुदाय में और समुदाय को वाच्य मानें तो प्रत्येक में अव्याप्ति हो जायगी। निर्वचनकर्ता—जो स्वरूप यद्धर्म-विशिष्ट ( जैसा ) प्रतीत होता हो, यदि उस धर्म से विशिष्ट हो, तो वह 'तत्त्व' कहा जाता है। खंडनकर्ता—तद्धर्मवैशिष्ट्य का यह ज्ञान प्रमाण से ही होगा और 'प्रमाण' प्रमिति के करण को कहते हैं। तब तो प्रमा की सिद्धि होने पर प्रमाण की सिद्धि और प्रमाण की सिद्धि होने पर तद्धर्म के निश्चय- द्वारा प्रमा की सिद्धि—इस प्रकार अन्योन्याश्रय आदि दोष हो जायेंगे । १२

६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तथाभूतं स्यात्तदाऽप्येवं तत्त्वं स्यादेवेति भाविपाकजरागः कुम्भः श्यामदशायामपि रक्तपित्तिना रक्ततयोपलभ्यमानस्तत्त्वं स्यादिति तद्बुद्धेः प्रमात्वापातः । यदा तदेति विशेषणप्रक्षेपेण च कालविशिष्टताप्रतीतेरप्रमात्वापातो न हि कालवैशिष्ट्येऽपि कालान्तरसम्बन्धः सम्भवी । अन्योपाध्यवच्छिन्नः सोऽन्योपाध्यवच्छिन्नेन सम्बन्त्स्यतीति चेत् ; तर्हि दण्ड्यपि देवदत्तः कुण्डलिनं स्वमारोचयत्येव । उपाधिभेदेऽप्युपधेयस्य एकत्वानिवृत्ते- नैवमिति चेत्, तुल्यम् । किञ्च—जो स्वरूप यद्धर्मविशिष्ट प्रतीत होता हो, यदि वह प्रतीति-काल से अन्य काल में भी तद्धर्मविशिष्ट हो, तो वह तत्त्व ही कहा जायगा । तब तो जो अपक्व श्यामघट पाकजन्य रक्तरूप से युक्त होनेवाला है, वह भी रक्त-पित्तरोग से ग्रस्त मनुष्य द्वारा रक्तत्वेन ज्ञात होने से तत्त्व हो जायगा । फलतः श्यामता-दशा में 'रक्तो घटः' यह बुद्धि भी प्रमा हो जायगी । निर्वचनकर्ता—जो यद्धर्मविशिष्ट जिस काल में प्रतीत हो, वह उस काल में यदि तद्धर्म-विशिष्ट हो, तभी 'तत्त्व' है । अतः भावी रक्तता-स्थल में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडनकर्ता—लक्षण में 'यदा', 'तदा' निवेश करने पर काल-अंश तथा काल के सम्बन्धांश में, काल का सम्बन्ध न होने से अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि काल- सम्बन्ध में कालसम्बन्ध नहीं रहता । निर्वचनकर्ता—यद्यपि काल एक है, तथापि उसकी उपाधि ( सूर्य-क्रिया ) का भेद होने से एक उपाधि से युक्त काल का अन्य उपाधि से युक्त काल के साथ सम्बन्ध हो ही जायगा, जैसे कि संवत्सरावच्छिन्न काल का पक्षावच्छिन्न काल से और पक्षांवच्छिन्न काल का दिवसावच्छिन्न काल से सम्बन्ध होता है । खण्डनकर्ता—एक उपाधि से विशिष्ट काल अन्य उपाधि से विशिष्ट स्वात्मा (काल) से संबद्ध नहीं हो सकता, वस्तु होने से; जैसे देवदत्त अपने से विशिष्ट नहीं होता । अन्यथा दण्डी देवदत्त का कुण्डलीरूप स्व से आधाराधेयभाव सम्बन्ध होने लगेगा । निर्वचनकर्ता—दण्ड, कुण्डल आदि उपाधियों का भेद होने पर भी देवदत्त के एक होने से दण्डी देवदत्त कुण्डली देवदत्त से सम्बद्ध नहीं होता । खण्डनकर्ता—यह बात तो काल-स्थल में भी तुल्य है। अर्थात् सूर्य-क्रियारूप उपाधि का भेद होने पर भी काल एक ही है।

[परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ६१

एतेन कारणं तत्त्वमित्यपि निरस्तम् । सर्वस्य तथात्वे प्रमित्यभावेन आत्मा- श्रयेण च प्रतिक्षणविशिष्टविश्वावश्यकारणत्वोपगमे दुरपवादार्थक्रियाकारित्वस्वरूप- सत्त्वलक्षणाङ्गीकारिजैनचरणशरणप्रवेशविडम्बनापादिदोषग्रासेन चेति । अनुभूतित्वजातिखण्डनम् किञ्च— इदमनुभूतित्वं नाम ? ज्ञानत्वावान्तरजातिभेदो वा, स्मृतिव्यतिरिक्त- निर्वचनकर्ता— हम कारण को ही 'तत्त्व' कहते हैं । खण्डनकर्ता— स्व में स्व का वृत्तित्व न होने से काल में नियत-प्राक्क्षणवृत्तित्वरूप कारणत्व नहीं है ; अतः काल की प्रमा में अव्याप्ति हो जायगी । निर्वचनकर्ता— यद्यपि अन्यत्र नियत-पूर्वकालवृत्तित्व ही कारणत्व है, तथापि कालस्थल में नियतपूर्वत्वमात्र कारणत्व है ; अतः काल की प्रमा में अव्याप्ति नहीं होगी । खण्डनकर्ता—अन्तिम कार्य तथा पारिमाण्डल्यादि किसीके कारण न होने से 'वस्तुमात्र कारण हैं' इसमें कोई प्रमाण नहीं । फलतः अन्त्य-कार्यादिविषयक प्रमा में अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—'कारणत्व से युक्त' को कारण कहते हैं। फिर यदि कारणत्व में उसी कारणत्व को मानें, तो आत्माश्रय होगा । यदि अन्य कारणत्व मानें, तो उस दूसरे कारणत्व में कौन-सा कारणत्व रहेगा ? यदि प्रथम कारणत्व रहेगा, तो अन्योन्याश्रय और यदि तृतीय कारणत्व मानें, तो उस तृतीय में चतुर्थ, चतुर्थ में पञ्चम एवं उत्तरोत्तर कारणत्व मानने से अनवस्था हो जायगी । यदि किसी कारणत्व में कारणत्व न मानें, तो वह कारण न होगा, अतः तत्कारणत्वविषयक प्रमा में अव्याप्ति सुस्थिर है । निर्वचनकर्ता— सभी भाव प्रतिक्षण परिणामी हैं, अतः पूर्व-क्षणविशिष्ट भाव उत्तरक्षणविशिष्ट भाव का कारण है । इसलिए सभी वस्तुओं के कारण हो जाने से कहीं भी अव्याप्ति नहीं होगी । खंडनकर्ता—क्षणिक विश्वमात्र को अवश्य कारण मानें, तो 'कारणत्व ही सत्त्व ( भाव ) का लक्षण है' ऐसा माननेवाले बौद्ध-मत का स्वीकार करना होगा । फलतः आप नैयायिक के लिए यह अपसिद्धान्त हो जायगा । अनुभूतित्व-जाति का खण्डन किञ्च—'अनुभूतित्व' क्या है ? क्या वह ज्ञानत्व-व्याप्य जाति है, स्मृतिसे भिन्न

६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ज्ञानत्वं वा, स्मृतिलक्षणरहितज्ञानत्वं वा, तदविदूरप्राक्कालोत्पत्तिनियतासाधारण- कारणकबुद्धित्वं वा ? न तावदाद्यः। तथाहि—अनुभूतित्वं नाम जातिरेकाऽभ्युपगम्येति कुतः ? 'अनुभवामी'ति प्रत्ययानुगमवशादिति चेन्न । माघमासीय निशावसाने सिता- सितसरित्सम्मेदस्नायिनः सत्यपि शब्दबलाद् भाविस्वकीयस्वर्गसुखसम्प्रत्यये 'सुखमनुभवामी'ति प्रतीत्यनुदयात्, प्रत्युत शीतसम्भूतवेदनासंवेदनादेव परस्त्रियञ्च सम्भुञ्जानस्य आस्तिककामुकस्य शब्दाधीने सत्यपि भाविनरकगमनानुभवनीय- यातनाधिगमे 'दुःखमनुभवामी'ति मतेरनुत्पत्तेः । प्रत्युत 'अमन्दमानन्दं संविदन् साम्प्रतमस्मी'ति प्रत्ययात् । ज्ञानत्व है या स्मृतित्वाभाववत् ज्ञानत्व है अथवा स्व से 'अव्यवहित पूर्वक्षण में होनेवाली उत्पत्ति से नियत (व्यापक) है असाधारण कारण जिसका, ऐसा बुद्धित्व है ? इनमें प्रथम पक्ष (ज्ञानत्व-व्याप्य जाति) युक्त नहीं; क्योंकि अनुभूतित्व-जाति में कोई प्रमाण नहीं है । निर्वचनकर्ता—प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति और शाब्द, इन चार प्रकार के ज्ञानों में 'अनुभवामि' इत्याकारक जो अनुगत प्रतीति होती है, वही अनुभूतित्वजाति में प्रमाण है । खण्डनकर्ता—माघमास में प्रातःकाल सिता (गङ्गा) और असिता (यमुना) इन दो नदियों के सङ्गम में स्नानकर्ता पुरुष को 'सिताऽसिते सरिते यत्र सङ्गते, तत्राऽऽप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति' इत्यादि श्रुति-शब्दों से भाविस्वर्ग-सुखविषयक शाब्दज्ञान होने पर भी उस ज्ञान में 'स्वर्गसुखमनुभवामि' ऐसी प्रतीति नहीं होती । प्रत्युत शीतस्पर्श के त्वाच-प्रत्यक्ष से जन्य दुःखानुभव का 'दुःखमनुभवामि' इत्याकारक अनुव्यवसाय ही होता है । इसी तरह परस्त्री के उपभोगकाल में आस्तिक कामुक को 'न परस्त्रियं गच्छेत्' इस आप्त-वाक्य से भावी दुःख का शाब्दज्ञान होने पर भी उसे 'दुःखमनुभवामि' ऐसा अनुभव नहीं होता, किन्तु 'पूर्ण सुख का अनुभव करता हूँ' ऐसा ही अनुव्यवसाय होता है । अतः प्रत्यक्षादि में अनुगत अनुभवत्व- जाति में कुछ प्रमाण नहीं है । १. प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति और शाब्दबोध के असाधारण कारण सन्निकर्ष, व्याप्ति- ज्ञान आदि अपने-अपने कार्य से अव्यवहित पूर्वक्षण में उत्पन्न होते हैं । पर स्मृति का असाधारण कारण संस्कार अपने कार्य (स्मृति) के अव्यवहित पूर्वक्षण में उत्पन्न नहीं होता ।

परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ६३ यदि तु शब्दोपदर्शितव्याप्तिजमनुमानमनुभव एव स्यात्, तर्हि ‘सुखं दुःखं वाऽनुभवामी’ति तयोः प्रत्ययः स्यात् । अथ मन्यसे—साक्षात्कारमनुभवार्थमनुरुध्य तयोर्नैवमभिमन्यवहारौ शब्दजानुमानापेक्षौ तु विमर्शकस्य स्यातामेव ताविति । तर्हि साक्षात्कारिणि निर्वचनकर्ता—‘सिताऽसिते सरिते यत्र’ इत्यादि श्रुतिवाक्य से सितासिता-स्नान में सुख-साधनता का ही शाब्दबोध होता है । साधनता में सुख विशेषणरूप से भासता है । फलतः जैसे ‘पर्वतमनुभवामि’ ऐसा अनुव्यवसाय नहीं होता, वैसे ही प्रकृत में भी ‘सुखमनुभवामि’ ऐसा अनुव्यवसाय नहीं होता । किन्तु ‘सुखसाधनतामनुभवामि’ ऐसा ही अनुव्यवसाय होता है । अतः प्रकृत स्थल में ‘अनुभवामि’ इस ज्ञान के न होने पर भी अन्यत्र सभी शाब्दस्थलों में ‘अनुभवामि’ ऐसा ज्ञान होने के कारण अनुभूतित्वजाति में कोई बाधक नहीं है । खंडनकर्ता—उक्त श्रुतिवाक्य से ‘यत्र यत्र सितासिता-सम्भेदस्नानं, तत्र तत्र भावि सुखम्’ ऐसा व्याप्तिज्ञान होकर ‘अहं स्वर्गी भविष्यामि, सिताऽसिता-सम्भेद- स्नायित्वात्, इन्द्रादिवत्’ इत्यादि अनुमिति होने पर भी ‘अनुभवामि’ ऐसी प्रतीति नहीं होती । किन्तु स्नान-काल में ‘शीतदुःखमनुभवामि’ ऐसी ही प्रतीति होती है । हाँ, ‘भावि- सुखं शाब्दयामि या अनुमिनोमि’ ऐसा अनुव्यवसाय अवश्य होता है । यदि शाब्द-बोध या अनुमिति भी अनुभव है, तो ‘अनुभवामि’ इत्याकारक प्रत्यय अवश्य होना चाहिए । किन्तु होता नहीं, अतः अनुमान करना चाहिए कि शाब्द तथा अनुमिति अनुभूति नहीं हैं । निर्वचनकर्ता—उक्त स्थल में ‘अनुभव’ शब्द का अर्थ साक्षात्त्व-जाति ही मानते हैं । अतः शाब्द या अनुमिति में अनुभवत्वव्यवहार नहीं होता । यदि विचार किया जाय, तो प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति और शाब्दज्ञान में अनुभवत्वजाति होने से शाब्द तथा अनुमिति में भी अनुभवत्वव्यवहार होता ही है । खंडनकर्ता—यदि साक्षात्त्व को ज्ञान में अनुभव-शब्द के प्रयोग का कारण मानें, तो प्रत्यक्ष में अनुभवत्वजाति की सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि वहाँ अनुभवत्वव्यवहार तो प्रत्यक्षत्व से ही हो जाता है । फिर प्रत्यक्ष में अनुभवत्व जाति रहती है, इसमें कोई प्रमाण नहीं । किञ्च—ऐसा मानने पर अनुभूतिशब्द के दो अर्थ हो जाने से अननुगम

६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ज्ञानेऽनुभवप्रत्ययव्यवहारौ साक्षात्त्वनिबन्धनाविति तत्रानुभवत्वजातिकल्पनायां न प्रयोजनप्रमाणे इत्यनुभूत्यर्थभेदान्ल्लक्षणाननुगमो दोषः । अथ स्मृतिव्यावृत्तेन रूपेण यः प्रत्यक्षादिष्वनुभव इत्यनुगतावगमः, स साक्षात्कारित्त्वादनुपपन्नः । ततश्च साक्षात्कार्यसात्कारिविशेषसाधारणमनु- भूतित्वमन्यदेष्टव्यमित्युच्यते । तदपि न युक्तम्; पदार्थान्तरव्यावृत्तेन रूपेण यस्तदितरेष्वनुगतप्रत्ययस्तद्व्यवहारो वा, तत्र तदेव रूपं निमित्तम्, न तु जातिः काचित्तदनुरोधात्कल्प्यते । तथा सति अनक्षपदार्थेभ्यो घटादिभ्यो व्यावृत्तेन रूपेण विभीतकादिषु साम्यावगमादक्षत्त्वादिजातिः कल्प्या प्रसज्येत । इतोऽपि नानुभूतित्वं नाम स्मृतिव्यावृत्ता जातिः । तथाहि—'घटः स एवायम्'ति तावत्प्रत्यभिज्ञा जायते, सा किं स्मृत्यनुभवरूपं ज्ञानद्वयम्, एकमेव वा विज्ञानमंशे स्मृतिरंशे चानुभवः, उत स्मृतिरेव, आहोस्विद् अनुभव एव ? हो जायगा । प्रत्येक को अर्थ मानने पर समुदाय में और समुदाय को अर्थ मानने पर प्रत्येक में अव्याप्ति हो जायगी । निर्वचनकर्ता—प्रत्यक्षादि-चतुष्टय में होनेवाली 'स्मृतिभिन्नं ज्ञानम्' इत्याकारक अनुगतप्रतीति साक्षात्त्व-जाति से नहीं हो सकती । अतः उसके अनुरोध से अनुभूतित्व जाति माननी ही पड़ेगी । खंडनकर्ता—प्रत्यक्षादि-चतुष्टय में 'स्मृति-भिन्नम्' यह जो अनुगत प्रतीति होती है, उसमें स्मृतिभिन्न-ज्ञानत्व ही निमित्त है । अतः उसके अनुरोध से अनुभूतित्व जाति की कल्पना उचित नहीं । अन्यथा पाश्रा, विभीतक तथा इन्द्रिय आदि में भी 'अनक्ष-पदार्थभिन्नम्' इत्याकारक अनुगत प्रतीत होती है । इसलिए उसके अनुरोध से अक्षत्व-जाति भी मान ली जायगी । किञ्च—स्मृतित्व अनुभूतित्व को छोड़कर स्मृति में है, अनुभूतित्व स्मृतित्वको त्यागकर प्रत्यक्षादि चार में है और दोनों प्रत्यभिज्ञा में हैं, इस तरह सङ्कर-दोष होने से भी अनुभूतित्व जाति हो ही नहीं सकती । समर्थनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा में अनुभूतित्व तथा स्मृतित्व दोनों हैं, इसमें प्रमाण न होने से सङ्कर नहीं है । फलतः अनुभूतित्व जाति हो ही सकती है । खंडनकर्ता—श्रवण कीजिये, 'स एव अयं घटः' यह जो प्रत्यभिज्ञा 'होती है, क्या वह स्मृति और अनुभव दो ज्ञान हैं अथवा एक ही ज्ञान ? या एक अंश में स्मृति और एक अंश में अनुभव है ? अथवा स्मृति ही है किंवा अनुभव ही ?

परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ६५ आद्ये य एष प्रत्यभिज्ञायां प्रागवस्थाविशिष्टादिदन्ताविशिष्टस्याभेदः प्रकाशते, स स्मृतावन्तर्भावयितुमशक्यः, अननुभूतवस्त्वेन संस्कारानुपनेयत्वात् । अत एव न तृतीयोऽपि । नाप्यनुभवेऽन्तर्भावयितुमसौ शक्यः, प्रत्यभिज्ञान- कालेऽनुभवेन प्रागवस्थाया असंवेदनात् । संवेदने वाऽनुभव एवेति शेषपक्षेऽन्तर्भावः स्यात्, स चाग्रे दूषयिष्यते । अत एव न द्वितीयः । प्रागवस्थाविशिष्टाभिन्नत्वांशे अनुभवस्वीकारश्चेत् प्रागवस्थावैशिष्ट्यमप्यनुभवविषय एव निविष्टमिति चरमपक्षप्रवेशः । अथ प्रागवस्थाविशिष्टादभिन्न इत्ययमर्थोऽप्यनेकांशः, तत्र प्रागवस्थाविशिष्ट इत्यत्रांशे स्मृतित्वम्, अभिन्न इत्यत्रांशे चानुभवत्वमित्युच्यते । एवं तर्हि प्रागवस्था- विशिष्टः स इदन्ताविशिष्टोऽभिन्नश्चायमिति स्मृत्यनुभूतिभ्यामावेदितं भवति, यदि प्रत्यभिज्ञा को स्मृति और अनुभव उभयरूप मानें, तो उसमें प्राग- वस्थाविशिष्ट से इदन्ता-विशिष्ट का जो अभेद भासता है, उसका अन्तर्भाव कहाँ होगा ? स्मृति में तो हो नहीं सकता, क्योंकि वह अंश पूर्वकाल में अनुभूत न होने से उसका संस्कार ही नहीं है । अतएव 'प्रत्यभिज्ञा स्मृति है' यह तृतीय पक्ष भी असङ्गत है । फिर अनुभव में भी अभेद के भान का अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि प्रत्यभिज्ञाकाल में चक्षुःसन्निकर्ष न होने से प्रागवस्था अनुभव का विषय नहीं रहती । यदि प्रागवस्था को अनुभव का विषय मानें, तो 'प्रत्यभिज्ञा अनुभव ही है' इस चतुर्थ पक्ष में प्रवेश हो जायगा । उस पक्ष का खण्डन आगे करेंगे । अतएव 'प्रत्यभिज्ञा के एक अंश में अनुभूति तथा दूसरे अंश में स्मृति है' यह द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं, क्योंकि यदि प्रागवस्थाविशिष्ट के साथ इदन्ताविशिष्ट के अभेद को अनुभव का विषय मानें, तो विशेषण में प्रविष्ट प्रागवस्था का वैशिष्ट्य भी अनुभव का ही विषय हो जायगा । अतः उसका अन्तिम पक्ष में अन्तर्भाव हो जायगा । निर्वचनकर्ता—'प्रागवस्थाविशिष्ट से अभिन्न यह है' यह भी दो अंशों से युक्त है । उनमें 'प्रागवस्थाविशिष्ट' यह अंश स्मृति है और 'अभेद' एवं इदन्तावैशिष्ट्य ये अंश अनुभव हैं । खंडनकर्ता—यदि ऐसा है, तो 'प्रागवस्था से विशिष्ट वह' इतना अर्थ स्मृति-अंश का विषय है तथा 'इदन्ता-विशिष्ट से अभिन्न यह' इतना अर्थ अनुभव-अंश का विषय है, 'प्रागवस्था से विशिष्ट के साथ अभेद' किसी अंश का

६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रागवस्थाविशिष्टाश्रयतया त्वभेदः केनापि न प्रकाशित इति य एव प्रागवस्था- विशिष्टः स एवायमिति प्रत्यभिज्ञायाः शरीरं न स्यात् । अथानुभवेन योऽसौ अनुभूयमानधर्म्याश्रयतया अभेदो बोधितः, स कोट्य- न्तरमनालम्ब्य न पर्यवस्यतीति केनचित् खलु कस्यचिदभेदो भवति । ततः स्मृत्यंशोपनीतमेव सन्निधानात् कोट्यन्तरं प्रागवस्थाविशिष्टरूपमालम्बत इत्यभेदस्य प्रागवस्थाविशिष्टाश्रयतासिद्धिरिति । तदेतत्तुल्योत्तरम् । 'कोट्यन्तरमालम्बते' इति किं कोट्यन्तराश्रितो भवति, उत् कोट्यन्तराश्रिततया ज्ञायत इति ? नाद्यः; अभेदस्येदानीं प्रागवस्थाविशिष्ट- धर्म्याश्रयेणोत्पत्तौ पूर्वं प्रागवस्थाविशिष्टेदन्ताविशिष्टयोर्भेदः स्यात् । द्वितीये तु यदेव कोट्यन्तराश्रिततया इदन्तावच्छिन्नधर्म्यभेदस्य ज्ञानं तत्स्मृतौ नान्तर्भावयितुं शक्यम्, नाऽप्यनुभवांश इत्युक्त एव दोषः । विषय नहीं । अतः 'जो प्रागवस्था से विशिष्ट है, वही इदन्ता-विशिष्ट है,' यह प्रत्यभिज्ञा का स्वरूप नहीं हो सकता । निर्वचनकर्ता—अनुभव-अंश का विषय जो अभेद है, वह अन्य कोटि ( प्रतियोगी ) के अवलम्बन के बिना उसका विषय हो नहीं सकता; क्योंकि किसीसे ही किसीका अभेद होता है । तब तो वह सन्निधान होने से स्मृति-अंश का विषय प्रागवस्था-विशिष्ट का ही प्रतियोगिरूप से आलम्बन करेगा । इस तरह अभेद प्रागवस्था- विशिष्टप्रतियोगिक सिद्ध हो ही जाता है । खण्डनकर्ता—'कोट्यन्तर का आलम्बन करता है' इस पंक्ति का अर्थ क्या है— 'क्या वह अभेद इस समय प्रागवस्था-विशिष्ट का प्रतियोगिरूप से आश्रयण करता है' अथवा 'इदानीं प्रागवस्था-विशिष्ट के प्रतियोगित्व-रूप से ज्ञात होता है'? यदि प्रथम पक्ष मानें, अर्थात् अभेद यदि इदानीं प्रागवस्था- विशिष्ट-प्रतियोगितया उत्पन्न होता है, तो इससे पूर्व प्रागवस्था-विशिष्ट से इदन्ता- विशिष्ट का भेद सिद्ध होगा । यदि द्वितीय पक्ष मानें, तो जो प्रागवस्था-विशिष्ट के साथ इदन्ता-विशिष्ट के अभेद का जो ज्ञान होता है, वह स्मृति या अनुभव में पूर्वोक्त प्रकार से अन्तर्भाव नहीं हो सकता । अतः उक्त दोष होगा ।

परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ६३ किञ्च—यदा प्रत्यभिज्ञानं ‘सः’ इत्यंशे स्मृतिः ‘अयमि’त्यंशे चानुभव इत्येकं ज्ञान- मभ्युपेयते, तदा धर्मिणमादायापि स्मृत्यनुभवसङ्करो दुर्वारः। तथा हि-संस्कारेण तत्तामात्रं वाऽपनीयेत, तत्ताविशिष्टो वा धर्मी ? आद्ये स इति प्रत्यभिज्ञायाः शरीरं न स्यात्, तत्तायाः केवलायाः संस्कारेणोपनीतत्वात्। नापि द्वितीयः, तथा सति ‘अयम्’ इत्यनुभवांशेऽपि धर्मिप्रकाशो वक्तव्य एव। अन्यथा इदन्तामात्र- प्रकाशेऽयमिति तच्छरीरं न स्यात्। एवञ्च संस्कारस्य चेन्द्रियस्य च धर्मिप्रतीतिहेतोरुभयस्योपनिपाते किं विशेष्यांशे भिन्नाभ्यां ज्ञानाभ्यामुत्पत्तव्यम्, उत कारणद्वयसम्मेदादभेदभाजा ज्ञानेन ? प्रथमे प्रत्यभिज्ञानस्य एकज्ञानव्यक्तिताभ्युपगमव्याघातः, भेदपक्षोक्तदूषणापातश्च। द्वितीये धर्म्यंशे प्रत्यभिज्ञायाः स्मृतित्वमप्यनुभवत्वमपीति अनुभूतिस्मरणसङ्कर इति विषयव्यवस्थयाऽपि नियमो भग्नः। किञ्च--जब प्रत्यभिज्ञा को ‘सः’ इस अंश में स्मृति तथा ‘अयम्’ इस अंश में अनुभव मानें, तो धर्मी को भी लेकर स्मृतित्व और अनुभवत्व का संकर होगा। देखिये, संस्कार से केवल तत्ता उपनीत होती है अथवा तत्ता-विशिष्ट धर्मी ? यदि तत्तामात्र उपनीत होता है, तो प्रत्यभिज्ञा का आकार ‘सः’ न होना चाहिए, क्योंकि केवल तत्ता ही संस्कार से उपनीत होती है। यदि तत्ता-विशिष्ट धर्मी उपनीत होता हो, तो ‘अयम्’ इस अनुभव-अंश में भी धर्मी का भान मानना ही पड़ेगा। अन्यथा इदन्ता-मात्र का प्रकाश होने पर ‘अयम्’ यह प्रत्यभिज्ञा का आकार ही नहीं होगा। यदि धर्मी की प्रतीति का हेतु संस्कार तथा इन्द्रियसन्निकर्ष दोनों को मानें, तो क्या उनसे विशेष्यांश में स्मृति और अनुभव दो ज्ञान उत्पन्न होंगे अथवा दो कारणों के मेल से एक ही ज्ञान ? प्रथम पक्ष में ‘प्रत्यभिज्ञा एक ज्ञान है’ इस कथन से व्याघात (विरोध) हो जायगा। साथ ही तत्ता-विशिष्ट के साथ इदन्ता-विशिष्ट का अभेद किस ज्ञान का विषय हो, इसमें कोई प्रमाण न होने से वह किसी का भी विषय न होगा। यदि द्वितीय पक्ष मानें, तो प्रत्यभिज्ञा में धर्मी-अंश में स्मृतित्व और अनुभवत्व दोनों होने से स्मृति और अनुभव का संकर हो जायगा। फलतः तत्ता-इदन्तारूप विषय की व्यवस्था (भेद) से भी स्मृतित्व और अनुभवत्व के असङ्कर का नियम भग्न ही है। अर्थात् केवल एक अधिकरण में समावेश होने से संकर नहीं होता, किन्तु एक अवच्छेद से समावेश होने से ही सङ्कर होता है—यह भी आप नहीं कह सकते। क्योंकि उक्त प्रकार से धर्मीरूप एक ही अवच्छेद से समावेश है। अतः अनुभूतित्व जाति नहीं है। १३

६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अथोच्यते—मा भूद्विषयोपाधिभेदाद् व्यवस्थानम्, उपाध्यन्तरात्तु भविष्यति । तद्यथा संस्कारजत्वमादाय स्मृतित्वव्यवस्थितिः, इन्द्रियसन्निकर्षजत्वमादाय चानुभवत्वव्यवस्थानमिति विरोधपरिहारोऽस्तु । न ; प्रमात्वसामान्यानङ्गीकारे प्रमाणरूपताया विषयव्यवस्थित्यैवोपगमेन उपाध्यन्तरोपन्यासेऽपि स्मृतित्वानुभूति- त्वयोरेकस्मिन्नेव धर्मिण्यर्धे निवेशात् प्रमात्वाप्रमात्वयोरेकविषयतैव । किञ्च—ज्ञानविकल्पानामध्यात्मं भावाभावसंवेदनात् स्मृतित्वानुभूतित्वयो- र्द्वयोरपि प्रत्यभिज्ञायां स्वतः प्रतिभानेन विषयनिरूपणव्यवस्थित्यनङ्गीकारे स्मृति- त्वादेरिदन्तायामपि स्मृत्यवगमप्रसङ्गात् । यदि च संस्कारजत्वमेव स्मृतित्वम्, तदा तस्यैव विरोधेऽभिधीयमाने स एव विरोधसामञ्जस्याय उपाधिरुपन्यस्यत इति नान्यस्य चेतसि निविशते । निर्वचनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा में विषय-भेदरूप हेतु से भले ही स्मृतित्व तथा अनुभवत्व की व्यवस्था न हो, अन्य-उपाधि ( निमित्त ) से तो होगी ही । अर्थात् संस्कारजत्व अवच्छेद से स्मृतित्व की तथा इन्द्रिय-सन्निकर्षजत्व अवच्छेद से अनुभवत्व की व्यवस्था होगी । इस तरह स्मृतित्व तथा अनुभवत्व का सङ्कर नहीं होगा । अर्थात् एक ही अवच्छेद से एक अधिकरण में स्थिति के होने पर सङ्कर होता है। यहाँ यद्यपि दोनों एक ही अधिकरण में हैं, परन्तु अवच्छेदक भिन्न हैं, अतः संकर नहीं होगा । खण्डनकर्ता—आप प्रत्यक्षत्व के साथ सङ्कर होने से प्रमात्व को जातिरूप नहीं मानते, किन्तु तत्त्वानुभूतित्वादि रूप ही मानते हैं । अतः यदि संस्कारजत्व, इन्द्रियजत्व आदि उपाधियों को स्मृतित्व और अनुभवत्व का अवच्छेदक मानें, तो प्रत्यभिज्ञा में एक ही धर्मी-अंश में स्मृतित्व और अनुभूतित्व दोनों का सन्निवेश होने से प्रत्यभिज्ञा के एक ही धर्मी-अंश में प्रमात्व और अप्रमात्व का भी सन्निवेश हो जायगा, क्योंकि अनुभव प्रमा है तथा स्मृति अप्रमा । किञ्च—ज्ञान-भेदों के भाव ( अनुभूतित्व आदि धर्म ) और अभाव, दोनों ही मानस-प्रत्यक्ष के विषय होने से यदि स्मृतित्वादि की व्यवस्था विषय के अधीन न मानें, तो इदन्त्व-अंश में भी स्मृतित्व का और तत्ता-अंश में भी अनुभवत्व का भान हो जायगा । किञ्च—प्रत्यभिज्ञा के संस्कारजत्व-अंश में स्मृतित्व तथा इन्द्रियजत्व-अंश में अनुभवत्व दोनों धर्म रहते हैं, यह कथन भी उचित नहीं; क्योंकि संस्कारजत्व ही

परिच्छेद ] अनुभूतिश्व-जाति का खण्डन ६६ अथान्यत् स्मृतित्वं नाम, तदाऽप्यनुपपत्तिः । तथा हि—संस्कारजत्वं संस्कारादनन्तरं नियमेन भावः । नियतत्वञ्च नानाव्यक्तिगतमेकं रूपं सङ्ग्राहकम- क्रोडीकृत्य असम्भवतीति स्मृतित्वेनैव संस्कारजत्वं वक्तव्यम् । तथा च संस्कारजत्व- व्यवस्थितौ स्मृतित्वमुपाधिः, स्मृतित्वव्यवस्थितौ च संस्कारजत्वमित्यन्यो- न्याश्रयः । तस्मात् स्मृत्यनुभवसङ्करो दुर्वार एव । अपि च स्मृत्यनुभवयोर्ये कारणसामग्र्यौ, ते प्रत्यभिज्ञायां मन्तव्ये न वा ? न चेत् कथमंशतोऽपि स्मृतित्वमनुभवत्वञ्च प्रत्यभिज्ञानस्य । एवमेव तथात्वेऽतिप्रसङ्गात् स्मृत्यनुभूत्योः स एव सङ्करः । प्रथमे तु पृथगेव कार्योत्पत्तिप्रसङ्गः, प्रत्येकं स्वस्व- कार्ये समर्थत्वात्, सामग्रीभेदस्य कार्यभेदहेतुत्वेनावधारितत्वात् । अथ यत्र ते पृथक् जायेते तत्र पृथगेव कार्यम् । प्रत्यभिज्ञायान्तु तयोर्युगपज्जा- तत्वेन सम्भूय जननात्करम्बितकार्योत्पत्तिः । यद्यपि घटपटादिसामग्र्योर्नैवं दृश्यते, स्मृतित्व है । अतः 'संस्कारजत्व-अंश में स्मृतित्व है' इस वाक्य का 'स्मृतित्व-अंश में स्मृतित्व है' यही अर्थ हुआ, जो आत्माश्रय होने से अनुचित है । निर्वचनकर्ता—स्मृतित्व जाति या तत्तोल्लेखि ज्ञानत्व है, अतः आत्माश्रय नहीं है । खण्डनकर्ता—संस्कारजत्व संस्कार के अव्यवहित उत्तरकाल में वृत्तित्व ही है । कार्यतावच्छेदक धर्म स्वीकार के बिना वह अनेक व्यक्तियों में रह नहीं सकता । अतः स्मृतित्व को ही कार्यता का अवच्छेदक मानना पड़ेगा । तब तो स्मृतित्वावच्छेदेन संस्कारजत्व और संस्कारजत्वावच्छेदेन स्मृतित्व मानने में अन्योन्याश्रय हो जायगा । अपिच—स्मृति और अनुभव की जो कारण-सामग्रियाँ हैं, वे प्रत्यभिज्ञा में हैं या नहीं ? यदि नहीं, तो अंशतः भी प्रत्यभिज्ञा स्मृति और अनुभव कैसे होगी ? यदि संस्कारजत्व के बिना ही स्मृतित्व मानें, तो स्मृति में अनुभवत्व और अनुभूति में स्मृतित्व का अतिप्रसंग होने से प्रत्यभिज्ञा से सम्पूर्ण अंश में स्मृतित्व तथा अनुभवत्व मानने पड़ेंगे । यदि दोनों की सामग्री हो, तो अलग-अलग कार्य होंगे; क्योंकि सामग्री अपने- अपने कार्य में ही समर्थ है। अन्यथा सामग्री-भेद से कार्य-भेद का निश्चय नहीं होगा । समर्थनकर्ता-जहाँ पृथक्-पृथक् सामग्री रहती है, वहाँ कार्य भी पृथक्-पृथक् होते हैं । प्रत्यभिज्ञा में दोनों सामग्रियाँ मिलकर कार्य उत्पन्न करती हैं। अतः चित्र- कार्य उत्पन्न होगा । यद्यपि घट-पटादि सामग्रियाँ मिलकर करम्बित ( चित्र ) कार्य उत्पन्न

१०० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम तथापि तद्विलक्षणस्वभावत्वादुनयोरीदृशत्वमुपपद्यते । न हि एकस्य यादृक् पदार्थस्य स्वभावस्तादृगन्यस्यापि सर्वस्य भवति, जगद्वैचित्र्यभङ्गप्रसङ्गादिति । नैतदस्ति । यत्र हि मिलितत्त्वं तयोस्तत्र किं परस्परसहकारित्वमनयोरेष्टव्यं न वा ? न चेत्, परस्परमेलनकलक्षणो विशेषोऽनुपयोगी, कार्यजननं प्रति मिथः सह- कारिभावविरहेणाप्रयोजकत्वात् । ततश्चाविशेषात् पृथगेव कार्यं प्रसज्येत । अथ पर- स्परसहकारित्वं तयोरिष्यते; तदा अनुभवांशेऽपि संस्कारस्य व्यापारः, स्मरणांशे- ऽप्यक्षस्येति नियामकत्वाभिमतयोस्तयोरुभयांशे साधारणत्वात् स्मृत्यंशेऽप्यनुभूतिरनु- भूत्यंशेऽपि स्मरणमिति वज्रलेपायितं प्रत्यभिज्ञायामनुभूतिस्मृतिसङ्करेखेति । 'नाऽप्यनुभव एवेति पक्षः; तथा सति तत्तावच्छिन्नस्यामेदाश्रयतायां न संस्कारो नेन्द्रियसन्निकर्षश्चेति तद्विषयत्वापातः । नहीं करती; तथापि अनुभव और स्मृति की सामग्री का स्वभाव विलक्षण है । अतः वह मिलकर चित्र-कार्य कर सकती है । क्योंकि एक वस्तु का जैसा स्वभाव है, वैसा ही अन्य पदार्थों का नहीं होता । अन्यथा जगत् की विचित्रता न रह जायगी । खण्डनकर्ता—जहाँ स्मृति तथा अनुभव दोनों की सामग्रियाँ मिलती हैं, वहाँ उन में परस्पर सहकारित्व है या नहीं ? यदि नहीं, तो चित्र-कार्य की उत्पत्ति में सामग्री- सम्मेलनरूप विशेष अनुपयोगी होगा । क्योंकि परस्पर सहकार न होने से वह अप्र- योजक है । फिर अप्रयोजक होने से अलग-अलग कार्य की आपत्ति होगी । यदि परस्पर दोनों सामग्रियों में सहकार इष्ट हो, तो प्रत्यभिज्ञा के अनुभवांश में संस्कार का और स्मरणांश में इन्द्रिय का व्यापार है, फलतः सामग्रि द्वयरूप नियामक के उभयांश-साधा- रण होने से स्मृति-अंश में अनुभवत्व तथा अनुभव-अंश में स्मृतित्व है । इसलिए प्रत्यभिज्ञा में स्मृतित्व और अनुभवत्व दोनों का सङ्कर वज्र-लेपसा स्थिर हो जायगा । 'प्रत्यभिज्ञा अनुभव है' यह चरम पक्ष भी उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्यभिज्ञा को अनुभव मानने पर तत्तावच्छिन्न के अभेद में न संस्कार है और न इन्द्रिय का सन्निकर्ष ही, अतः अभेद प्रत्यभिज्ञा का विषय नहीं होगा । प्रत्यभिज्ञानिरासः ।

परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन १०१ न च संस्कारद्वारा प्रत्यासत्त्या सम्बद्धविशेषणतया तद्ग्रहः; क्वचित् सोऽयं न वेति तर्हिसंशयो न स्यात् । दोषवशात्तत्र तत्प्रकाशो न सम्बद्धविशेषणत्वादिति चेन्न । विनाऽपि संस्कारं दोषवशात्तदापत्तेः । वस्तुप्रकाशिनि च दोषत्ववाचोयुक्त्यनिरुक्तेः । क्वापि तस्यावस्तुप्रकाशित्वादोषत्वे तु, कथमन्नादेरपि तन्न स्यात् । विशिष्टत्वेन तथात्वस्य प्रकृतेऽप्यपरिहारात् । न हि विनैव कुतोऽपि विशेषादस्यावस्तु- समर्थनकर्ता—चक्षु से ही संयुक्त-संयुक्त-समवेत-विशेषण-विशेषणतारूप सन्निकर्ष- द्वारा इदन्ता से उपरक्त अभेद भी भासेगा । देखिये, इन्द्रिय-संयुक्त मन तथा मन से संयुक्त आत्मा है, आत्मा में समवेत ( समवाय संबंध से रहनेवाला ) संस्कार है, संस्कार में विशेषण घट और घट में विशेषण तत्ता-विशिष्ट अभेद है । इस प्रकार उक्त सन्निकर्ष से अभेद के अनुभवविषय होने में कोई क्षति नहीं है । खण्डनकर्ता—उक्त सन्निकर्ष को यदि प्रत्यक्षरूप निश्चय का कारण माना जाय, तो कहीं भी 'सोऽयं न वा' यह प्रत्यभिज्ञारूप सन्देह नहीं होगा, क्योंकि सन्निकर्ष से सर्वत्र प्रत्यभिज्ञारूप निश्चय ही होता है । समर्थनकर्ता—प्रकृत स्थल में यद्यपि उक्त सन्निकर्ष है; तथापि दोष होने से सन्देह- रूप ( ज्ञान ) प्रकाश ही होता है । खण्डनकर्ता— फिर तो जहाँ संस्कार ( भावना ) तथा उक्त सन्निकर्ष न हों, वहाँ भी दोष से प्रत्यभिज्ञारूप सन्देह होना चाहिए । समर्थनकर्ता—जहाँ दोष, संस्कार और सन्निकर्ष तीनों हों, वहाँ तो प्रत्यभिज्ञारूप उक्त सन्देह होता है । किन्तु जहाँ दोष न होकर सन्निकर्ष और संस्कार ही हों, वहाँ निश्चयरूप प्रत्यभिज्ञा ही होती है । खंडनकर्ता—वस्तु के अप्रकाशक को 'दोष' कहते हैं । सन्देह-स्थल में तो वस्तु का प्रकाश होता है, अतः वहाँ दोष का लक्षण ही कैसे जायगा ? समर्थनकर्ता—कहीं-कहीं ( 'इदं रजतम्' इस भ्रम या सन्देह की ही अन्य कोटि में ) अवस्तु का प्रकाशक होने से दोष-लक्षण का समन्वय हो जायगा । खंडनकर्ता— यदि कहीं-कहीं अवस्तु के प्रकाशक होने से ही दोषत्व मान लें, तो 'इदं रजतम्' इस भ्रम- स्थल में अवस्तु का प्रकाशक होने से इन्द्रिय भी दोष हो जायगा । समर्थनकर्ता—शुक्ति में 'इदं रजतम्' इस भ्रम में दोष-विशिष्ट इन्द्रिय कारण है । अतः 'नागृहीतविशेषणा बुद्धिः विशेष्यमुपसंक्रामति' इस न्याय से विशेषण ही दोष है, इन्द्रिय नहीं । खंडनकर्ता—फिर तो इसी रीति से चक्षुरादिविशिष्ट दोष को सन्देह या भ्रम का कारण मानकर 'नागृहीतविशेषणां' इस न्याय से इन्द्रिय ही दोष क्यों न हो ।

१७२ सानुवादं खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम प्रकाशिता। सत्यप्यर्थे दोषादवस्तुन एव प्रकाशे संशयात् प्रेक्षावत्प्रवृत्त्यादेरसम्भ- वापत्तेः । वस्तुविषयत्वेऽपि दोषादनिश्थयतेति चेन्न। वस्तुतस्तस्यासङ्कीर्णत्वात्तस्य प्रकाशे तदेव संशयैककोटौ प्रकाशितमिति कुत्र तदनिश्थयता। निश्चयार्थस्य च संशय- कोटावखण्डने संशये तदभावाधिकग्राहित्वेऽपि निश्चयत्वस्याप्रत्यूहत्वादेव अभाव- निश्चयः कोट्यन्तरं केवलमधिकं स्यात् । जातिः संशयत्वम्, तत्प्रयोजकश्च दोष इति चेन्न। 'इदं तद्वा न वा' इति संशयकोट्यर्थनिर्देशसमन्वयेन वा-शब्दप्रतीतिव्यवहारयोरभावापत्तेः । प्रतीत्या सह वाकारार्थसम्बन्धे 'प्रत्येमि न वे'ति तदापत्तेः । वाकारार्थस्य प्रतीतिगतत्वेऽपि क्योंकि दोष भी किसी विशेष (इन्द्रियादि) के बिना अवस्तु का प्रकाश नहीं करता। समर्थनकर्ता—सन्देह या भ्रम-स्थल में वस्तु है, परन्तु दोष वश वह भासती नहीं, अवस्तु ही भासती है। खंडनकर्ता—यदि सन्देह में वस्तु नहीं भासती, तो वस्तु के सन्देह से बुद्धिमान् की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए। समर्थनकर्ता—प्रवृत्ति के अनुरोध से वस्तु सन्देह का विषय अवश्य होती है, परन्तु सन्देह में जो अनिश्चयाकारत्व है, उसमें दोष ही कारण है। खंडनकर्ता—धर्मी संकीर्ण (स्थाणु और पुरुष उभयाकार) नहीं, किन्तु एकरूप ही है। यदि वही सन्देह में भासता है, तो सन्देह अनिश्चयरूप कहाँ रहा, जिसका कारण दोष होगा? समर्थनकर्ता—यदि पुरुषरूप धर्मी में केवल पुरुषत्व का ही भान होता, तो सन्देह को निश्चय अवश्य कहते। परन्तु यहाँ तो स्थाणुत्व या पुरुषत्वाभाव का भी उल्लेख होता है। अतः वह निश्चय नहीं, अनिश्चयरूप ही है और उसका कारण दोष है। खंडनकर्ता—निश्चय के विषय पुरुषत्वविशिष्ट पुरुष का बाधक प्रतीति से खण्डन तो होता नहीं है, अतः उस अंश में सन्देह भी निश्चयरूप ही है। सन्देह में जो अभाव- रूप अधिक भासती है, उस अंश में भी विपर्ययरूप निश्चय ही है। किसी अंश में अनिश्चय रूप नहीं है। फिर दोष किसका कारण है? समर्थनकर्ता—विरुद्ध उभयकोटिक सन्देह निश्चय होने पर भी एककोटिक निश्चय से विलक्षण है, यह तो आप अवश्य मानेंगे। हम उसी वैलक्षण्य को सन्देहत्व कहते और दोष को उसका प्रयोजक मानते हैं। खंडनकर्ता—'स्थाणुः पुरुषो वा' इस सन्देह-कोटि के वाचक स्थाणु और पुरुष शब्द के सामानाधिकरण्य से 'वा'

[Page Header] परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन १०३


निश्चयत्ववत् 'स्थाणुमानय पुरुषं वे'ति स्थाणुपुरुषगतपाक्षिकव्यवहारानापत्तेः । तस्माद् वाकारार्थस्य ज्ञानधर्मत्वे साक्षात्कारित्वादिवद्विषयानन्वयापत्तिरेवेति । न च प्रत्यासत्तौ सत्यामपि प्रत्यासत्त्यपुरस्कारान्मनसा न ग्रहणं तत्र दोष- वशादित्यस्तु । दोषे सत्यपि वस्तुनः संस्कारेण, संस्कारस्य चाऽऽत्मना, तस्य च बाह्येन्द्रियेण, प्रत्यासत्त्यपेक्षम् एव तदर्थप्रकाशादिनियमोपपत्तेः कः पुनः प्रत्या- सत्त्यपुरस्कारस्त्वन्मते स्यात् । यदि तु संस्कारप्रत्यासत्तिमनपेक्ष्य तथा सन्दिह्यते, तदा अननुभूय प्रस्मृत्य वा तथा सन्दिह्येत । वस्तुतस्तु मनसा संस्काराग्राहिणा, चक्षुरादिना च आत्माऽग्राहिणा, तादृश- प्रत्यासत्त्या ग्रहणानुपपत्तेः, नियमेन तदिन्द्रियाग्राह्याश्रयकप्रतियोगिकेतरस्य ग्रहणे शब्द की प्रतीति ( श्रावण प्रत्यक्ष ) या व्यवहार देखा जाता है । अतः 'वा' शब्द के अर्थ अव्यवस्थितत्व का अन्वय भी उन्हीं दो कोटियों में होता है । विषय के अव्यवस्थाकृत इस निश्चय से ही सन्देह में वैलक्षण्य है, सन्देहत्व-जातिकृत नहीं । समर्थनकर्ता—प्रतीतिगत अव्यवस्थिति 'वा' शब्द का अर्थ है, विषयगत अव्यव- स्थिति नहीं । अतः हम तो प्रतीतिगत अव्यवस्थिति को ही सन्देहत्व-जाति कहते हैं । खंडनकर्ता—यदि प्रतीतिगत अव्यवस्थिति वाशब्द का अर्थ होता, तो 'प्रत्येमि न वा' यही आकार होता, 'स्थाणुर्न वा' यह आकार न होता । किञ्च—यदि 'वा' शब्दार्थ अव्यवस्थितत्व को प्रतीति का धर्म मानें, तो साक्षात्त्व और प्रमात्व के तुल्य विषय के साथ 'वा'शब्दार्थ का अन्वय नहीं होगा । समर्थनकर्ता—उक्त प्रत्यासत्ति है सही, परन्तु दोष से उसका तिरस्कार होने पर निश्चयरूप प्रत्यभिज्ञा नहीं होती । किन्तु 'इदं तद् वा न वा' इत्याकारक सन्देहरूप प्रत्यभिज्ञा ही होती है । खंडनकर्ता—सन्देहरूप प्रत्यभिज्ञा भी दोष होने पर, वस्तु से संस्कार, संस्कार से आत्मा, आत्मा से मन, मन से चक्षु की प्रत्यासत्ति होने पर ही होती है । फिर प्रत्यासत्ति का अपुरस्कार क्या हुआ ? यदि प्रत्यासत्ति की अपेक्षा न कर सन्देहरूप प्रत्यभिज्ञा होती है—ऐसा माना जाय, तो तत्ता-विशिष्ट का पूर्व-काल में अनुभव न होने पर भी इदानीं तत्ताविशिष्ट का स्मरण होने पर सन्देहरूप प्रत्यभिज्ञा भी हो सकती है--यह भी मान लेना चाहिए । क्योंकि जब निर्युक्तिक ही मानना है, तो ऐसा भी क्यों न माना जाय ? वस्तुतः संस्कार को ग्रहण न करनेवाले मन तथा आत्मा को ग्रहण न करनेवाले चक्षु से उक्त प्रत्यासत्ति द्वारा तत्ताविशिष्ट से इदन्ताविशिष्ट के अभेद का ग्रहण हो

स्वग्राह्यसम्बद्धविशेषणतायाः प्रत्यासत्तित्वनियमात् । अन्यथा आप्यपरमाण्वादौ पृथिवीत्वादेरन्यत्र ग्राह्यतया निरस्तस्वरूपयोग्यत्वस्याभावो दृगादिभिर्गृह्येत । न हि इन्द्रियविहारदेशेषु निष्परमाणुकत्वनियमो युक्ताभ्युपगमः । शब्दाभावप्रत्यक्षत्व- वादिनवे श्रोत्रेन्द्रियविशेषणता सप्तमः सन्निकर्षः, न तु तत्र सम्बद्धविशेषणतेत्यतो- ऽपि न व्यभिचारः । नहीं सकता । क्योंकि जलीय परमाणु में ग्रहण के स्वरूप-योग्य पृथिवीत्व का अभाव चक्षु से गृहीत न हो, इसलिए उस इन्द्रिय से सम्बद्ध विशेषणतारूप प्रत्यासत्ति तत्तत् इन्द्रिय- जन्य ज्ञान के विषय पदार्थ से घटित ही होती है, अग्राह्य पदार्थ से नहीं, ऐसा नियम है। समर्थनकर्ता—पृथिवीत्वाभाव के साथ संबद्ध-विशेषणता भी नहीं है, क्योंकि जलीय परमाणु के साथ चक्षुःसन्निकर्ष नहीं है। फलतः जल-परमाणु में पृथिवीत्वाभाव का ग्रहण नहीं होता। अतः 'सम्बद्ध-विशेषणता ग्राह्य पदार्थ से घटित ही होती है' इस नियम को मानना उचित नहीं है। खंडनकर्ता—इन्द्रिय-प्रचारस्थल में सर्वत्र ही चतुर्विध परमाणु व्याप्त हैं। अतः जलीय परमाणु के साथ चक्षुःसन्निकर्ष नहीं है, यह कथन उचित नहीं। समर्थनकर्ता—यह नियम नहीं है कि उस-उस इन्द्रिय से सम्बद्ध-विशेषणता स्वग्राह्य- पदार्थ से घटित ही होती है। क्योंकि घ्राण तथा रसनेन्द्रिय से गन्धाभाव तथा रसा- भाव का घ्राण या रसना से अग्राह्य पुष्प एवं गुड़ से घटित घ्राण-संयुक्त पुष्प-विशेषणता अथवा रसना-संयुक्त गुड़-विशेषणता से भी ग्रहण होता है। खंडनकर्ता—उन-उन गन्ध आदि की ग्राहक इन्द्रियों से अग्राह्य हैं आश्रय जिनके— ऐसे पदार्थ (गन्धादि) प्रतियोगी हैं जिन अभावों के, उनसे इतर पदार्थों का जहाँ ग्रहण होता है, उस स्थल के लिए यह नियम है; गन्धाद्यभाव के ग्रहण के लिए नहीं। शब्दाभाव का प्रत्यक्ष माननेवाले नैयायिक के मत में श्रोत्रेन्द्रियविशेषणता सप्तम सन्निकर्ष है, सम्बद्ध-विशेषणता नहीं। अर्थात् स्वग्राहक इन्द्रियों से अग्राह्य हैं आश्रय जिनके—एवम्भूत पदार्थ हैं प्रतियोगी जिन अभावों के, उनसे इतर स्थल में यह विशे- षण न भी दें; तथापि शब्दाभाव-प्रत्यक्ष में व्यभिचार नहीं होगा। कारण 'स्वग्राह्य- पदार्थ से घटित विशेषणता ही प्रत्यासत्ति है' यह नियम सम्बद्धविशेषणतारूप षष्ठ सन्निकर्ष के लिए है; सप्तम शुद्ध विशेषणता (जो शब्दाभाव के प्रत्यक्ष में है) के लिए नहीं।

परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन १०५ न चाऽऽत्मसंयुक्तमनः प्रति. पूर्वानुभूतार्थात्मप्रत्यासत्तिरेव संस्कार इति तदती- न्द्रियत्वं न दोषाय, प्रत्यासत्तेरतीन्द्रियाया इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य उपगमादिति स्वीकृते निस्तारः । तथा सति स इत्यंशे चक्षुरादेः प्रत्यासत्त्यभावात् प्रत्यभिज्ञाया अचाक्षुषत्वापातात् । अयमित्यंशो दृगादिना, तदंशस्तु मनसा गृह्यताम्, तदेतद्- भेदस्तु केनेत्युक्तमप्यावर्तत इति । एतेन संस्कारः सहकारिमात्रमिन्द्रियस्यातिप्रसङ्गन्निवारकः, प्रत्यभिज्ञायां तदर्थ इन्द्रियेणासन्निकृष्ट एवोल्लिख्यते विभ्रमार्थवत् । सन्निकृष्टग्राहिता चेन्द्रियस्य सन्नि- कर्षसहकार्यवश्यम्भावमात्रम् । तच्चेदमंशसन्निकर्षादेव स्यात्, न तु सर्वग्राह्यसन्निकर्ष- सहकारितेत्यपि निरस्तम् । 'सोऽयं न वे'ति संशयाभावापातेनैवेति । समर्थनकर्ता—'स एवाऽहम्' इस प्रत्यभिज्ञा में संस्कार ही आत्म-संयुक्त मन की पूर्वानुभूत आत्मा में प्रत्यासत्ति है । 'स एवाऽयम्' इस प्रत्यभिज्ञा में भी संस्कार ही पूर्वानुभूत घट की प्रत्यासत्ति है । संस्काररूप प्रत्यासत्ति का अतीन्द्रियत्व दोष नहीं है, क्योंकि घट-प्रत्यक्षस्थल में भी चक्षुःसंयोगरूप प्रत्यासत्ति अतीन्द्रिय है । अतः प्रत्यासत्ति अतीन्द्रिय भी मानी जाती है । खंडनकर्ता—ऐसा होने पर 'सः' इस अंश में प्रत्यभिज्ञा चाक्षुष सिद्ध नहीं होगी । समर्थनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा 'सः' इस अंश में मानस तथा 'अयम्' इस अंश में चाक्षुष ही है—ऐसा ही मानें, तो क्या हानि है ? खंडनकर्ता—तत्ता-विशिष्ट से इदन्ता-विशिष्ट के अभेद में न संस्कार है और न सन्निकर्ष ही । अतः अभेदांश का न चाक्षुष प्रत्यक्ष होगा और न मानस ही, यह पूर्वोक्त दोष बना ही रह जायगा । समर्थनकर्ता—प्रत्यक्ष में यावत् विषयों के साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष कारण नहीं, किन्तु कहीं-कहीं यत्किञ्चित् विषय के साथ सन्निकर्ष भी कारण है । प्रकृत में 'इदम्' अंश के साथ चक्षुःसन्निकर्ष है । अतः तत्तांश, अभेद, इदमंश—सब प्रत्यक्ष में भासते हैं । असन्निकृष्ट अंश के भान में संस्कार सहकारी है, अतः संस्कार के अविषय असन्निकृष्ट पदार्थ का भान नहीं होता । खंडनकर्ता—अभेद-अंश में न सन्निकर्ष है और न अतिप्रसङ्गकारक संस्कार ही, अतः प्रत्यभिज्ञा में अभेद का भान नहीं होगा । किञ्च—सर्वत्र प्रत्यभिज्ञा की सामग्री निश्चयरूप होने से प्रत्यभिज्ञा भी निश्चयरूप ही होगी । कहीं भी 'सोऽयं न वा' इस प्रकार सन्देहरूप प्रत्यभिज्ञा नहीं होगी. क्योंकि सन्देह का प्रयोजक दोष उक्त युक्ति से खण्डित है । १४

१०६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम 'तदद्राक्षमि'त्यादिस्मृतिरपि चैवमनुभव एव स्यात् । मनस आत्मसंयोग- सहकृतादात्मार्थसन्निकर्षात् संस्कारात् जायमानायास्तस्या इन्द्रियार्थसन्निकर्ष- जत्वादेव, मनसा आत्मसंयोगादात्मसमवायेन प्रत्यक्षीक्रियमाणैर्ज्ञानादिभिः स्मर्य- माणस्य अर्थस्याविशेषादिति । एतेन तत्तावच्छिन्नप्रतियोगिकान्योन्याभावविरहः स्वरूपाभेदो वाऽयं भाती- त्यपि निरस्तम् । अन्योन्याभावव्यतिरेकोऽन्योन्यमेव तच्चेदन्तोपाध्यवच्छिन्नयोः स्यात्, न च तन्मिलितमेकेन सुग्रहम् । एवं स्वरूपाभेदेऽपि तयोधर्मैक्यं तदनव- गाहिना दुरवगममेव । संस्कारोपनीते च विषये यदि ज्ञानमनुभवः स्यात्, स्मृतिरपि कुतो नानुभूतिः ? किञ्च—संस्कार के प्रत्यासत्तित्व या सहकारित्व पक्ष में 'तद् अद्राक्षम्' यह स्मृति भी प्रत्यक्ष हो जायगी, क्योंकि 'मनःसंयुक्तआत्मसमवेत-संस्कारविषयत्व'रूप प्रत्यासत्ति में मन के साथ स्मर्यमाण पदार्थ के होने से पूर्वोक्त स्मृति भी आपकी रीति से इन्द्रियजन्य ही है । 'जानामि' इस अनुव्यवसाय में मनःसंयुक्तआत्मसमवाय- सन्निकर्ष से प्रत्यक्षीकृत ज्ञान से स्मृतिविषय तत्ताविशिष्ट में कोई विशेष नहीं है । स्मृति का विषय तो प्रत्यक्ष है नहीं, अतः 'जानते हैं' में संस्कारघटित प्रत्यासत्ति नहीं होती । समर्थनकर्ता—अभेद तत्ताविशिष्ट के भेद ( अन्योन्याभाव ) का अभावरूप अथवा स्वरूप-रूप हो, दोनों पक्षों में वह इदन्ताविशिष्ट धर्मी का स्वरूप ही है । अतः उसका इदन्ताविशिष्ट की ग्राहक-सामग्री से ही ग्रहण होने के कारण प्रत्यभिज्ञा अनुभव ही है । खंडनकर्ता—अन्योन्याभाव का अभाव अन्योन्यरूप ही है । प्रकृत में तत्ता और इदन्ता इन दोनों उपाधियों से युक्त धर्मी ही अन्योन्य पदार्थ है । वह अन्योन्य केवल संस्कार अथवा इन्द्रिय से गृहीत नहीं हो सकता । इसी तरह 'तत्' और 'इदं' दोनों का स्वरूप-रूप अभेद भी अन्योन्यरूप ही हैं, अतः वह अन्योन्य को अविषय करनेवाले इन्द्रिय से अग्राह्य ही है । किञ्च—यदि संस्कार से जन्य प्रत्यभिज्ञारूप ज्ञान अनुभव होता है, तो स्मृति भी अनुभव क्यों न हो ?

परिच्छेद ] अनुभूति-जाति का खण्डन १०९ अथ न संस्काराधीनत्वमात्रेण स्मृतित्वम्, किन्त्वनुभवकारणासम्पृक्त- संस्कारजत्वेन । ततश्चाधिकार्थाक्षसन्निकर्षापेक्षं प्रत्यभिज्ञानमनुभव एव भवति, न तु स्मृतिरिति चेन्न । संस्कारासम्पृक्तानुभवकारणजत्वेन अनुभवत्वं भवति, प्रत्यभि- ज्ञानन्तु संस्कारसहितानुभवकारणजं स्मृतिरेवेति वैपरीत्यं किं न स्यात् । अन्यत्र न स्मृतिरनुभवकारणसम्पृक्तसंस्कारजन्मेति तु नान्यत्रानुभवोऽपि संस्कारसम्पृक्तार्थेन्द्रियसंयोगजन्मेति साम्यादेवाबाधकम् । तदेवं विनिगमनायां प्रमाणाभावात् स्वयं कल्पितव्यवस्थानवैपरीत्येनाऽपि कल्पनासम्भवात् प्रत्यभिज्ञानमुभयकारणसम्भवात् स्मृतिश्चानुभवश्चेति मन्तव्यम् । तथा च स्मृतिव्यावृत्तमनुभवत्वं जातिरस्तीति दुष्प्रत्याशा निरवकाशा । समर्थनकर्ता—कोई भी ज्ञान केवल संस्कारजन्य होने से स्मृति नहीं होता, किन्तु अनुभवकारणशून्य संस्कार से जन्य होने पर ही स्मृति होता है। अतः इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष की अपेक्षा रखनेवाली प्रत्यभिज्ञा अनुभव ही है, स्मृति नहीं । खंडनकर्ता—कोई भी ज्ञान संस्काररहित अनुभव-सामग्री से जन्य होने पर ही अनुभव होता है। किन्तु प्रत्यभिज्ञा संस्कारसहित अनुभव-सामग्री से जन्य है, अतः वह स्मृति ही है—ऐसा विपरीत ही क्यों न मानें ? समर्थनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा को छोड़ अन्यत्र कहीं भी स्मृति अनुभव-कारणयुक्त संस्कार- जन्य नहीं देखी जाती। केवल प्रत्यभिज्ञा ही अनुभवकारणयुक्त संस्कारजन्य है, अतः वह स्मृति नहीं है। खंडनकर्ता—तब तो हम भी यह प्रतिबन्दी उत्तर दे सकते हैं कि अनुभव भी प्रत्यभिज्ञा से अन्यत्र संस्कारयुक्त अनुभव-सामग्री से जन्य नहीं देखा जाता। केवल प्रत्यभिज्ञा ही संस्कारयुक्त अनुभव-सामग्री से जन्य है, अतः वह अनुभव नहीं है। तस्मात् प्रत्यभिज्ञा संस्कारजन्य होने से स्मृति है अथवा इन्द्रियजन्य होने से अनुभव है, इनमें से कोई एक पक्ष मानने में विनिगमक तो है नहीं। अतः प्रत्यभिज्ञा स्मृति है और अनुभव भी है। समर्थनकर्ता— जो केवल संस्कार से जन्य हो, वह स्मरण है। प्रत्यभिज्ञा केवल संस्कार से जन्य नहीं, अतः वह स्मृति नहीं है। खंडनकर्ता—हम भी यह कह सकते हैं कि कोई भी ज्ञान संस्काररहित अनुभव-सामग्री से जन्य होने पर ही अनुभव होता है, प्रत्यभिज्ञा संस्कार-सहित अनुभव-सामग्री से जन्य होने से अनुभव नहीं है; ऐसी स्थिति में स्मृति में न रहनेवाली अनुभवत्व एक जाति है, यह आशा ही जाती रही ।