खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य इन्द्रियार्थसन्निकर्षव्यावृत्त्या अनुभवसामग्र्यभावात् पारिशेष्येणानुमित्यादेरपि स्मृतित्वापत्तेः । सर्वानुभवसामग्र्यसम्भवादिति चेत् , कथं पुनस्तत्तांशशून्यरजतादिज्ञान- हेतुसामग्री नानुभवहेतुसामग्रीत्यवधारितमायुष्मता ? पञ्चप्रमाणीकारणसामग्र्यसम्भवादिति चेन्न । चतुष्प्रमाणीजनकसामग्र्यसम्भवात् पञ्चमी प्रमा किं न पारिशेष्यात् स्मरणं त्वया व्यवस्थापि । कुत्र च प्रतिपन्नं पञ्चप्रमाणीकारणसामग्र्यभावे जायमानं ज्ञानं स्मृतिर्भवतीति, ‘घटस्तत्रासीत्’ इत्यादिज्ञानानामनुभवत्वोपन्यासस्य कृतत्वात् । अथ मन्यसे प्रत्यक्षादिकारणसामग्र्यनुपपत्त्या रजतमात्रस्य च पूर्वमनुभूतत्वेन परन्तु प्रकृत में सादृश्य आदि दोषों से तत्ता-अंश का त्याग है—यहाँ ‘रजतम्’ यह शुद्धस्मृति उक्त लक्षण में अनुभूति पद की व्यवच्छेद्य है । खंडन---यहाँ ‘रजतम्’ यह अंश स्मृति है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है । समर्थन---अनुभव की सामग्री नहीं है, अतः परिशेषात् वह स्मृति है ही । खंडन—यदि ऐसा हो, तो इन्द्रियार्थ के सन्निकर्ष की व्यावृत्ति होने से अनुमिति आदि भी परिशेषात् स्मृति होने लगेंगे । समर्थन--अनुभव की सम्पूर्ण सामग्री का अभाव होने से ‘रजतम्’ यह ज्ञान स्मृति है, और अनुमिति में इन्द्रियार्थसन्निकर्षरूप प्रत्यक्ष-सामग्री न होने पर भी परामर्श आदि अनुमितिसामग्री विद्यमान है ही, अतः वह स्मृति नहीं है । खंडन---तत्तांश से रहित रजतज्ञान का हेतु सामग्री अनुभवसामग्री नहीं है, यह आपने कैसे निश्चय कर लिया ? समर्थन—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, इन पाँच प्रमाणों की सामग्रियों के न होने से ‘रजतम्’ इस स्मृति-स्थल में अनुभवसामग्री नहीं है, यह निश्चय किया है । खंडन—आप चार प्रमाणों की सामग्री के अभाव से पञ्चमी प्रमा ( अर्थापत्ति ) को भी स्मृति क्यों न मानें ? फिर, आपने किस उदाहरण में यह निश्चय किया है कि पाँचों प्रमाणों की सामग्री के अभावस्थल में जायमान ज्ञान स्मृति होती है, क्योंकि ‘घटस्तत्राऽऽसीत्’ यह ज्ञान भी तत्तांश में स्मरण नहीं, किन्तु अनुभव है—यह पीछे कहा ही जा चुका है । समर्थन--प्रत्यक्षादि-सामग्री के अभावस्थल में रजतमात्र पहले से अनुभूत होने के कारण रजत-विषयक संस्कार है ही । अतः वहाँ ‘रजतम्’ इस ज्ञान में संस्कार