भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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[Page Header] परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन १०३


निश्चयत्ववत् 'स्थाणुमानय पुरुषं वे'ति स्थाणुपुरुषगतपाक्षिकव्यवहारानापत्तेः । तस्माद् वाकारार्थस्य ज्ञानधर्मत्वे साक्षात्कारित्वादिवद्विषयानन्वयापत्तिरेवेति । न च प्रत्यासत्तौ सत्यामपि प्रत्यासत्त्यपुरस्कारान्मनसा न ग्रहणं तत्र दोष- वशादित्यस्तु । दोषे सत्यपि वस्तुनः संस्कारेण, संस्कारस्य चाऽऽत्मना, तस्य च बाह्येन्द्रियेण, प्रत्यासत्त्यपेक्षम् एव तदर्थप्रकाशादिनियमोपपत्तेः कः पुनः प्रत्या- सत्त्यपुरस्कारस्त्वन्मते स्यात् । यदि तु संस्कारप्रत्यासत्तिमनपेक्ष्य तथा सन्दिह्यते, तदा अननुभूय प्रस्मृत्य वा तथा सन्दिह्येत । वस्तुतस्तु मनसा संस्काराग्राहिणा, चक्षुरादिना च आत्माऽग्राहिणा, तादृश- प्रत्यासत्त्या ग्रहणानुपपत्तेः, नियमेन तदिन्द्रियाग्राह्याश्रयकप्रतियोगिकेतरस्य ग्रहणे शब्द की प्रतीति ( श्रावण प्रत्यक्ष ) या व्यवहार देखा जाता है । अतः 'वा' शब्द के अर्थ अव्यवस्थितत्व का अन्वय भी उन्हीं दो कोटियों में होता है । विषय के अव्यवस्थाकृत इस निश्चय से ही सन्देह में वैलक्षण्य है, सन्देहत्व-जातिकृत नहीं । समर्थनकर्ता—प्रतीतिगत अव्यवस्थिति 'वा' शब्द का अर्थ है, विषयगत अव्यव- स्थिति नहीं । अतः हम तो प्रतीतिगत अव्यवस्थिति को ही सन्देहत्व-जाति कहते हैं । खंडनकर्ता—यदि प्रतीतिगत अव्यवस्थिति वाशब्द का अर्थ होता, तो 'प्रत्येमि न वा' यही आकार होता, 'स्थाणुर्न वा' यह आकार न होता । किञ्च—यदि 'वा' शब्दार्थ अव्यवस्थितत्व को प्रतीति का धर्म मानें, तो साक्षात्त्व और प्रमात्व के तुल्य विषय के साथ 'वा'शब्दार्थ का अन्वय नहीं होगा । समर्थनकर्ता—उक्त प्रत्यासत्ति है सही, परन्तु दोष से उसका तिरस्कार होने पर निश्चयरूप प्रत्यभिज्ञा नहीं होती । किन्तु 'इदं तद् वा न वा' इत्याकारक सन्देहरूप प्रत्यभिज्ञा ही होती है । खंडनकर्ता—सन्देहरूप प्रत्यभिज्ञा भी दोष होने पर, वस्तु से संस्कार, संस्कार से आत्मा, आत्मा से मन, मन से चक्षु की प्रत्यासत्ति होने पर ही होती है । फिर प्रत्यासत्ति का अपुरस्कार क्या हुआ ? यदि प्रत्यासत्ति की अपेक्षा न कर सन्देहरूप प्रत्यभिज्ञा होती है—ऐसा माना जाय, तो तत्ता-विशिष्ट का पूर्व-काल में अनुभव न होने पर भी इदानीं तत्ताविशिष्ट का स्मरण होने पर सन्देहरूप प्रत्यभिज्ञा भी हो सकती है--यह भी मान लेना चाहिए । क्योंकि जब निर्युक्तिक ही मानना है, तो ऐसा भी क्यों न माना जाय ? वस्तुतः संस्कार को ग्रहण न करनेवाले मन तथा आत्मा को ग्रहण न करनेवाले चक्षु से उक्त प्रत्यासत्ति द्वारा तत्ताविशिष्ट से इदन्ताविशिष्ट के अभेद का ग्रहण हो