खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम ज्ञानेऽनुभवप्रत्ययव्यवहारौ साक्षात्त्वनिबन्धनाविति तत्रानुभवत्वजातिकल्पनायां न प्रयोजनप्रमाणे इत्यनुभूत्यर्थभेदान्ल्लक्षणाननुगमो दोषः । अथ स्मृतिव्यावृत्तेन रूपेण यः प्रत्यक्षादिष्वनुभव इत्यनुगतावगमः, स साक्षात्कारित्त्वादनुपपन्नः । ततश्च साक्षात्कार्यसात्कारिविशेषसाधारणमनु- भूतित्वमन्यदेष्टव्यमित्युच्यते । तदपि न युक्तम्; पदार्थान्तरव्यावृत्तेन रूपेण यस्तदितरेष्वनुगतप्रत्ययस्तद्व्यवहारो वा, तत्र तदेव रूपं निमित्तम्, न तु जातिः काचित्तदनुरोधात्कल्प्यते । तथा सति अनक्षपदार्थेभ्यो घटादिभ्यो व्यावृत्तेन रूपेण विभीतकादिषु साम्यावगमादक्षत्त्वादिजातिः कल्प्या प्रसज्येत । इतोऽपि नानुभूतित्वं नाम स्मृतिव्यावृत्ता जातिः । तथाहि—'घटः स एवायम्'ति तावत्प्रत्यभिज्ञा जायते, सा किं स्मृत्यनुभवरूपं ज्ञानद्वयम्, एकमेव वा विज्ञानमंशे स्मृतिरंशे चानुभवः, उत स्मृतिरेव, आहोस्विद् अनुभव एव ? हो जायगा । प्रत्येक को अर्थ मानने पर समुदाय में और समुदाय को अर्थ मानने पर प्रत्येक में अव्याप्ति हो जायगी । निर्वचनकर्ता—प्रत्यक्षादि-चतुष्टय में होनेवाली 'स्मृतिभिन्नं ज्ञानम्' इत्याकारक अनुगतप्रतीति साक्षात्त्व-जाति से नहीं हो सकती । अतः उसके अनुरोध से अनुभूतित्व जाति माननी ही पड़ेगी । खंडनकर्ता—प्रत्यक्षादि-चतुष्टय में 'स्मृति-भिन्नम्' यह जो अनुगत प्रतीति होती है, उसमें स्मृतिभिन्न-ज्ञानत्व ही निमित्त है । अतः उसके अनुरोध से अनुभूतित्व जाति की कल्पना उचित नहीं । अन्यथा पाश्रा, विभीतक तथा इन्द्रिय आदि में भी 'अनक्ष-पदार्थभिन्नम्' इत्याकारक अनुगत प्रतीत होती है । इसलिए उसके अनुरोध से अक्षत्व-जाति भी मान ली जायगी । किञ्च—स्मृतित्व अनुभूतित्व को छोड़कर स्मृति में है, अनुभूतित्व स्मृतित्वको त्यागकर प्रत्यक्षादि चार में है और दोनों प्रत्यभिज्ञा में हैं, इस तरह सङ्कर-दोष होने से भी अनुभूतित्व जाति हो ही नहीं सकती । समर्थनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा में अनुभूतित्व तथा स्मृतित्व दोनों हैं, इसमें प्रमाण न होने से सङ्कर नहीं है । फलतः अनुभूतित्व जाति हो ही सकती है । खंडनकर्ता—श्रवण कीजिये, 'स एव अयं घटः' यह जो प्रत्यभिज्ञा 'होती है, क्या वह स्मृति और अनुभव दो ज्ञान हैं अथवा एक ही ज्ञान ? या एक अंश में स्मृति और एक अंश में अनुभव है ? अथवा स्मृति ही है किंवा अनुभव ही ?