खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७२ सानुवादं खण्डनखण्डखाद्ये [ प्रथम प्रकाशिता। सत्यप्यर्थे दोषादवस्तुन एव प्रकाशे संशयात् प्रेक्षावत्प्रवृत्त्यादेरसम्भ- वापत्तेः । वस्तुविषयत्वेऽपि दोषादनिश्थयतेति चेन्न। वस्तुतस्तस्यासङ्कीर्णत्वात्तस्य प्रकाशे तदेव संशयैककोटौ प्रकाशितमिति कुत्र तदनिश्थयता। निश्चयार्थस्य च संशय- कोटावखण्डने संशये तदभावाधिकग्राहित्वेऽपि निश्चयत्वस्याप्रत्यूहत्वादेव अभाव- निश्चयः कोट्यन्तरं केवलमधिकं स्यात् । जातिः संशयत्वम्, तत्प्रयोजकश्च दोष इति चेन्न। 'इदं तद्वा न वा' इति संशयकोट्यर्थनिर्देशसमन्वयेन वा-शब्दप्रतीतिव्यवहारयोरभावापत्तेः । प्रतीत्या सह वाकारार्थसम्बन्धे 'प्रत्येमि न वे'ति तदापत्तेः । वाकारार्थस्य प्रतीतिगतत्वेऽपि क्योंकि दोष भी किसी विशेष (इन्द्रियादि) के बिना अवस्तु का प्रकाश नहीं करता। समर्थनकर्ता—सन्देह या भ्रम-स्थल में वस्तु है, परन्तु दोष वश वह भासती नहीं, अवस्तु ही भासती है। खंडनकर्ता—यदि सन्देह में वस्तु नहीं भासती, तो वस्तु के सन्देह से बुद्धिमान् की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए। समर्थनकर्ता—प्रवृत्ति के अनुरोध से वस्तु सन्देह का विषय अवश्य होती है, परन्तु सन्देह में जो अनिश्चयाकारत्व है, उसमें दोष ही कारण है। खंडनकर्ता—धर्मी संकीर्ण (स्थाणु और पुरुष उभयाकार) नहीं, किन्तु एकरूप ही है। यदि वही सन्देह में भासता है, तो सन्देह अनिश्चयरूप कहाँ रहा, जिसका कारण दोष होगा? समर्थनकर्ता—यदि पुरुषरूप धर्मी में केवल पुरुषत्व का ही भान होता, तो सन्देह को निश्चय अवश्य कहते। परन्तु यहाँ तो स्थाणुत्व या पुरुषत्वाभाव का भी उल्लेख होता है। अतः वह निश्चय नहीं, अनिश्चयरूप ही है और उसका कारण दोष है। खंडनकर्ता—निश्चय के विषय पुरुषत्वविशिष्ट पुरुष का बाधक प्रतीति से खण्डन तो होता नहीं है, अतः उस अंश में सन्देह भी निश्चयरूप ही है। सन्देह में जो अभाव- रूप अधिक भासती है, उस अंश में भी विपर्ययरूप निश्चय ही है। किसी अंश में अनिश्चय रूप नहीं है। फिर दोष किसका कारण है? समर्थनकर्ता—विरुद्ध उभयकोटिक सन्देह निश्चय होने पर भी एककोटिक निश्चय से विलक्षण है, यह तो आप अवश्य मानेंगे। हम उसी वैलक्षण्य को सन्देहत्व कहते और दोष को उसका प्रयोजक मानते हैं। खंडनकर्ता—'स्थाणुः पुरुषो वा' इस सन्देह-कोटि के वाचक स्थाणु और पुरुष शब्द के सामानाधिकरण्य से 'वा'