खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अननुभूतेऽपि तर्हि प्रसङ्ग इति चेन्न । तत्रापि तद्धर्मतानधिगततद्धर्मवत्यधिगते तस्य संस्कारवतः स्मृत्यापत्त्या समाधिसाम्यात् । लुप्ततत्सादृश्यदर्शनजसंस्कारस्याऽपि तथा सति सहचरितरजताद्यनन्तरप्रतीति- प्रसङ्ग इति चेन्न । तवापि मते तादृशस्य रजतादिसंस्कारवतो रजतादिस्मृति- प्रसङ्गसाम्यात् । तस्माद्यतस्ते कालव्यवधानादितः संस्कारलोपः तदनुपनिपातस्यापि हेतुत्वोपगमेऽनतिप्रसङ्गात् । प्रश्न—इन्द्रियाँ दूर एवं व्यवहित पदार्थों का ग्रहण करने में संस्कार की अपेक्षा करती हैं या नहीं ? यदि करती हों, तो संस्कारज होने से 'रजतम्' यह ज्ञान स्मृति ही होगा । यदि नहीं, तो संस्कार द्वारा पूर्वानुभव की अपेक्षा न होने से अननुभूत में भी 'रजतम्' यह भ्रम क्यों न हो ? खंडन—आपके मत में भी यह दोष समान है । अर्थात् केवल रजतविषयक संस्कार से स्मृति होती है अथवा रजत-विषयक संस्कार और सादृश्य- विषयक संस्कार, दोनों से ? यदि दोनों संस्कारों की अपेक्षा हो, तो उभय-विषयक स्मृति होनी चाहिए । यदि प्रथम पक्ष है, तो जहाँ सादृश्य आदि धर्मों का पूर्वानुभव न हो और धर्मी मात्र पूर्व में ज्ञात हो, वहाँ भी रजत-विषयक-संस्कार से रजत की स्मृति क्यों न हो ? इसपर यदि आपके पक्ष में यह समाधान हो कि 'जहाँ चाकचिक्यादि साधारण धर्मों से युक्त रजत का पूर्वानुभव हो चुका हो और इदानीं चाकचिक्यादि रूप से रजत के सादृश्य का प्रत्यक्ष हो, वहीं संस्कार से रजत का स्मरण होता है', तो हमारे मत में भी वही समाधान होगा । अर्थात् हम भी कह सकते हैं कि 'रजतप्रतियोगिक सादृश्यज्ञान से युक्त चक्षुरादि' ही भ्रम के कारण हैं, अतः उक्त स्थल में दोष नहीं है । समर्थनकर्ता—जहाँ रजत-संस्कार अथवा सादृश्य-संस्कार नष्ट हो गया हो, वहां रजतभ्रम क्यों नहीं होता ? खंडनकर्ता—आपके मत में भी सादृश्य-संस्कार का उपयोग रजत-स्मृति में तो है नहीं। फिर जहाँ वह नष्ट हो गया हो और केवल रजत-संस्कार ही हो, वहाँ भी रजत की स्मृति क्यों न हो—यह शंका तुल्य है। यदि आप कहें कि सादृश्यसंस्कार तो रजतस्मृति में कारण नहीं है; परन्तु संस्कार के विलोपक काल- व्यवधान, चिन्ता, रोगादि के अभाव सहकारी अवश्य हैं। एवंञ्च सादृश्य-संस्कार के नाशस्थल में काल-व्यवधानादि के अभावरूप सहकारी नहीं हैं, अतः स्मृति नहीं होती,' तो हम भी कहेंगे कि 'रजत-संस्कार रजत-भ्रम का कारण तो नहीं है, परन्तु जहाँ