खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 128, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ११३ तदेवं— 'तत्सदृक्प्रत्यभिज्ञानं यत्ते संस्कारबोधकम् । सहकारि तदेवास्तामक्षस्यातिप्रसक्तिनुत् ॥' तत्सदृशप्रत्यभिज्ञानं तु स्मर्तव्यस्मरणपूर्वकमित्येतदपि सममेव । तथाऽप्यन्यत्र अर्थसन्निकर्षमन्तरेणेन्द्रियस्य ज्ञानकरणत्वं नोपलब्धचरमिति चेन्न। विशिष्टरूपेण भ्रमविषये मया तदुपगमात् सहकारिभूतदोषशक्तेर्वा प्रत्या- सत्तित्वेनेष्टत्वात् । रजत-संस्कार नष्ट हो गया हो, वहाँ रजत-भ्रम नहीं होता, क्योंकि काल-व्यवधानादि का अभाव भी रजत-भ्रमका सहकारी है, और प्रकृत में इनका अभाव है। तस्मात् आपके मत में जो सादृश्य-दर्शनादि संस्कार के उद्बोधक हैं, हमारे मत में भी वे ही इन्द्रिय के सहकारी हैं; अतः कोई अतिप्रसङ्ग नहीं है। जिस सादृश्य-ज्ञान को उद्बोधक संस्कार। मानो तुम, इन्द्रियन का वह करता सहकार ॥ समर्थन—आप रजत-भ्रम में इन्द्रिय के सादृश्य-ज्ञान को सहकारी मानते हैं, पर वह रजतरूप प्रतियोगी के स्मरण के बिना हो नहीं सकता। अतः आवश्यक होने से रजत-स्मृति को ही भ्रम माना जाय, रजत-विषयक अन्य अनुभव को भ्रम मानना उचित नहीं। खंडन—आपके मत में भी संस्कार के उद्बोधक सादृश्य-ज्ञान में प्रतियो- गित्वरूप से अपेक्षित रजत-स्मृति तो भ्रम है नहीं, किन्तु संस्कार के उद्बोधन के अनन्तर जायमान रजत-स्मृति ही भ्रम है। अतः प्रश्न हो सकता है कि प्रथम उत्पन्न होने से सादृश्यज्ञान में अपेक्षित रजत-स्मृति ही भ्रम क्यों न कहलाये ? समर्थन— फिर भी इन्द्रिय अन्य स्थल में सन्निकर्ष के बिना ज्ञान के कारण नहीं देखे गये हैं। अर्थात् अक्षज-प्रत्यक्ष-ज्ञान में सर्वत्र इन्द्रियों का अर्थ-सन्निकर्ष से अन्वय- व्यतिरेक देखा जाता है। फिर प्रकृत में सन्निकर्ष के बिना 'रजतम्' यह भ्रम कैसे होगा ? खंडन—प्रमास्थल में ही इन्द्रिय का सन्निकर्ष के साथ अन्वय-व्यतिरेक होने से वहीं सन्निकर्ष अपेक्षित होता है, पर भ्रमस्थल में सन्निकर्ष अपेक्षित नहीं है, यह हम विशेष रूपसे कह सकते हैं। अथवा जैसे आप प्रत्यभिज्ञा में संस्कार को सन्निकर्ष मानते हैं, वैसे ही हम भी भ्रम-स्थल में दोष को ही सन्निकर्ष मान लेंगे, तो कोई हानि नहीं। १५