खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम प्रागवस्थाविशिष्टाश्रयतया त्वभेदः केनापि न प्रकाशित इति य एव प्रागवस्था- विशिष्टः स एवायमिति प्रत्यभिज्ञायाः शरीरं न स्यात् । अथानुभवेन योऽसौ अनुभूयमानधर्म्याश्रयतया अभेदो बोधितः, स कोट्य- न्तरमनालम्ब्य न पर्यवस्यतीति केनचित् खलु कस्यचिदभेदो भवति । ततः स्मृत्यंशोपनीतमेव सन्निधानात् कोट्यन्तरं प्रागवस्थाविशिष्टरूपमालम्बत इत्यभेदस्य प्रागवस्थाविशिष्टाश्रयतासिद्धिरिति । तदेतत्तुल्योत्तरम् । 'कोट्यन्तरमालम्बते' इति किं कोट्यन्तराश्रितो भवति, उत् कोट्यन्तराश्रिततया ज्ञायत इति ? नाद्यः; अभेदस्येदानीं प्रागवस्थाविशिष्ट- धर्म्याश्रयेणोत्पत्तौ पूर्वं प्रागवस्थाविशिष्टेदन्ताविशिष्टयोर्भेदः स्यात् । द्वितीये तु यदेव कोट्यन्तराश्रिततया इदन्तावच्छिन्नधर्म्यभेदस्य ज्ञानं तत्स्मृतौ नान्तर्भावयितुं शक्यम्, नाऽप्यनुभवांश इत्युक्त एव दोषः । विषय नहीं । अतः 'जो प्रागवस्था से विशिष्ट है, वही इदन्ता-विशिष्ट है,' यह प्रत्यभिज्ञा का स्वरूप नहीं हो सकता । निर्वचनकर्ता—अनुभव-अंश का विषय जो अभेद है, वह अन्य कोटि ( प्रतियोगी ) के अवलम्बन के बिना उसका विषय हो नहीं सकता; क्योंकि किसीसे ही किसीका अभेद होता है । तब तो वह सन्निधान होने से स्मृति-अंश का विषय प्रागवस्था-विशिष्ट का ही प्रतियोगिरूप से आलम्बन करेगा । इस तरह अभेद प्रागवस्था- विशिष्टप्रतियोगिक सिद्ध हो ही जाता है । खण्डनकर्ता—'कोट्यन्तर का आलम्बन करता है' इस पंक्ति का अर्थ क्या है— 'क्या वह अभेद इस समय प्रागवस्था-विशिष्ट का प्रतियोगिरूप से आश्रयण करता है' अथवा 'इदानीं प्रागवस्था-विशिष्ट के प्रतियोगित्व-रूप से ज्ञात होता है'? यदि प्रथम पक्ष मानें, अर्थात् अभेद यदि इदानीं प्रागवस्था- विशिष्ट-प्रतियोगितया उत्पन्न होता है, तो इससे पूर्व प्रागवस्था-विशिष्ट से इदन्ता- विशिष्ट का भेद सिद्ध होगा । यदि द्वितीय पक्ष मानें, तो जो प्रागवस्था-विशिष्ट के साथ इदन्ता-विशिष्ट के अभेद का जो ज्ञान होता है, वह स्मृति या अनुभव में पूर्वोक्त प्रकार से अन्तर्भाव नहीं हो सकता । अतः उक्त दोष होगा ।