भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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स्वग्राह्यसम्बद्धविशेषणतायाः प्रत्यासत्तित्वनियमात् । अन्यथा आप्यपरमाण्वादौ पृथिवीत्वादेरन्यत्र ग्राह्यतया निरस्तस्वरूपयोग्यत्वस्याभावो दृगादिभिर्गृह्येत । न हि इन्द्रियविहारदेशेषु निष्परमाणुकत्वनियमो युक्ताभ्युपगमः । शब्दाभावप्रत्यक्षत्व- वादिनवे श्रोत्रेन्द्रियविशेषणता सप्तमः सन्निकर्षः, न तु तत्र सम्बद्धविशेषणतेत्यतो- ऽपि न व्यभिचारः । नहीं सकता । क्योंकि जलीय परमाणु में ग्रहण के स्वरूप-योग्य पृथिवीत्व का अभाव चक्षु से गृहीत न हो, इसलिए उस इन्द्रिय से सम्बद्ध विशेषणतारूप प्रत्यासत्ति तत्तत् इन्द्रिय- जन्य ज्ञान के विषय पदार्थ से घटित ही होती है, अग्राह्य पदार्थ से नहीं, ऐसा नियम है। समर्थनकर्ता—पृथिवीत्वाभाव के साथ संबद्ध-विशेषणता भी नहीं है, क्योंकि जलीय परमाणु के साथ चक्षुःसन्निकर्ष नहीं है। फलतः जल-परमाणु में पृथिवीत्वाभाव का ग्रहण नहीं होता। अतः 'सम्बद्ध-विशेषणता ग्राह्य पदार्थ से घटित ही होती है' इस नियम को मानना उचित नहीं है। खंडनकर्ता—इन्द्रिय-प्रचारस्थल में सर्वत्र ही चतुर्विध परमाणु व्याप्त हैं। अतः जलीय परमाणु के साथ चक्षुःसन्निकर्ष नहीं है, यह कथन उचित नहीं। समर्थनकर्ता—यह नियम नहीं है कि उस-उस इन्द्रिय से सम्बद्ध-विशेषणता स्वग्राह्य- पदार्थ से घटित ही होती है। क्योंकि घ्राण तथा रसनेन्द्रिय से गन्धाभाव तथा रसा- भाव का घ्राण या रसना से अग्राह्य पुष्प एवं गुड़ से घटित घ्राण-संयुक्त पुष्प-विशेषणता अथवा रसना-संयुक्त गुड़-विशेषणता से भी ग्रहण होता है। खंडनकर्ता—उन-उन गन्ध आदि की ग्राहक इन्द्रियों से अग्राह्य हैं आश्रय जिनके— ऐसे पदार्थ (गन्धादि) प्रतियोगी हैं जिन अभावों के, उनसे इतर पदार्थों का जहाँ ग्रहण होता है, उस स्थल के लिए यह नियम है; गन्धाद्यभाव के ग्रहण के लिए नहीं। शब्दाभाव का प्रत्यक्ष माननेवाले नैयायिक के मत में श्रोत्रेन्द्रियविशेषणता सप्तम सन्निकर्ष है, सम्बद्ध-विशेषणता नहीं। अर्थात् स्वग्राहक इन्द्रियों से अग्राह्य हैं आश्रय जिनके—एवम्भूत पदार्थ हैं प्रतियोगी जिन अभावों के, उनसे इतर स्थल में यह विशे- षण न भी दें; तथापि शब्दाभाव-प्रत्यक्ष में व्यभिचार नहीं होगा। कारण 'स्वग्राह्य- पदार्थ से घटित विशेषणता ही प्रत्यासत्ति है' यह नियम सम्बद्धविशेषणतारूप षष्ठ सन्निकर्ष के लिए है; सप्तम शुद्ध विशेषणता (जो शब्दाभाव के प्रत्यक्ष में है) के लिए नहीं।