भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ६५ आद्ये य एष प्रत्यभिज्ञायां प्रागवस्थाविशिष्टादिदन्ताविशिष्टस्याभेदः प्रकाशते, स स्मृतावन्तर्भावयितुमशक्यः, अननुभूतवस्त्वेन संस्कारानुपनेयत्वात् । अत एव न तृतीयोऽपि । नाप्यनुभवेऽन्तर्भावयितुमसौ शक्यः, प्रत्यभिज्ञान- कालेऽनुभवेन प्रागवस्थाया असंवेदनात् । संवेदने वाऽनुभव एवेति शेषपक्षेऽन्तर्भावः स्यात्, स चाग्रे दूषयिष्यते । अत एव न द्वितीयः । प्रागवस्थाविशिष्टाभिन्नत्वांशे अनुभवस्वीकारश्चेत् प्रागवस्थावैशिष्ट्यमप्यनुभवविषय एव निविष्टमिति चरमपक्षप्रवेशः । अथ प्रागवस्थाविशिष्टादभिन्न इत्ययमर्थोऽप्यनेकांशः, तत्र प्रागवस्थाविशिष्ट इत्यत्रांशे स्मृतित्वम्, अभिन्न इत्यत्रांशे चानुभवत्वमित्युच्यते । एवं तर्हि प्रागवस्था- विशिष्टः स इदन्ताविशिष्टोऽभिन्नश्चायमिति स्मृत्यनुभूतिभ्यामावेदितं भवति, यदि प्रत्यभिज्ञा को स्मृति और अनुभव उभयरूप मानें, तो उसमें प्राग- वस्थाविशिष्ट से इदन्ता-विशिष्ट का जो अभेद भासता है, उसका अन्तर्भाव कहाँ होगा ? स्मृति में तो हो नहीं सकता, क्योंकि वह अंश पूर्वकाल में अनुभूत न होने से उसका संस्कार ही नहीं है । अतएव 'प्रत्यभिज्ञा स्मृति है' यह तृतीय पक्ष भी असङ्गत है । फिर अनुभव में भी अभेद के भान का अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि प्रत्यभिज्ञाकाल में चक्षुःसन्निकर्ष न होने से प्रागवस्था अनुभव का विषय नहीं रहती । यदि प्रागवस्था को अनुभव का विषय मानें, तो 'प्रत्यभिज्ञा अनुभव ही है' इस चतुर्थ पक्ष में प्रवेश हो जायगा । उस पक्ष का खण्डन आगे करेंगे । अतएव 'प्रत्यभिज्ञा के एक अंश में अनुभूति तथा दूसरे अंश में स्मृति है' यह द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं, क्योंकि यदि प्रागवस्थाविशिष्ट के साथ इदन्ताविशिष्ट के अभेद को अनुभव का विषय मानें, तो विशेषण में प्रविष्ट प्रागवस्था का वैशिष्ट्य भी अनुभव का ही विषय हो जायगा । अतः उसका अन्तिम पक्ष में अन्तर्भाव हो जायगा । निर्वचनकर्ता—'प्रागवस्थाविशिष्ट से अभिन्न यह है' यह भी दो अंशों से युक्त है । उनमें 'प्रागवस्थाविशिष्ट' यह अंश स्मृति है और 'अभेद' एवं इदन्तावैशिष्ट्य ये अंश अनुभव हैं । खंडनकर्ता—यदि ऐसा है, तो 'प्रागवस्था से विशिष्ट वह' इतना अर्थ स्मृति-अंश का विषय है तथा 'इदन्ता-विशिष्ट से अभिन्न यह' इतना अर्थ अनुभव-अंश का विषय है, 'प्रागवस्था से विशिष्ट के साथ अभेद' किसी अंश का