खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 122, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अनुभूति-जाति का खण्डन १०९ अथ न संस्काराधीनत्वमात्रेण स्मृतित्वम्, किन्त्वनुभवकारणासम्पृक्त- संस्कारजत्वेन । ततश्चाधिकार्थाक्षसन्निकर्षापेक्षं प्रत्यभिज्ञानमनुभव एव भवति, न तु स्मृतिरिति चेन्न । संस्कारासम्पृक्तानुभवकारणजत्वेन अनुभवत्वं भवति, प्रत्यभि- ज्ञानन्तु संस्कारसहितानुभवकारणजं स्मृतिरेवेति वैपरीत्यं किं न स्यात् । अन्यत्र न स्मृतिरनुभवकारणसम्पृक्तसंस्कारजन्मेति तु नान्यत्रानुभवोऽपि संस्कारसम्पृक्तार्थेन्द्रियसंयोगजन्मेति साम्यादेवाबाधकम् । तदेवं विनिगमनायां प्रमाणाभावात् स्वयं कल्पितव्यवस्थानवैपरीत्येनाऽपि कल्पनासम्भवात् प्रत्यभिज्ञानमुभयकारणसम्भवात् स्मृतिश्चानुभवश्चेति मन्तव्यम् । तथा च स्मृतिव्यावृत्तमनुभवत्वं जातिरस्तीति दुष्प्रत्याशा निरवकाशा । समर्थनकर्ता—कोई भी ज्ञान केवल संस्कारजन्य होने से स्मृति नहीं होता, किन्तु अनुभवकारणशून्य संस्कार से जन्य होने पर ही स्मृति होता है। अतः इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष की अपेक्षा रखनेवाली प्रत्यभिज्ञा अनुभव ही है, स्मृति नहीं । खंडनकर्ता—कोई भी ज्ञान संस्काररहित अनुभव-सामग्री से जन्य होने पर ही अनुभव होता है। किन्तु प्रत्यभिज्ञा संस्कारसहित अनुभव-सामग्री से जन्य है, अतः वह स्मृति ही है—ऐसा विपरीत ही क्यों न मानें ? समर्थनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा को छोड़ अन्यत्र कहीं भी स्मृति अनुभव-कारणयुक्त संस्कार- जन्य नहीं देखी जाती। केवल प्रत्यभिज्ञा ही अनुभवकारणयुक्त संस्कारजन्य है, अतः वह स्मृति नहीं है। खंडनकर्ता—तब तो हम भी यह प्रतिबन्दी उत्तर दे सकते हैं कि अनुभव भी प्रत्यभिज्ञा से अन्यत्र संस्कारयुक्त अनुभव-सामग्री से जन्य नहीं देखा जाता। केवल प्रत्यभिज्ञा ही संस्कारयुक्त अनुभव-सामग्री से जन्य है, अतः वह अनुभव नहीं है। तस्मात् प्रत्यभिज्ञा संस्कारजन्य होने से स्मृति है अथवा इन्द्रियजन्य होने से अनुभव है, इनमें से कोई एक पक्ष मानने में विनिगमक तो है नहीं। अतः प्रत्यभिज्ञा स्मृति है और अनुभव भी है। समर्थनकर्ता— जो केवल संस्कार से जन्य हो, वह स्मरण है। प्रत्यभिज्ञा केवल संस्कार से जन्य नहीं, अतः वह स्मृति नहीं है। खंडनकर्ता—हम भी यह कह सकते हैं कि कोई भी ज्ञान संस्काररहित अनुभव-सामग्री से जन्य होने पर ही अनुभव होता है, प्रत्यभिज्ञा संस्कार-सहित अनुभव-सामग्री से जन्य होने से अनुभव नहीं है; ऐसी स्थिति में स्मृति में न रहनेवाली अनुभवत्व एक जाति है, यह आशा ही जाती रही ।