भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 123

१०८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम न च विषयांशे स्मृतित्वानुभवत्वयोर्व्यवस्था कर्तुं शक्यते, तन्निरासस्य निवेदितत्वात् । ततश्च तदेव ज्ञानं तस्मिन्नेवांशे स्मृतिश्चानुभूतिश्चेत्यापतितेऽपि यदि न विरोधबुद्धिर्भवतस्तदा तदधीने तत्रैवार्थे प्रमात्वाप्रमात्वापाते साऽस्तु । एतेन विरोधापत्त्या अनुभवत्वस्वीकारे बाधकेन स्मृतिव्यतिरिक्तमलुभवत्वं नामानुगतं साक्षात्कारज्ञानानुमित्यादिसाधारणमनुभवबलादेव व्यवस्थापनीय- मिति प्रतीतिकलहोऽपि निरस्तः । ननु चानुभव एव शरणमिह, प्रत्यभिज्ञाने ह्यनुभवत्वमेवानुभूयते, न तु स्मृतित्वम् । तेन संस्कारजत्वेऽपि इन्द्रियार्थसन्निकर्षाधिकापेक्षया अनुभवत्वमेवेति विनिगमनायामपीदमेव प्रमाणम् । अन्यथा प्रत्यभिज्ञानेऽनुभवप्रत्ययो न स्यादिति प्रतीतिकलहेन प्रत्यवस्थेयमिति । न ; इदन्तातत्तावभासयोरनुभवस्मरणभागयोः सत्त्वेनानुभवस्यैकपक्षे असाधारणीकृत्य प्रमाणयितुमिहाशक्यत्वात् । एतेन स्मृत्यनुभवसङ्करप्रसङ्गेन अनुभूतिपदव्यवच्छेद्यं परिप्लुतं मन्तव्यम् । प्रत्यभिज्ञा तत्ता-अंश में स्मृति और इदन्ता-अंश में अनुभव है; इस व्यवस्था का तो पहले ही खण्डन हो चुका है । अतः प्रत्यभिज्ञा उसी अंश में स्मृति और उसी अंश में अनुभव होने लगेगी, जिससे एकत्र स्मृतित्व और अनुभवत्व इन दो विरुद्ध धर्मों का सन्निवेश हो जायगा । ऐसा होने में भी यदि आपको विरोध-बुद्धि न हो, तो प्रत्यभिज्ञा में प्रमात्व और अप्रमात्व इन दो विरुद्ध धर्मों के सन्निवेश में भी विरोध-बुद्धि छोड़ दें । अनुभवरूप होने से उसमें प्रमात्व और स्मृतिरूप होने से अप्रमात्व स्पष्ट है । समर्थनकर्ता—स्मृति में अवृत्ति और प्रत्यक्षादि-चतुष्टय में वृत्ति अनुभवत्व जाति की सिद्धि 'अनुभवामि' इस अनुगत-प्रतीति से ही हो जायगी । खंडनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा में ही इन परस्पर विरुद्ध स्मृतित्व और अनुभवत्व का समावेश है, अतः सङ्कर होने से अनुभवत्व जाति नहीं हो सकती । समर्थनकर्ता—प्रत्यभिज्ञा में 'अनुभवामि' इत्याकारक प्रतीति होती है, अतः प्रमाण होने से संस्कारजन्य होने पर भी प्रत्यभिज्ञा में अनुभवत्व ही है, स्मृतित्व नहीं । खंडनकर्ता—जैसे इदन्ता-अंश में 'अनुभवामि' इत्याकारक प्रतीति होती है, वैसे ही तत्ता-अंश में 'स्मरामि' इत्याकारक भी प्रतीति होती है । अतः प्रत्यभिज्ञा में 'अनुभवामि' यही प्रतीति होती है—ऐसा नहीं कह सकते । जब प्रत्यभिज्ञा में अनुभवत्व भी है, तो 'तत्त्वानुभूतिः प्रमा' इस लक्षण में अनुभूति विशेषण का व्यावर्तनीय प्रत्यभिज्ञा है, यह कथन खण्डित जानना चाहिए ।