भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ६३ यदि तु शब्दोपदर्शितव्याप्तिजमनुमानमनुभव एव स्यात्, तर्हि ‘सुखं दुःखं वाऽनुभवामी’ति तयोः प्रत्ययः स्यात् । अथ मन्यसे—साक्षात्कारमनुभवार्थमनुरुध्य तयोर्नैवमभिमन्यवहारौ शब्दजानुमानापेक्षौ तु विमर्शकस्य स्यातामेव ताविति । तर्हि साक्षात्कारिणि निर्वचनकर्ता—‘सिताऽसिते सरिते यत्र’ इत्यादि श्रुतिवाक्य से सितासिता-स्नान में सुख-साधनता का ही शाब्दबोध होता है । साधनता में सुख विशेषणरूप से भासता है । फलतः जैसे ‘पर्वतमनुभवामि’ ऐसा अनुव्यवसाय नहीं होता, वैसे ही प्रकृत में भी ‘सुखमनुभवामि’ ऐसा अनुव्यवसाय नहीं होता । किन्तु ‘सुखसाधनतामनुभवामि’ ऐसा ही अनुव्यवसाय होता है । अतः प्रकृत स्थल में ‘अनुभवामि’ इस ज्ञान के न होने पर भी अन्यत्र सभी शाब्दस्थलों में ‘अनुभवामि’ ऐसा ज्ञान होने के कारण अनुभूतित्वजाति में कोई बाधक नहीं है । खंडनकर्ता—उक्त श्रुतिवाक्य से ‘यत्र यत्र सितासिता-सम्भेदस्नानं, तत्र तत्र भावि सुखम्’ ऐसा व्याप्तिज्ञान होकर ‘अहं स्वर्गी भविष्यामि, सिताऽसिता-सम्भेद- स्नायित्वात्, इन्द्रादिवत्’ इत्यादि अनुमिति होने पर भी ‘अनुभवामि’ ऐसी प्रतीति नहीं होती । किन्तु स्नान-काल में ‘शीतदुःखमनुभवामि’ ऐसी ही प्रतीति होती है । हाँ, ‘भावि- सुखं शाब्दयामि या अनुमिनोमि’ ऐसा अनुव्यवसाय अवश्य होता है । यदि शाब्द-बोध या अनुमिति भी अनुभव है, तो ‘अनुभवामि’ इत्याकारक प्रत्यय अवश्य होना चाहिए । किन्तु होता नहीं, अतः अनुमान करना चाहिए कि शाब्द तथा अनुमिति अनुभूति नहीं हैं । निर्वचनकर्ता—उक्त स्थल में ‘अनुभव’ शब्द का अर्थ साक्षात्त्व-जाति ही मानते हैं । अतः शाब्द या अनुमिति में अनुभवत्वव्यवहार नहीं होता । यदि विचार किया जाय, तो प्रत्यक्ष, अनुमिति, उपमिति और शाब्दज्ञान में अनुभवत्वजाति होने से शाब्द तथा अनुमिति में भी अनुभवत्वव्यवहार होता ही है । खंडनकर्ता—यदि साक्षात्त्व को ज्ञान में अनुभव-शब्द के प्रयोग का कारण मानें, तो प्रत्यक्ष में अनुभवत्वजाति की सिद्धि नहीं होगी, क्योंकि वहाँ अनुभवत्वव्यवहार तो प्रत्यक्षत्व से ही हो जाता है । फिर प्रत्यक्ष में अनुभवत्व जाति रहती है, इसमें कोई प्रमाण नहीं । किञ्च—ऐसा मानने पर अनुभूतिशब्द के दो अर्थ हो जाने से अननुगम