भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 129

११४ सानुवादखण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम किञ्च-संस्कारस्याऽपि प्रमाणान्तरासहकृतस्य नान्यत्र ज्ञानजनकत्वं दृष्टमिति तदपि कथं कल्प्यते । प्रत्यभिज्ञान एव संस्कारस्य सदृशदर्शनादिसहकारित्वं कल्पितं न त्विन्द्रियेति चेन्न । प्रत्यभिज्ञाने संस्कारेन्द्रिययोर्द्वयोरपि कारणत्वात् सदृशदर्शनादि- सहकृतत्वदर्शनाविशेषात् । अत्र सदृशदर्शनसहकारित्वे संस्कारसहकारित्वस्यापि प्रसङ्गः प्रत्यभिज्ञान- वदिति चेन्न । तथा सति तद्वदेव तचोल्लेखापत्तेः । सदृशदर्शनादिसहकृतत्वेन च तत्तांशप्रसञ्जने संस्कारजन्यत्वस्योपाधित्वम् । किञ्च-संस्कार अन्यत्र कहीं भी अन्य प्रमाणों से रहित होकर ज्ञान का जनक नहीं देखा गया। तब यहाँ केवल संस्कार रजत-स्मृति का जनक है, यह कल्पना ही कैसे हो सकती है ? समर्थन-प्रत्यभिज्ञा में ही संस्कार इन्द्रिय आदि ( प्रत्यक्षादि प्रमाणों ) से रहित हो सादृश्यदर्शन के सहकार से ज्ञान का जनक देखा गया है। खंडन-प्रत्यभिज्ञा में संस्कार और इन्द्रिय दोनों कारण हैं। सादृश्य-दर्शन दोनों का ही सहकारी है। भेद यही है कि तत्तांश के ज्ञान में संस्कार और इदन्ता के ज्ञान में इन्द्रिय कारण हैं। संस्कार तो अपने उद्बोधन और इन्द्रिय अभेदबोध में सादृश्य-दर्शन के सहकार की अपेक्षा करता है। समर्थन-यदि इन्द्रिय भी 'रजतम्' इस भ्रमज्ञान में सादृश्य-दर्शनरूप सहकारी की अपेक्षा करता है, तो वह उससे उद्बुद्ध संस्कार की भी अवश्य अपेक्षा करेगा, जैसे कि प्रत्यभिज्ञा में इन्द्रियाँ संस्कार की अपेक्षा करती हैं। खण्डन-यदि प्रत्यभिज्ञा के तुल्य 'रजतम्' इस भ्रम में भी संस्कार की अपेक्षा मानें, तो प्रत्यभिज्ञा के तुल्य 'रजतम्' इस स्मृति में भी तत्ता का उल्लेख हो जायगा । शङ्का-सदृश-दर्शनरूप सहकारी के बल से 'रजतम्' इस भ्रम में तत्ता का उल्लेख क्यों नहीं ? खंडन-सदृश-दर्शननिष्ठ तत्ता के उल्लेख में संस्कार निमित्त कारण है। यहाँ संस्कार नहीं है, अतः तत्ता का उल्लेख नहीं होता ।