खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 116, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन १०१ न च संस्कारद्वारा प्रत्यासत्त्या सम्बद्धविशेषणतया तद्ग्रहः; क्वचित् सोऽयं न वेति तर्हिसंशयो न स्यात् । दोषवशात्तत्र तत्प्रकाशो न सम्बद्धविशेषणत्वादिति चेन्न । विनाऽपि संस्कारं दोषवशात्तदापत्तेः । वस्तुप्रकाशिनि च दोषत्ववाचोयुक्त्यनिरुक्तेः । क्वापि तस्यावस्तुप्रकाशित्वादोषत्वे तु, कथमन्नादेरपि तन्न स्यात् । विशिष्टत्वेन तथात्वस्य प्रकृतेऽप्यपरिहारात् । न हि विनैव कुतोऽपि विशेषादस्यावस्तु- समर्थनकर्ता—चक्षु से ही संयुक्त-संयुक्त-समवेत-विशेषण-विशेषणतारूप सन्निकर्ष- द्वारा इदन्ता से उपरक्त अभेद भी भासेगा । देखिये, इन्द्रिय-संयुक्त मन तथा मन से संयुक्त आत्मा है, आत्मा में समवेत ( समवाय संबंध से रहनेवाला ) संस्कार है, संस्कार में विशेषण घट और घट में विशेषण तत्ता-विशिष्ट अभेद है । इस प्रकार उक्त सन्निकर्ष से अभेद के अनुभवविषय होने में कोई क्षति नहीं है । खण्डनकर्ता—उक्त सन्निकर्ष को यदि प्रत्यक्षरूप निश्चय का कारण माना जाय, तो कहीं भी 'सोऽयं न वा' यह प्रत्यभिज्ञारूप सन्देह नहीं होगा, क्योंकि सन्निकर्ष से सर्वत्र प्रत्यभिज्ञारूप निश्चय ही होता है । समर्थनकर्ता—प्रकृत स्थल में यद्यपि उक्त सन्निकर्ष है; तथापि दोष होने से सन्देह- रूप ( ज्ञान ) प्रकाश ही होता है । खण्डनकर्ता— फिर तो जहाँ संस्कार ( भावना ) तथा उक्त सन्निकर्ष न हों, वहाँ भी दोष से प्रत्यभिज्ञारूप सन्देह होना चाहिए । समर्थनकर्ता—जहाँ दोष, संस्कार और सन्निकर्ष तीनों हों, वहाँ तो प्रत्यभिज्ञारूप उक्त सन्देह होता है । किन्तु जहाँ दोष न होकर सन्निकर्ष और संस्कार ही हों, वहाँ निश्चयरूप प्रत्यभिज्ञा ही होती है । खंडनकर्ता—वस्तु के अप्रकाशक को 'दोष' कहते हैं । सन्देह-स्थल में तो वस्तु का प्रकाश होता है, अतः वहाँ दोष का लक्षण ही कैसे जायगा ? समर्थनकर्ता—कहीं-कहीं ( 'इदं रजतम्' इस भ्रम या सन्देह की ही अन्य कोटि में ) अवस्तु का प्रकाशक होने से दोष-लक्षण का समन्वय हो जायगा । खंडनकर्ता— यदि कहीं-कहीं अवस्तु के प्रकाशक होने से ही दोषत्व मान लें, तो 'इदं रजतम्' इस भ्रम- स्थल में अवस्तु का प्रकाशक होने से इन्द्रिय भी दोष हो जायगा । समर्थनकर्ता—शुक्ति में 'इदं रजतम्' इस भ्रम में दोष-विशिष्ट इन्द्रिय कारण है । अतः 'नागृहीतविशेषणा बुद्धिः विशेष्यमुपसंक्रामति' इस न्याय से विशेषण ही दोष है, इन्द्रिय नहीं । खंडनकर्ता—फिर तो इसी रीति से चक्षुरादिविशिष्ट दोष को सन्देह या भ्रम का कारण मानकर 'नागृहीतविशेषणां' इस न्याय से इन्द्रिय ही दोष क्यों न हो ।