भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन १११ तद्विषयसंस्कारसम्भवात् संस्कारस्यैव हेतुताऽङ्गीक्रियते, न त्वन्यत्कारणत्वेन कल्प्यते, इन्द्रियार्थसन्निकर्षाद्यसम्भवे जायमानस्य तु अनुमानादेरननुभूतविषयत्वेन तस्मान्नोत्पत्तिसम्भव इति तत्कारणं लिङ्गादिकमङ्गीक्रियते । ततः प्रमाणान्तरासहकृत- संस्कारजत्वं तद्व्यङ्ग्यो वा जातिविशेष एव स्मृतित्वमिति । मैवम्; तत्र कारणत्वं किमिति नाक्षस्यैव, येन संस्कारजत्वं व्यवस्थाप्यते । तेनार्थेन सह तदाऽक्षस्य सन्निकर्षाभावादसन्निकृष्टस्य च तस्य ज्ञानजनकत्वेऽति- प्रसङ्गात् नेन्द्रियजत्वं तस्येति चेन्न । संस्कारस्यापि केवलस्य तज्जननेऽतिप्रसङ्गताद- वस्थ्यात् । सहचरितधर्मदर्शनादिना सहकारिणा युक्तस्य संस्कारस्य तज्जनने नास्त्यतिप्रसङ्ग इति चेन्न । तेनैव सहकारिणा सहितस्येन्द्रियस्यापि तज्जनने- ऽतिप्रसङ्गाभावात् । को ही कारण मानते हैं, अन्य किसीको नहीं । किन्तु इन्द्रियार्थसन्निकर्ष आदि के अभाव में जायमान अनुमिति आदि के विषय तो अनुभूत नहीं हैं, अतः वे संस्कार के अभाव में वे उत्पन्न ही नहीं हो सकते । इसलिए उनके कारण लिङ्गादि माने जाते हैं । तस्मात् अन्य प्रमाणों से असहकृत संस्कार से जायमान ज्ञानत्व अथवा संस्कार से व्यंग्य जातिविशेष ही स्मृतित्व है । खण्डन—'रजतम्' इस ज्ञान को संस्कार से जायमान क्यों माना जाय, इन्द्रिय से जायमान ही क्यों न माना जाय । समर्थन—उस काल में रजत के साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष न होने से 'रजतम्' यह ज्ञान इन्द्रियजन्य नहीं है। क्योंकि यदि ज्ञान सन्निकर्ष के बिना भी इन्द्रियजन्य माना जाय, तो अतिप्रसङ्ग हो जायगा । खंडन—तब तो केवल संस्कार को भी स्मृति का कारण मानें, तो सादृश्य-दर्शनादि के अभावकाल में केवल संस्कार से आपके मत में भी स्मृति की आपत्ति हो जायगी । समर्थन—चाकचिक्य आदि सदृशधर्म-दर्शनरूप सहकारी कारणों से युक्त संस्कार को ही रजतस्मृति का कारण मानेंगे, तो अतिप्रसङ्ग नहीं होगा। खंडन—उन्हीं सहकारी दोषों से युक्त इन्द्रिय को ही रजतभ्रम का कारण मान लेने पर हमारे मत में भी कोई अतिप्रसङ्ग नहीं होगा ।