भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन १०५ न चाऽऽत्मसंयुक्तमनः प्रति. पूर्वानुभूतार्थात्मप्रत्यासत्तिरेव संस्कार इति तदती- न्द्रियत्वं न दोषाय, प्रत्यासत्तेरतीन्द्रियाया इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य उपगमादिति स्वीकृते निस्तारः । तथा सति स इत्यंशे चक्षुरादेः प्रत्यासत्त्यभावात् प्रत्यभिज्ञाया अचाक्षुषत्वापातात् । अयमित्यंशो दृगादिना, तदंशस्तु मनसा गृह्यताम्, तदेतद्- भेदस्तु केनेत्युक्तमप्यावर्तत इति । एतेन संस्कारः सहकारिमात्रमिन्द्रियस्यातिप्रसङ्गन्निवारकः, प्रत्यभिज्ञायां तदर्थ इन्द्रियेणासन्निकृष्ट एवोल्लिख्यते विभ्रमार्थवत् । सन्निकृष्टग्राहिता चेन्द्रियस्य सन्नि- कर्षसहकार्यवश्यम्भावमात्रम् । तच्चेदमंशसन्निकर्षादेव स्यात्, न तु सर्वग्राह्यसन्निकर्ष- सहकारितेत्यपि निरस्तम् । 'सोऽयं न वे'ति संशयाभावापातेनैवेति । समर्थनकर्ता—'स एवाऽहम्' इस प्रत्यभिज्ञा में संस्कार ही आत्म-संयुक्त मन की पूर्वानुभूत आत्मा में प्रत्यासत्ति है । 'स एवाऽयम्' इस प्रत्यभिज्ञा में भी संस्कार ही पूर्वानुभूत घट की प्रत्यासत्ति है । संस्काररूप प्रत्यासत्ति का अतीन्द्रियत्व दोष नहीं है, क्योंकि घट-प्रत्यक्षस्थल में भी चक्षुःसंयोगरूप प्रत्यासत्ति अतीन्द्रिय है । अतः प्रत्यासत्ति अतीन्द्रिय भी मानी जाती है । खंडनकर्ता—ऐसा होने पर 'सः' इस अंश में प्रत्यभिज्ञा चाक्षुष सिद्ध नहीं होगी । समर्थनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा 'सः' इस अंश में मानस तथा 'अयम्' इस अंश में चाक्षुष ही है—ऐसा ही मानें, तो क्या हानि है ? खंडनकर्ता—तत्ता-विशिष्ट से इदन्ता-विशिष्ट के अभेद में न संस्कार है और न सन्निकर्ष ही । अतः अभेदांश का न चाक्षुष प्रत्यक्ष होगा और न मानस ही, यह पूर्वोक्त दोष बना ही रह जायगा । समर्थनकर्ता—प्रत्यक्ष में यावत् विषयों के साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष कारण नहीं, किन्तु कहीं-कहीं यत्किञ्चित् विषय के साथ सन्निकर्ष भी कारण है । प्रकृत में 'इदम्' अंश के साथ चक्षुःसन्निकर्ष है । अतः तत्तांश, अभेद, इदमंश—सब प्रत्यक्ष में भासते हैं । असन्निकृष्ट अंश के भान में संस्कार सहकारी है, अतः संस्कार के अविषय असन्निकृष्ट पदार्थ का भान नहीं होता । खंडनकर्ता—अभेद-अंश में न सन्निकर्ष है और न अतिप्रसङ्गकारक संस्कार ही, अतः प्रत्यभिज्ञा में अभेद का भान नहीं होगा । किञ्च—सर्वत्र प्रत्यभिज्ञा की सामग्री निश्चयरूप होने से प्रत्यभिज्ञा भी निश्चयरूप ही होगी । कहीं भी 'सोऽयं न वा' इस प्रकार सन्देहरूप प्रत्यभिज्ञा नहीं होगी. क्योंकि सन्देह का प्रयोजक दोष उक्त युक्ति से खण्डित है । १४