भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] अनुभूतित्व-जाति का खण्डन ११५ न च सदृशदर्शनसहकारितैव तत्ताप्रयोजिकाऽत्र त्यज्यतां न संस्कार इति युक्तम् । सदृशदर्शनं परित्यज्य संस्कारे सत्यपि अतथाबोधात् । तथापि सदर्थे प्राप्यकारित्वमिन्द्रियस्य दृष्टं न हातुं शक्यमिति चेन्न । उक्तमत्र यथेन्द्रियस्य प्राप्तिसहकृतस्य ज्ञापकत्वं दृष्टं तथैव संस्कारस्यापि प्रमाणान्तर- सहकृतस्य ज्ञापकत्वमुपलब्धमिति तदपि हातुं न युक्तमिति, संस्कारस्यापि चेन्द्रियप्रत्यासत्तित्वस्वीकारेण तद्विरहासिद्धेः । तत्तांशमोषकल्पनं च स्वतन्त्रसंस्कारजत्वपक्ष एव यावदधिकम् । कुतश्चायं तत्तांशमोष इति विचारमधिकरोति, पूर्वं वर्तमानादिकालविशेष- शङ्का—सदृश-दर्शन ही तत्ता-भाग के भान का प्रयोजक है, अतः उसीके सहकार को 'रजतम्' इस भान में छोड़ो, संस्कार के सहकार को क्यों छोड़ते हो ? खंडन—संस्कार होने पर भी सदृश-दर्शन के अभाव में 'रजतम्' यह भ्रम नहीं होता । अतः सदृश-दर्शन को ही चक्षुरादि का सहकारी मानते हैं, संस्कार को नहीं । अन्यथा तत्ता का भान हो जायगा । समर्थन—तथापि सत्-अर्थ की प्रमा में सर्वत्र इन्द्रियाँ सम्बद्ध को ही ग्रहण करती देखी गयी हैं, अतः उसको छोड़ना उचित नहीं है । खंडन—इस विषय में हम कह चुके हैं कि जैसे इन्द्रिय सन्निकर्ष से विशिष्ट होकर ही ज्ञान के जनक देखे गये हैं, वैसे ही संस्कार भी अन्य प्रमाणों से युक्त होकर ही ज्ञान का जनक देखा गया है । अतः अन्य प्रमाण का सहकार भी संस्कार में त्यागने योग्य नहीं है । किञ्च—संस्कार ही प्रत्यासत्ति है, अतः रजत असन्निकृष्ट नहीं है । अर्थात् 'रजतम्' यह ज्ञान मानस-भ्रम है और मन के साथ रजत का संस्कार ही सम्बन्ध है । सथ ही, जो 'रजतम्' इस ज्ञान को इन्द्रियजन्य मानते हैं, उनके मत में तत्ता-अंश के भान का प्रसङ्ग ही नहीं है । किन्तु जो स्मृति मानते हैं, उनके मत में तत्ता-अंश के त्याग की कल्पना में अधिक गौरव है । यह भी विचारणीय है कि तत्ता-अंश का त्याग कैसे होगा ? पूर्व-काल में वर्तमानता- विशिष्ट रजतादि ही अनुभव का विषय हुआ है, अतः उससे जन्य संस्कार भी वर्तमानता- विशिष्ट रजतादि को ही उपस्थित करेगा । अर्थात् अनुभव में विशेषणरूप से जो वर्तमानकाल भासता है, वही स्मरण में तत्ता-रूप से भासता है । अतः जो अनुभव में